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11 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

हममें से कितने लोग जानते हैं कि अकेली कंप्यूटर साइंस की डिग्री अब जॉब मार्केट का ‘गोल्डन टिकट’ नहीं रही। दुनियाभर के कॉलेजों ने बीते दो दशकों में कंपनियों की जरूरत से कहीं ज्यादा कोडर तैयार कर दिए हैं। एआई ने इस ओवर-सप्लाई को और बदतर कर दिया। फिर भी लगता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग यही राह चुन रहे हैं। कम से कम आंकड़े तो यही बताते हैं।

एआई, मशीन लर्निंग, डेटा साइंस और सेमीकंडक्टर जैसे विषयों में बढ़ती दिलचस्पी ने 2021 के मुकाबले 2026 में बीटेक में हुए एडमिशन्स की संख्या को बढ़ा दिया है। इस अखबार की एक हालिया रिपोर्ट में भोपाल का जिक्र था, जहां 2026 में एडमिशन्स की संख्या 49,151 तक पहुंच गई, जबकि 2021 में यह 35,169 थी।

ऐसी दुनिया में आज ह्यूमन स्किल बहुत अहम हो गया है, जिसमें एआई ज्यादा जटिल काम कर रहा है और क्षेत्रों को ऐसे तरीकों से बदल रहा है, जिनका हम पूरी तरह अनुमान नहीं लगा सकते। विशेषज्ञों का कहना है कि शायद अब समय आ गया है कि तकनीक के साथ एंथ्रोपोलॉजी, फिलॉसफी और मैथमैटिक्स जैसे कुछ क्लासिक विषयों की पढ़ाई फिर से की जाए या या टेक्नोलॉजी में बैचलर डिग्री के बाद मेजर (मुख्य विषय) के तौर पर इनकी पढ़ाई की जाए।

एंथ्रोपोलॉजी: यह स्टूडेंट्स को मानव-केंद्रित नजरिया देती है, जो एडवांस डिजिटल लैंडस्केप्स को बनाने, उन्हें इवेल्युएट करने और उनमें आगे बढ़ने के लिए जरूरी है। इंसानी व्यवहार, रीति-रिवाजों और विविध वैश्विक नजरियों को समझकर स्टूडेंट्स तकनीकी क्षमता और इंसानी जरूरतों के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को पाट सकते हैं।

एंथ्रोपोलॉजी स्टूडेंट्स को सिर्फ बेसिक यूजर एक्सपीरियंस (यूएक्स) मेट्रिक्स से आगे जाकर यह समझने में मदद करती है कि सांस्कृतिक मान्यताएं कैसे टेक्नोलॉजी एडॉप्शन को आकार देती हैं। टेक कंपनियां और रिसर्च लैब ऐसे लोगों को बड़े पैमाने पर भर्ती करती हैं, जो क्वालिटेटिव ह्यूमन डेटा को क्वांटिटेटिव मेट्रिक्स के साथ जोड़ सके।

एंथ्रोपोलॉजी में प्रशिक्षित स्टूडेंट्स कॉरपोरेट क्षेत्र में, खासतौर पर इंटरडिसिप्लिनरी जॉब्स के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं। मसलन, यूएक्स रिसर्चर्स एंड प्रोडक्ट स्ट्रैटेजिस्ट, एआई एथिक्स ऑफिसर्स एंड पॉलिसी एडवाइजर्स, डिजाइन एंथ्रोपोलॉजिस्ट एंड डेटा स्ट्रैटेजिस्ट।

फिलॉसफी: कई एआई प्रोजेक्ट खराब कोड की वजह से नहीं, बल्कि इस बात की स्पष्ट सोच न होने के कारण विफल होते हैं कि उस टूल का असल मकसद क्या है। फिलॉसफी, डेवलपर्स को यह सवाल पूछने में मदद करती है कि किसी सिस्टम को बनाने की जरूरत क्यों है, इससे पहले कि वे यह सोचने में जुट जाएं कि उसे ऑप्टिमाइज कैसे करें।

यह कॉग्निटिव ट्रैप से बचने में मदद करती है, खासकर ऐसी दुनिया में जहां एआई तत्काल जवाब देने को बढ़ावा देता है। फिलॉसफी सिखाती है कि अनिश्चितता की स्थिति को कैसे संभाला जाए, कॉग्निटिव शॉर्टकट्स को कैसे स्क्रूटनाइज किया जाए और जटिल समस्याओं को हल करते वक्त इंसानी पूर्वाग्रहों से कैसे बचा जाए।

तकनीकी जानकारी के साथ बायोएथिक्स और फिलॉसफी ऑफ माइंड को मिलाकर पढ़ने से स्टूडेंट्स एआई एथिक्स और गवर्नेंस जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों को लीड करने के लिए तैयार हो सकते हैं। फिलॉसफी को टेक बैकग्राउंड के साथ मिलाओ तो यह जॉब मार्केट की स्थिति को बेहतर बनाती है।

मैथमैटिक्स: एआई मॉडलिंग में काफी मैथ्स शामिल होती है। एआई के जरिए नकल करने वालों की तुलना में वे हाथ से समस्या हल करने का तरीका जानते हैं। आजकल इंटरव्यू में इन टेक स्टूडेंट्स को व्हाइटबोर्ड दिया जाता है और इंटरव्यूअर कंपनी की कोई समस्या बता कर उनसे बोर्ड पर इसका समाधान करने के लिए कहता है।

वैसे भी एआई ने वर्चुअल इंटरव्यू को कम भरोसेमंद बना दिया है। जो छात्र हाथ से समस्याएं हल करने की प्रैक्टिस करते हैं, वे इंटरव्यू में अलग नजर आते हैं। ऑनर्स के साथ ग्रेजुएशन करने या कोई अनोखा प्रोजेक्ट पब्लिश करने के लिए आप सिर्फ कोड को कॉपी-पेस्ट नहीं कर सकते। आपको किसी खास डेटा सेट के हिसाब से कस्टम लॉस फंक्शन या ऑप्टिमाइजेशन कंस्ट्रेंट डिजायन करने होते हैं, जिसके लिए अलजेब्रिक ऑप्टिमाइजेशन की गहरी समझ जरूरी है।

कैंपस प्लेसमेंट के दौरान टॉप-टियर टेक कंपनियां शायद ही कभी आपसे सिंटैक्स के बारे में पूछती हैं, क्योंकि पाइ-टॉर्च या टेंसर-फ्लो जैसे फ्रेमवर्क लगातार बदलते रहते हैं। इसके बजाय इंटरव्यूअर्स आपकी मूल प्रॉब्लम-सॉल्विंग क्षमताओं को परखते हैं।

फंडा यह है कि कॉलेज स्टूडेंट्स और टेक क्षेत्र के एम्प्लॉयी यह समझ रहे हैं कि तेजी से बदलते वर्कप्लेस पर अलग तरह के स्किल फायदेमंद हैं। उपरोक्त तीन क्षेत्रों के अलावा भी वे ऐसे नए क्षेत्रों को खोज रहे हैं, जिनमें पढ़ाई कर सकें और अपने वर्कप्लेस पर आगे बढ़ सकें।

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