दुनिया के सबसे अमीर शख्स इलॉन मस्क का एक पोस्ट वायरल है। वो लिखते हैं- मेरा बेटा मैंडरिन (चाइनीज भाषा) सीख रहा है। मई 2026 में मस्क अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ चीन दौरे पर गए, तब भी उनका 6 साल का बेटा चीन की पारंपरिक कढ़ाई वाली जैकेट पहने साथ दिखा था।
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ट्रम्प की पोती से जुकरबर्ग की बेटी तक, चाइनीज सीखने वाले अरबपतियों के बच्चों की लंबी लिस्ट है। आखिर बच्चों को मैंडरिन क्यों सिखा रहे दुनिया के सबसे ताकतवर लोग; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: किन ताकतवर हस्तियों के बच्चे चाइनीज सीख रहे हैं?
जवाब: अलग-मौकों पर इन शख्सियतों के बच्चों के चाइनीज सीखने का खुलासा हुआ…
डोनाल्ड ट्रम्प की पोती: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 2026 में अमेरिका गए थे। तब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की 6 साल की पोती अरैबेला और 4 साल के पोते जोसेफ ने चाइनीज में गाना सुनाया था। इसके बाद रिपोर्ट्स आईं कि अमेरिका में चीनी नैनी की डिमांड बढ़ गई थी। ट्रम्प की बेटी इवांका भी मैंडरिन बोल-समझ सकती हैं।

अरैबेला ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने चीनी न्यू ईयर पर गाया जाने वाला गाना गाया था।
व्लादिमीर पुतिन की पोती: रूसी राष्ट्रपति ने 2024 में बताया था कि उनके घर के बच्चे चीनी बोलते हैं। पुतिन के प्रेस सेक्रेटरी दिमित्री पेस्कोव की बेटी भी रूसी भाषा से पहले चाइनीज बोलने लगी थी, क्योंकि उसकी नैनी चीनी मूल की थी। मई 2026 में चीन दौरे पर पहुंचे पुतिन ने बताया था कि एक लाख से ज्यादा रूसी चाइनीज सीख रहे हैं।
जेफ बेजोस के चारों बच्चेः अमेजन के फाउंडर जेफ बेजोस की पूर्व पत्नी मैकेंजी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके चारों बच्चे मैंडरिन सीखते हैं।

जेफ बेजोस के 3 बेटे और एक बेटी है। मैकेंजी के मुताबिक वो अपने बच्चों को अलग-अलग तरह की चीजें सिखाती हैं, जैसे- सिंगापुर का गणित, पड़ोसी के बच्चों के साथ स्पोर्ट्स।
किंग चार्ल्स का पोता: ब्रिटेन के किंग चार्ल्स के पोते और राजगद्दी के दूसरे वारिस प्रिंस जॉर्ज को स्कूल में चाइनीज सिखाई गई है। प्रिंस जॉर्ज अभी 12 साल के हैं।

ब्रिटेन के किंग चार्ल्स के बाद उनके बेटे विलियम सत्ता के पहले दावेदार हैं। विलियम के बड़े बेटे जॉर्ज सत्ता के दूसरे दावेदार हैं। जॉर्ज ने स्कूल में चीनी सीखी है, लेकिन कभी पब्लिक में बोलते नहीं दिखे।
मार्क जुकरबर्ग की बेटी: फेसबुक फाउंडर ने 2014 में बीजिंग की सिंगहुआ यूनिवर्सिटी में छात्रों से चाइनीज में बात की थी। पत्नी प्रिसिला चैन चीनी मूल की हैं। उनकी तीनों बेटियों को शुरुआत से ही अंग्रेजी और चाइनीज सिखाई गई है। बड़ी बेटी मैक्स का तो चीनी नाम भी है।

