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मंडी के कचरे में तलाशते जिंदगी का सहारा:भूसे को छानकर निकालते हैं धान, कोई बेचता है तो कोई घर ले जाकर बनाता है चावल




अंबाला कैंट की अनाज मंडी में जहां किसान अपनी फसल बेचने आते हैं, वहीं इसी मंडी के प्रवेश द्वार पर जिंदगी की एक ऐसी तस्वीर भी दिखाई देती है, जो सोचने पर मजबूर कर देती है। सुबह के वक्त मंडी के गेट पर करीब 70 से 75 लोग नजर आते हैं। इनमें महिलाएं, पुरुष और छोटे-छोटे बच्चे शामिल हैं। कोई गोद में बच्चा लिए बैठा है, तो कोई कचरे और भूसे के ढेर को हाथों से छान रहा है। इनकी नजरें उस धान को तलाश रही हैं, जो मंडी में झाड़ू लगाने के बाद बचे कचरे में रह जाता है। इनके लिए यह महज धान के दाने नहीं, बल्कि दिनभर के खाने और परिवार का पेट पालने का सहारा हैं। ये लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के अलग-अलग इलाकों से यहां आए हैं। कोई जौनपुर का रहने वाला है, तो कोई बनारस और कैमूर का। मंडी के अंदर सफाई के बाद निकले भूसे और कचरे को समेटकर ये लोग उसमें से धान के दाने निकालते हैं। दिनभर की मेहनत के बाद किसी के हाथ 5 किलो धान लगता है, तो कोई 10 से 15 किलो तक निकालने की बात कहता है। फिर इस धान को बेचकर मिलने वाले 100 से 200 रुपये से रोजमर्रा का खर्च चलाते हैं। कुछ लोग धान घर ले जाकर कुटवाते हैं, ताकि परिवार के लिए चावल का इंतजाम हो सके। ‘यही धान बीनकर पेट पालते हैं, बाल-बच्चों का खर्च चलाते हैं’ उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले की रहने वाली अजोरिया बताती हैं कि मंडी से निकले कचरे को समेटकर उसमें से धान निकालती हैं। इसके बाद उसे बेचकर घर का खर्च चलाती हैं। उनकी बातों में किसी शिकायत से ज्यादा पेट पालने की मजबूरी झलकती है। वह कहती हैं कि यही उनका रोज का काम है। इसी से परिवार का पेट भरता है और बच्चों का पालन-पोषण होता है। अगर रोजी-रोटी का कोई दूसरा सहारा होता, तो शायद उन्हें कचरे में धान के दाने तलाशने के लिए घंटों नहीं बैठना पड़ता। सुबह 4 बजे पहुंचते हैं, दोपहर 12 बजे तक छानते रहते हैं धान इस तस्वीर का सबसे भावुक पहलू इन बच्चों की मौजूदगी है। करीब 12 साल का अंकुश भी इसी काम में जुटा हुआ है। वह कैमूर का रहने वाला है। अंकुश बताता है कि वह सुबह 4 बजे मंडी पहुंच जाता है, लेकिन अंदर जाने का मौका करीब 8 बजे मिलता है। इसके बाद वह झाड़ू लगाने के बाद निकले कचरे में से धान निकालता है। उसके मुताबिक, रोजाना 10 से 15 किलो तक धान मिल जाता है। इसे बेचने पर करीब 150 से 200 रुपये मिलने की बात वह बताता है। उसके साथ मां, नानी, भाई और मौसी भी आते हैं। यानी जब दूसरे बच्चे सुबह उठकर स्कूल जाने की तैयारी कर रहे होते हैं, तब अंकुश जैसे बच्चे परिवार के साथ दिनभर की कमाई जुटाने की चिंता में लगे होते हैं। हालांकि, इन बच्चों की पढ़ाई और स्कूल जाने की स्थिति के बारे में अभी जानकारी नहीं मिल पाई है, लेकिन इतनी कम उम्र में इस तरह के काम में उनकी मौजूदगी कई सवाल खड़े करती है। ‘5 से 10 किलो धान मिलता है, उसी से घर चलता है’ बनारस की रहने वाली रूपा भी रोज मंडी आती है। वह बताती है कि सुबह करीब 4 बजे पहुंच जाती है और दोपहर 12 बजे तक यहां रहती है। उसके साथ मां और नानी भी आती हैं। तीनों मिलकर धान बीनने का काम करती हैं। रूपा के मुताबिक, रोजाना 5 से 10 किलो तक धान निकल आता है। इसे बेचने पर 50 से 100 रुपये तक मिल जाते हैं। कुछ धान घर भी ले जाते हैं, जिसे कुटवाकर चावल बना लेते हैं। रूपा के लिए मंडी का यह काम रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। धान के कुछ दाने बीनने के लिए उसे घंटों भूसे और कचरे के बीच बैठना पड़ता है। इसके बाद भी कमाई कितनी होगी, यह तय नहीं होता। जितना धान हाथ लगता है, उसी के हिसाब से उस दिन की आमदनी तय होती है। कभी डांट पड़ती है, कभी मंडी से भगाया जाता है बिहार के कैमूर जिले से आई एक महिला बताती है कि मंडी में धान बीनने के दौरान कई बार लोग उन्हें डांटते हैं और वहां से जाने के लिए कहते हैं। उनका कहना है कि जिस ढेर से धान निकाला जाता है, उसके मालिक या वहां मौजूद लोग उन्हें भगाने लगते हैं। इसके बावजूद परिवार का पेट पालने के लिए वे रोज यहां आती हैं। महिला बताती है कि वे सुबह करीब 5 बजे पहुंचती हैं और दोपहर 12 बजे तक धान बीनती हैं। रोजाना 10 से 15 किलो तक धान निकालने की कोशिश रहती है। वह बताती हैं कि उनका घर बिहार के भभुआ जिले के पहाड़ी इलाके में है। वहां से अंबाला आने की वजह भी वह पेट पालने की मजबूरी बताती हैं। उनके परिवार में कई लोग एक ही मकान में रहते हैं। ऐसे में परिवार का खर्च चलाने के लिए मंडी में धान बीनना उनके लिए मजबूरी बन गया है। किसी के लिए कचरा, इनके लिए चूल्हा जलाने का सहारा अंबाला कैंट की अनाज मंडी में यह नजारा रोजाना देखने को मिलता है। मंडी के अंदर से निकले जिस भूसे और कचरे को लोग बेकार समझकर छोड़ देते हैं, उसी में ये परिवार अपने काम के लायक धान तलाशते हैं। कोई उसे बेचकर आटा, सब्जी और दूसरी जरूरतों का इंतजाम करता है, तो कोई घर ले जाकर चावल बनवाता है। इनके लिए हर दाना मायने रखता है, क्योंकि इसी से परिवार के लिए भोजन का इंतजाम होता है। मंडी के गेट पर बैठी इन महिलाओं और बच्चों की जिंदगी की यह तस्वीर बताती है कि रोजी-रोटी की तलाश इंसान को किस हद तक मजबूर कर सकती है। एक तरफ मंडी में हजारों क्विंटल धान की खरीद और बिक्री होती है, दूसरी तरफ उसी मंडी के बाहर कुछ परिवार बचे हुए दानों को समेटकर अपने दिन का गुजारा करने की कोशिश करते हैं।



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