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Being Taken For Granted Signs; Partner Family – Childhood Comparison


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8 मिनट पहले

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सवाल- मेरी उम्र 30 साल है। मुझे ऐसा लगता है कि जिंदगी में हर कोई मुझे टेकेन फॉर ग्रांटेड लेता है। बचपन से मुझे ऐसा महसूस होता रहा है। पेरेंट्स ने हमेशा मेरी बड़ी बहन को ज्यादा महत्व दिया, जो दिखने में मुझसे ज्यादा सुंदर थी। स्कूल में टीचर्स भी उसे ही ज्यादा प्यार करते थे। सारे रिश्तेदार भी उसी की तारीफ करते थे। मुझे हर कोई टेकेन फॉर ग्रांटेड लेता था। अब मैं बड़ी हो गई हूं, लेकिन ये कहानी अभी भी नहीं बदली। अब रिलेशनशिप में पार्टनर मुझे टेकेन फॉर ग्रांटेड लेता है। मैं उसे इतना इंपॉर्टेंस देती हूं, ख्याल रखती हूं, सब करती हूं, लेकिन बदले में मुझे उतनी इंपॉर्टेंस नहीं मिलती। क्या पूरी जिंदगी मेरे बचपन की कहानी ही दोहराई जाती रहेगी? मैं इस नरेटिव को कैसे बदलूं?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बचपन में हमें जैसा महत्व मिलता है, उसका असर आगे के रिश्तों पर भी पड़ता है। अगर बचपन में लगातार दूसरों से तुलना हुई हो और कम अहमियत मिली हो तो कई बार बड़े होने के बाद भी हम खुद को उसी नजर से देखते हैं। इससे धीरे-धीरे अपने बारे में एक धारणा बन जाती है कि-

“मैं दूसरों से कम महत्वपूर्ण हूं।”

बड़े होने पर जब रिश्ते में सामने वाला उतना अटेंशन नहीं देता, जितनी हमें उम्मीद होती है तो हम सिर्फ उस घटना को नहीं देखते। हम उसे अपनी पुरानी धारणा से जोड़ लेते हैं।

यहीं से एक ऐसा पैटर्न बनता है, जिसमें व्यक्ति दूसरों को खुश रखने के लिए जरूरत से ज्यादा कोशिश करने लगता है। अपनी जरूरतें पीछे कर देता है। इसके पीछे उम्मीद होती है कि बदले में उसे प्यार और महत्व मिलेगा। लेकिन जब ऐसा नहीं होता तो बचपन वाली वही भावना फिर मजबूत हो जाती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि आगे की पूरी जिंदगी भी इसी पैटर्न पर चलेगी।

टेकेन फॉर ग्रांटेड का संभावित पैटर्न समझिए-

क्या हर बार गलती आपकी सोच की ही है?

नहीं, यहां थोड़ा रुककर स्थिति को दो तरफ से देखना जरूरी है।

  • जब आपको लगता है कि कोई आपको टेकन फॉर ग्रांटेड ले रहा है तो सिर्फ अपनी सोच पर सवाल करना काफी नहीं है।
  • यह भी देखना होगा कि सामने वाला वास्तव में आपके साथ कैसा व्यवहार कर रहा है।

हो सकता है कि बचपन के अनुभवों की वजह से आप दूसरों के व्यवहार को जल्दी अपनी वैल्यू से जोड़ लेती हों। लेकिन दूसरी तरफ यह भी संभव है कि आपका पार्टनर सच में आपकी भावनाओं और जरूरतों को पर्याप्त महत्व नहीं दे रहा हो। इसलिए खुद को बदलने का मतलब यह नहीं है कि हर स्थिति में अपनी ही गलती मान लें। अगर सामने वाला व्यक्ति-

  • बार-बार आपकी भावनाओं को नजरअंदाज करता है।
  • आपकी सीमाओं का सम्मान नहीं करता।
  • रिश्ते में सिर्फ आप ही कोशिश कर रही हैं।

तो उसके व्यवहार को भी गंभीरता से देखना जरूरी है।

क्या आप दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर हैं?