मार्क जुकरबर्ग ने जब अपनी बड़ी बेटी मैक्स के साथ पहला वीडियो शेयर किया था, वो चीनी भाषा में किया था।
इसी तरह अमेरिकी इन्वेस्टर और लेखक जिम रॉजर्स की 2 बेटियों- हैप्पी और बी रॉजर्स ने मैंडरिन सीखी है। 2017 में दोनों का चीनी गाना गाते हुए वीडियो वायरल हुआ था। रॉजर्स का मानना है कि 21वीं सदी में चीन बहुत जरूरी देश होगा। बच्चों को चीनी वातावरण देने के लिए परिवार सिंगापुर शिफ्ट हो चुका है।
सवाल-2: आखिर अरबपतियों के बच्चे चाइनीज क्यों सीख रहे हैं?
जवाब: लंदन के किंग्स कॉलेज में चाइनीज स्टडीज के प्रोफेसर केरी ब्राउन के मुताबिक, इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ है। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और मैनुफैक्चरिंग हब है। तेज इनोवेशन के साथ ग्लोबल डॉमिनेंस बढ़ा रहा है।
अरबपतियों का मानना है कि आने वाला दौर चीन का है, इसलिए वो अपने बच्चों को चीनी भाषा सिखा रहे हैं। इतिहास में भी देश के ताकतवर होते ही उसकी भाषा फैलती रही है…
- 16वीं सदी तक फ्रांस ने दुनियाभर में अपनी कॉलोनियां फैला ली थी। अगली दो सदी तक दुनिया में फ्रेंच का दबदबा रहा।
- रूस की महारानी कैथरीन द ग्रेट की कई निजी चिट्ठियां फ्रेंच में हैं। ऑस्ट्रिया और जर्मनी के शाही दरबारों में भी राजा और मंत्रियों के बीच फ्रेंच में बातचीत के सबूत मिलते हैं। भारत में मैसूर के शासक टीपू सुल्तान फ्रेंच जानते थे।
- 1919 में पहला विश्व युद्ध खत्म होने के बाद वर्साय की संधि भी फ्रेंच और अंग्रेजी में लिखी गई। हालांकि यहां से फ्रेंच का दबदबा कम होने लगा।
- पहले विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्य का चरम आया। उनकी सभी कॉलोनियों में अंग्रेजी बोली जाती थी। 1930 के दशक में चीन के सबसे प्रभावशाली सोंग परिवार की तीनों बेटियां अमेरिका में पढ़ी और अच्छी अंग्रेजी बोलती थीं। भारत में भी राजघरानों के बच्चे अमेरिका और इंग्लैंड पढ़ने जाते थे।
- दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका सुपर पावर बनकर उभरा। इसके बाद अंग्रेजी ग्लोबल भाषा बन गई। आज यह दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। दुनिया की टॉप 1 करोड़ वेबसाइट में आधी से ज्यादा अंग्रेजी में है। प्रोग्रामिंग और कोडिंग में 90% अंग्रेजी का इस्तेमाल होता है।
- 1980 के दशक में जापानी अर्थव्यवस्था ने उड़ान भरी, तो एक छोटा दौर जापानी भाषा का भी आया। 1970 से 1980 के बीच अमेरिका में जापानी भाषा के विशेषज्ञ दोगुने हो गए थे। जापानी इकोनॉमी क्रैश हुई और जापानी सीखने का ट्रेंड पीछे छूट गया।
सवाल-3: लेकिन अरबपतियों के बच्चों के चाइनीज सीखने से होगा क्या? जवाबः बचपन से चाइनीज सीखने के 3 बड़े फायदे हैं… एलीट नेटवर्किंग: मैंडरिन जानने की वजह से इंटरनेशनल स्कूलों में चीनी रईस और डिप्लोमैट्स के बच्चों से घुल-मिल जाते हैं। बचपन से ही एक ‘ग्लोबल एलीट नेटवर्क’ तैयार होता है, जो भविष्य में काम आता है।
- चीनी संस्कृति की समझ बनना: चीन में बिजनेस सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि निजी रिश्तों और सम्मान का भी होता है। इसे चीन में ‘गुआंशी’ कहते हैं। बच्चे चीनी संस्कृति की इस बारीक समझ को बचपन से ही अपना लेते हैं।
- कारोबार में बढ़त: भविष्य में जब ये बच्चे अरबों डॉलर के बिजनेस या फंड संभालेंगे, तो चीनी अधिकारियों और डीलमेकर्स से उनकी भाषा में बात करके ये ऐसे सौदे कर सकेंगे, जो दूसरे नहीं कर पाते।
- ग्लोबल डिप्लोमेसी में फायदा: बड़े देशों के बीच चीन एक बड़ा फैक्टर है। जो बच्चे इंटरनेशनल लॉ, पॉलिटिक्स या डिप्लोमेसी में करियर बनाएंगे, उनके लिए चाइनीज जानना कारोबारी और सरकारी स्तर पर एक बड़ा प्लस पॉइंट होगा।
मैनहैटन के कैरोसेल ऑफ लैंग्वेजेज की फाउंडर पैट्रिजिया कॉर्मन मानती हैं कि यह बच्चों के भविष्य में एक बड़ा निवेश है। सिर्फ चीन के उभरते बाजार की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए भी कि चाइनीज दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली मातृभाषा है। बच्चे भी इसे सीखना पसंद करते हैं, क्योंकि इसमें ध्वनियां हैं।

