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Aarti Jerath Column | Gen-Alpha School Protests Expose Education Crisis


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42 मिनट पहले

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आरती जेरथ राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar

आरती जेरथ राजनीतिक टिप्पणीकार

‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के चलते पहली बार हमें उस भयावह वास्तविकता का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिसके साथ देशभर के कई प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के विद्यार्थी हर दिन जीते हैं। इनमें से कुछ स्कूलों की हालत इतनी खस्ता है कि स्कूली बच्चे- या कहें जेन अल्फा- हाल के सीजेपी-नेतृत्व वाले जेन-जी प्रदर्शनों से प्रेरित होकर सड़कों पर उतर आए हैं और टॉयलेट, पेयजल, कक्षाओं, पक्की सड़कों और सबसे बढ़कर शिक्षकों जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं।

जेन-अल्फा के विरोध-प्रदर्शन यूपी, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र और बिहार तक पहुंच चुके हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक को लेकर जेन-जी ने देशभर के प्रमुख शहरों को ठप कर दिया था और शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया था। इससे सरकार पहले ही बैकफुट पर थी। लेकिन स्कूली बच्चों का प्रदर्शन करना तो सरकार के लिए दुःस्वप्न जैसी स्थिति है। इन बच्चों पर पुलिस भी बलप्रयोग नहीं कर सकती।

विडम्बना तो यह है कि सरकार का अपना आधिकारिक आंकड़ा ही ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की बदहाल स्थिति की तस्वीर पेश करता है। नीति आयोग के एक हालिया सर्वेक्षण से पता चला है कि पिछले एक दशक में 94,000 से अधिक स्कूल बंद हो चुके हैं।

इनमें अकेले यूपी के 26,000 स्कूल शामिल हैं। सरकारी स्कूलों को चलाए रखने के लिए घटते वित्तीय संसाधनों के अलावा, उच्च माध्यमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ने की ऊंची दर का मतलब है कि कक्षाएं खाली हो रही हैं। करीब 73 प्रतिशत विद्यार्थी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं।

नीति आयोग के सर्वेक्षण में इस ऊंची ड्रॉप-आउट दर के कई कारण बताए गए हैं। जिन अभिभावकों की आर्थिक क्षमता है, वे अपने बच्चों को अपेक्षाकृत महंगे निजी स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं, जहां शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर होती है।

जो ऐसा नहीं कर सकते, वे माध्यमिक स्तर पर अपने बच्चों को स्कूल से निकाल लेते हैं, क्योंकि सरकारी संस्थानों में भी यूनिफॉर्म, किताबों, परीक्षा शुल्क आदि जैसे खर्च हैं, जिन्हें वहन करना उनके लिए संभव नहीं होता। इसके विपरीत, प्राथमिक शिक्षा लगभग पूरी तरह निःशुल्क है।

गरीब परिवारों पर आर्थिक दबाव भी ऐसे हैं कि बच्चों को परिवार की आय बढ़ाने के लिए स्कूल छोड़कर कामकाज में लगना पड़ता है। वर्ष 2020-21 के पीरियोडिक लेबर-फोर्स सर्वे में पाया गया कि 14 से 17 वर्ष उम्र के 31 प्रतिशत किशोर काम कर रहे थे, जबकि 25 प्रतिशत लड़कियों ने घरेलू कामों में अपनी मांओं की मदद करने के लिए पढ़ाई छोड़ दी थी।

जहां केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का स्कूली बुनियादी ढांचे पर वार्षिक ट्रैकर एक बेहद अच्छी तस्वीर पेश करता है, वहीं राजस्थान सरकार के 2025 के एक सर्वेक्षण के अनुसार जमीनी हकीकत इससे अलग है। सर्वेक्षण में राज्य के हजारों स्कूल परिसरों में गंभीर संरचनात्मक और बुनियादी ढांचे से जुड़ी कमियों को उजागर किया गया है।

मसलन, करीब 87,000 कक्षाएं जर्जर हालत में थीं, जिसके बाद न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा और उनके इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई। राज्य के 64,000 स्कूलों में से 2,000 से अधिक में टॉयलेट्स नहीं थे, जबकि 1,000 से अधिक में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी। 600 से अधिक स्कूलों के पास अपने भवन तक नहीं थे और छात्रों को टिन की छतों के नीचे या पेड़ों के नीचे पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ता था।

हाल ही में लखनऊ में सर्वोदय स्कूल की 250 छात्राओं ने शिक्षक की कमी और खराब सुविधाओं के खिलाफ भारी बारिश में भी विरोध-मार्च निकाला। गया में छात्रों ने खराब गुणवत्ता वाले मध्याह्न भोजन, खराब पड़े हैंडपंपों और गंदे टॉयलेट्स के विरोध में स्थानीय अधिकारियों के कार्यालयों तक मार्च किया। क्या यही वह युवा आबादी है, जिसे विकसित भारत के लिए हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड माना जा रहा है?

जिला प्रशासन अब जेन-अल्फा द्वारा उठाए गए मुद्दों के समाधान के लिए भाग-दौड़ कर रहा है। लेकिन लगता है कि जेन-अल्फा अब जेन-जी की ही तरह आगे बढ़ चुका है। और दोनों में से कोई भी पीढ़ी तब तक नहीं रुकेगी, जब तक सरकारें काम करना शुरू नहीं करतीं।

जेन-अल्फा द्वारा उठाए गए मुद्दों के समाधान के लिए अब गहमागहमी दिख रही है। लेकिन लगता है कि जेन-अल्फा, जेन-जी की ही तरह आगे बढ़ चुका है। और दोनों में से कोई भी पीढ़ी तब तक नहीं रुकेगी, जब तक सरकारें काम करना शुरू नहीं करतीं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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