अब यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। पिछले दो हफ्तों को ध्यान में रखकर नीचे ग्राफिक्स में दिए सवालों के जवाब दें। हर सवाल को 0 से 3 अंक दें। जैसेकि अगर आपका जवाब ‘बिल्कुल नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘हां’ है तो 3 नंबर दें। इससे पता चलेगा कि आप दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर हैं या नहीं?

यह कोई डायग्नोसिस नहीं है। इसका मकसद सिर्फ यह समझना है कि क्या आपकी अपनी राय पर दूसरों की प्रतिक्रिया का असर ज्यादा हो रहा है।

सेल्फ हेल्प के टूल्स अपनाने के बाद आपको दोबारा ये सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट करना होगा। इससे आप अपनी प्रोगरेस को नोट कर पाएंगी।

इस नैरेटिव को कैसे बदलें?

सेल्फ एसेसमेंट के बाद अब सबसे जरूरी सवाल ये है कि इस नरेटिव को बदलें कैसे। जीवन को बेहतर कैसे बनाएं। इसके लिए मनोविज्ञान में इस्तेमाल होने वाली कुछ CBT यानी कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी मददगार हो सकती है। इसका मकसद अपनी सोच, भावनाओं और वास्तविक स्थिति के बीच फर्क करना सीखना है। यहां आपको चार हफ्तों का एक आसान अभ्यास दे रहे हैं। इसे लगातार करके देखें और हर हफ्ते अपने अनुभव को नोट करें।

पहला हफ्ता:

पुराने पैटर्न को पहचानें

कई बार हमें सिर्फ इतना पता होता है कि सामने वाले के व्यवहार से बुरा लगा। लेकिन अगर आप यह समझना चाहती हैं कि उस घटना ने आपको इतना प्रभावित क्यों किया तो घटना और उसके बाद मन में आई सोच को अलग-अलग देखना जरूरी है।

उदाहरण:

आपने पार्टनर के किसी जरूरी काम में उसकी मदद की और उसने इसके लिए ‘थैंक्यू’ नहीं कहा। घटना इतनी सी है। लेकिन आपके मन में तुरंत यह विचार आ गया कि “मैं उसके लिए इंपॉर्टेंट नहीं हूं।”

लेकिन हो सकता है कि सामने वाला उस समय व्यस्त रहा हो या उसने बात पर ध्यान ही न दिया हो। लेकिन अगर यही व्यवहार लगातार रिपीट हो रहा है तो इसे नजरअंदाज न करें। यहीं से अभ्यास शुरू होता है। जब भी ऐसी कोई बात आपको बहुत परेशान करे तो खुद से कुछ सवाल पूछें-

इस तरह धीरे-धीरे आप भावना और तथ्य के बीच अंतर करना सीखेंगी।

दूसरा हफ्ता:

अपनी अच्छाइयां देखें

हम अक्सर अपनी अच्छी चीजों को तभी मानते हैं, जब कोई दूसरा उनकी तारीफ करे। इस सोच को बदलना जरूरी है। इसके लिए रोज रात को अपने दिन की एक ऐसी बात लिखें, जिसमें आपको अपनी कोई अच्छी खूबी दिखाई दी। इसमें अपने लिए किया गया कोई छोटा काम भी शामिल कर सकती हैं, जैसेकि-

  • अगर आपने किसी दोस्त की बात धैर्य से सुनी तो इसमें आपकी संवेदनशीलता दिखाई देती है।
  • आपने थकान होने पर रेस्ट किया तो यह भी अपनी जरूरत समझने की क्षमता है।
  • आपने किसी बात पर अपनी सीमा तय की तो यह भी एक अच्छी बात है।

रोज रात में सोने से पहले खुद से ये सवाल पूछें-

इससे धीरे-धीरे आपका ध्यान इस बात से हटेगा कि “दूसरे मेरे बारे में क्या सोचते हैं?” और इस पर जाएगा कि “मैं अपने बारे में क्या देख सकती हूं?”