सवाल-4: अंग्रेजी की तरह क्या अब चाइनीज ग्लोबल लैंग्वेज बनने वाली है?
जवाब: इस पर एक्सपर्ट्स की अलग-अलग राय हैं…
- लिजुन जियांग (युन्नान वोकेशनल कॉलेज ऑफ ट्रांसपोर्टेशन, चीन): ग्लोबल लैंग्वेज के तौर पर चाइनीज अंग्रेजी को अगली सदी तक रिप्लेस नहीं कर पाएगी। भले ही दुनिया पर चीन का आर्थिक और राजनीतिक दबदबा बढ़ रहा हो।
- डेविड क्रिस्टल (मशहूर ब्रिटिश भाषाविद और लेखक): अंग्रेजी को कोई भाषा आसानी से नहीं हटा सकती। चीन में भी लोग अंग्रेजी सीख रहे हैं। भविष्य में चाइनीज अहम और जरूरी भाषा हो सकती है, लेकिन अभी ग्लोबल लैंग्वेज बनने की संभावना कम है।
- कैट कार्डेन ब्राउन (एप्सम कॉलेज, मलेशिया): मैंडरिन कभी-न-कभी अंग्रेजी को हटाकर वैश्विक भाषा बनेगी, यह डिबेट का मुद्दा है, लेकिन इस संभावना को नकार देना बेवकूफी होगी।
दरअसल, अंग्रेजी में सिर्फ 26 अक्षर हैं, जिन्हें आसानी से सीखा जा सकता है। जबकि चाइनीज में एक लाख से ज्यादा सिंबल्स हैं। पढ़ने-लिखने के लिए कम से कम 3500 सिंबल्स रटने पड़ते हैं और उन्हें अलग-अलग टोन में सीखना पड़ता है। ये प्रोसेस गैर-चीनी लोगों के लिए काफी कठिन है।
कोडिंग, इंटरनेट, एल्गोरिदम, रिसर्च पेपर, ग्लोबल ट्रेड, साइंस जैसे तमाम अहम क्षेत्रों में अंग्रेजी ही ज्यादातर इस्तेमाल होती है। यहां तक कि चीन के कॉलेज-यूनिवर्सिटी और कंपनियों में इंटरनेशनल डायलॉग्स के लिए अक्सर अंग्रेजी का इस्तेमाल होता है।
ऐसे में चाइनीज भाषा अचानक से अंग्रेजी को ग्लोबल लैंग्वेज के तौर पर रिप्लेस नहीं कर सकती है। हालांकि भविष्य में इसकी संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
सवाल-5: हिंदी की स्थिति क्या है, क्या इसे बोलने वाले भी बढ़ रहे हैं? जवाबः अंग्रेजी और मैंडरिन के बाद हिंदी तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। यह 37.5 करोड़ लोगों की मातृ भाषा भी है…

लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा अंग्रेजी है।

1999 से 2025 के बीच हिंदी के प्राइमरी स्पीकर्स, यानी जिनकी पहली भाषा हिंदी हो, लगभग दोगुने हुए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह आबादी का बढ़ना है। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत के 42.2 करोड़ लोग हिंदी बोलते थे, जो 2011 तक बढ़कर 52.83 करोड़ हो गए। यानी 25% से ज्यादा की बढ़त।
देश के 85% से ज्यादा हिंदी बोलने वाले उत्तर भारत के हिंदी बेल्ट जैसे- उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान वगैरह से आते हैं। हिंदी बेल्ट में जनसंख्या दक्षिण भारत के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ रही है।
नतीजतन, 1991 से 2011 के बीच जनगणना में तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम, मराठी और उर्दू जैसी भाषाओं का हिस्सा घटा, जबकि हिंदी अकेली ऐसी बड़ी भाषा रही जिसका राष्ट्रीय हिस्सा लगातार बढ़ा है।
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