रीटा कोठारी का कॉलम:दु:ख को लेकर हमारी समझ भी समय के साथ बदलती गई है
कभी-कभी कोई फिल्म, फिल्म न रहकर एक देश बन जाती है, जहां हम चले जाते हैं अनजाने में, सुनते हुए, गुनगुनाते हुए। एक ऐसी ही यात्रा हो गई, जब यह गाना जेहन में बस सा गया- ‘न मिलता गम तो बर्बादी के अफसाने कहां जाते, अगर दुनिया चमन होती तो वीराने कहां जाते।’ अगर दु:ख…