तीसरा हफ्ता:

अपने फैसलों पर भरोसा करें

अगर आपको किसी काम के बाद तुरंत यह जानने की जरूरत महसूस होती है कि सामने वाले को आपका काम पसंद आया या नहीं तो इस आदत को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश करें। इसके लिए-

  • पहले कोई सामान्य काम चुनें।
  • खुद तय करें कि इस काम के लिए कितनी कोशिश पर्याप्त है।
  • काम पूरा होने के बाद तुरंत किसी से यह न पूछें कि आपने सही किया या नहीं।
  • पहले खुद आकलन करें।
  • अगर आश्वासन लेने का मन करे तो खुद से पूछें- “मुझे अभी किसी की राय की जरूरत है या सिर्फ यह सुनना है कि मैंने अच्छा किया?“
  • दूसरों की राय लेना गलत नहीं है। तारीफ सुनना भी स्वाभाविक रूप से अच्छा लगता है।
  • लेकिन अपनी सेल्फ-इमेज को दूसरों की राय पर न टिकाएं।

चौथा हफ्ता:

अपनी जरूरतें समझें

किसी रिश्ते में अपनी जरूरत बताना स्वार्थी होना नहीं है। अगर आपको लगातार लगता है कि रिश्ते में सिर्फ आप ही पहल कर रही हैं तो इस बात को मन में दबाए रखने की बजाय शांत तरीके से सामने रखना जरूरी है। आप पार्टनर से कह सकती हैं-

“मैं अक्सर तुम्हारे लिए चीजें प्लान करती हूं और तुम्हारा ख्याल रखती हूं। जब मेरी तरफ से ही हमेशा पहल होती है, तो मुझे उपेक्षित महसूस होता है। मैं चाहती हूं कि तुम भी रिश्ते में पहल करो।”

यहां मकसद सामने वाले को दोष देना नहीं है। अपनी भावना और जरूरत साफ बताना है। इसके बाद पार्टनर का व्यवहार देखें-

  • क्या वह आपकी बात सुनता है?
  • क्या आपकी जरूरत समझने की कोशिश करता है?
  • क्या उसके व्यवहार में बदलाव आता है?
  • क्या वह बदलाव कुछ दिनों के बजाय लगातार दिखाई देता है?

यहीं से आपको अपने रिश्ते की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी।

इसके साथ ही रिश्ते में हेल्दी बाउंड्री बनाने के लिए कुछ बातें ध्यान रखें।

प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी?

वैसे तो सेल्फ हेल्प मददगार और कारगर हो सकता है, लेकिन इन स्थितियों में साइकोलॉजिस्ट की मदद लेना बेहतर है-

  • अगर यह पैटर्न रिश्तों को प्रभावित कर रहा है।
  • रोजमर्रा की जिंदगी में परेशानी पैदा कर रहा है।
  • खुद के बारे में लगातार नकारात्मक सोच बनी हुई है।
  • लंबे समय तक उदासी बनी रहती है।
  • किसी काम में मन नहीं लगता है।
  • रात में नींद नहीं आती है।
  • रिश्ते में अपमान, धमकी या डर की स्थिति है।
  • खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या के विचार आते हैं।

अंतिम बात

बचपन में बार-बार तुलना होने से किसी बच्चे के मन में यह धारणा बन सकती है कि वह दूसरों से कम है। लेकिन यह सिर्फ धारणा है, कोई अंतिम सच नहीं है। बड़े होने के बाद हमें यह सीखने का मौका मिलता है कि अपनी कीमत दूसरों की प्रतिक्रिया से अलग कैसे देखी जाए।

रिश्ते में प्यार और सम्मान दोनों तरफ से मिलना चाहिए। इसलिए आपको हर किसी को खुश करके यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि आप महत्वपूर्ण हैं।

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ग्राफिक्स- महेंद्र वर्मा

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