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इस सप्ताह हम अपनी चर्चा को जारी रखते हुए कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के जन्म को लेकर जैन धर्म की कहानियों के बारे में जानेंगे और इन सभी कहानियों का विश्लेषण भी करेंगे। जैन विवरण के अनुसार, देवकी के आठवें नहीं, बल्कि सातवें बालक ने कंस का वध किया था। पहले छह शिशुओं के जन्म लेते ही उनकी जगह छह मृतजात बालिकाओं को रख दिया गया था। एक जीवित बालिका ने सातवें शिशु की जगह ले ली। उसकी नाक काट दी गई, ताकि उसका विवाह ऐसे किसी शक्तिशाली पुरुष से न हो सके, जो कंस का वध कर सकता हो। आगे चलकर देवकी के पहले छह पुत्र जैन साधु बन गए। सातवें पुत्र कृष्ण थे और उन्होंने कंस का वध किया। इसके बाद देवकी एक और पुत्र की अभिलाषा करने लगीं। आठवां पुत्र भी अपने भाइयों की तरह साधु बन गया। इस प्रकार, आठ में से सात पुत्र साधु बने। जैन आख्यानों के अनुसार, देवकी नहीं, बल्कि रोहिणी बलराम की मां हैं। बलराम ने भी अहिंसा का मार्ग चुना। उधर, कृष्ण की बहन, जिनकी नाक काट दी गई थी, एक साध्वी बनीं। उल्लेखनीय बात यह है कि ओडिशा के पुरी क्षेत्र में सुभद्रा देवी को ‘चेपि-नाकी’ कहकर चिढ़ाया जाता है। कुछ विद्वान इसे जैन परंपरा के प्रभाव की संभावित स्मृति के रूप में देखते हैं। एक दिन ये सुभद्रा वन में चिंतन कर रही थीं। तब कुछ वन निवासियों ने उन्हें देवी मानकर कुछ फल अर्पित किए। उनका नमन करते समय, जब उनकी आंखें बंद थीं, तभी एक बाघ ने सुभद्रा पर वार कर दिया। उन्होंने न बाघ का विरोध किया और न ही मदद के लिए चीखीं। आंखें खोलने पर वन निवासियों ने उस स्थान पर खून और अंतड़ियां देखीं। उन्होंने माना कि देवी उनके अर्पण से अप्रसन्न होकर चली गई थीं। यह भी माना जाता है कि देवी आर्यावर्त के दक्षिणी छोर पर स्थित विंध्य पर्वत की निवासी थीं, अर्थात वे विंध्यवासिनी थीं।
सुभद्रा और उनके भाइयों की यह कहानी हिंदू, बौद्ध और जैन आख्यानों में संभवतः विंध्य पर्वत के उत्तर में लगभग 2000 वर्ष पहले आकार लेने लगी थी। यही कारण है कि उनकी प्रतिमाएं मौर्य काल के सिक्कों पर और मध्य प्रदेश की गुफा कला में पाई जाती हैं। ये विंध्य पर्वत के उत्तर में मिले हैं।
यह संभव है कि दो देवताओं के बीच देवी को बिठाने के विचार को राजसी समर्थन 300 सीई में गुप्त काल में मिलने लगा। फिर, धीरे-धीरे, 500 सीई तक विंध्य पर्वत के दर्रों से होकर ये कहानियां दक्खन के क्षेत्र तक पहुंचने लगीं। यह भी एक संभावना के रूप में माना गया है कि वाकाटक राजाओं ने एलोरा में इस त्रिक की प्रतिमा बनाई। ये गुफाएं तब तक मुख्यतः बौद्ध धर्म से जुड़ी थीं। यहां देवी को शक्ति से जोड़ा गया।
देवी के बगल में दो देवता न केवल उनके भाई थे, बल्कि वे शिव और विष्णु से जुड़े थे। इस दृष्टिकोण से देखें तो देवी हिंदू धर्म के एक नए रूप का प्रतीक मानी जा सकती थीं। लेकिन समय के साथ, अधिकांश हिंदू धर्मावलंबी देवी और दो देवताओं के उस त्रिक के बारे में भूल गए, जिसकी पूजा एकानंशा, हल और चकरी के साथ शुरू हुई थी। उनकी जगह ब्रह्मा, विष्णु और शिव की त्रिमूर्ति को प्रधानता दी जाने लगी।
ओडिशा में जगन्नाथ पुरी का मंदिर एकमात्र बड़ा मंदिर है, जहां दो देवताओं से घिरी देवी की प्रतिमा पाई जाती है। लेकिन देवी के इस रूप को 12वीं सदी तक ही कालांकित किया गया है। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि इस क्षेत्र के जनजातीय लोग इस रूप की पूजा करते थे, जिसके बाद ब्राह्मण समुदाय ने उसे ओडिशा के वैष्णव मंदिरों में समाहित किया। यही कारण है कि जगन्नाथ पुरी मंदिर में अनुष्ठान ब्राह्मण और जनजातीय पुजारियों, दोनों द्वारा किए जाते हैं। यहां तीनों देवताओं को लकड़ी की तीन स्तंभ-रूपी प्रतिमाओं के रूप में दिखाया जाता है। बीच में स्थित देवी की प्रतिमा पीली है, जबकि उनके दोनों ओर श्याम व श्वेत रंग की दो प्रतिमाएं हैं। इन्हें साधारणतः सुभद्रा, कृष्ण और बलराम के रूप में पहचाना जाता है।
लेकिन मंदिर की कथाओं में इसकी और भी व्याख्याएं हैं। कुछ के अनुसार, ये तीन प्रतिमाएं हिंदू धर्म की तीन शाखाओं की प्रतीक हैं : बलराम शैव, सुभद्रा शाक्त और जगन्नाथ वैष्णव परंपरा के प्रतीक हैं। कुछ और लोग मानते हैं कि बीच में स्थित देवी शक्ति हैं और उनकी दोनों ओर उनके संरक्षक (यानी श्याम रंग के काल भैरव और श्वेत रंग के गोरा भैरव) स्थित हैं।
इस प्रकार, ओडिशा के समुद्रतट के इस हिंदू मंदिर में प्राचीन काल की एक स्मृति अपने सबसे नए रूप में आज भी जीवित दिखाई देती है।
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रसरंग में मायथोलॉजी:जैन परंपरा से जगन्नाथ पुरी तक, सुभद्रा और कृष्ण-बलराम की कहानी
