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- Boria Majumdar Column | India Para Athletes Shine At Paris Paralympics
4 घंटे पहले
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बोरिया मजुमदार सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा के सहलेखक और खेल पत्रकार
यह 2010 के आखिरी महीनों की बात है। नई दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल अभी-अभी समाप्त हुए थे। कुछ एथलीट आपस में बातचीत कर रहे थे। तभी किसी ने एशियाई खेलों का जिक्र किया, जो एक महीने से भी कम समय दूर थे। दीपिका मलिक वहां मौजूद थीं।
वे बातचीत में शामिल हुईं और उन्होंने वहां मौजूद लोगों को बताया कि एशियाई पैरा खेल भी बस आने ही वाले हैं। तभी किसी ने पूछा कि ‘पैरा’ से उनका मतलब ‘पैराशूट’ है क्या?
15 साल पहले भारत में पैरा खेलों को लेकर शायद ही कोई संवेदनशीलता थी। लोग बिना यह समझे कि ऐसे शब्द दूसरों की भावनाओं को आहत कर सकते हैं, सहज ही अंधा, अपाहिज, लंगड़ा जैसे शब्द बोल देते थे। फिल्म “चिल्ड्रन ऑफ अ लेसर गॉड’ को अब चार दशक हो चुके हैं, जिसने श्रवण-दिव्यांगता से जूझ रही एक युवा महिला के संवेदनशील चित्रण के लिए मार्ली मैटलिन को अकादमी पुरस्कार दिलाया था। लेकिन फिल्म का शीर्षक ही इस बात की याद दिलाता था कि हम उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, जो हमसे ‘अलग’ हैं, खासकर शारीरिक रूप से।
पहले हमारे पैरा खिलाड़ियों को पदक बहुत कम मिलते थे और उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जाता था, जिसके वे हकदार थे। शायद यही वजह थी कि देवेंद्र झाझरिया के पिता ने 2004 पैरालिम्पिक से पहले उनसे कहा था कि अगर वे एथेंस में स्वर्ण जीतते हैं, तभी हालात बदलने की कोई संभावना होगी। अगर वे विफल होते, तो भारत में दिव्यांगता के साथ जी रहा हर व्यक्ति उनके साथ विफल होता। लेकिन देवेंद्र ने विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण जीता और बदलाव के बीज बो दिए गए।
पेरिस पैरालिम्पिक खेलों का उदाहरण लीजिए। इन खेलों को करीब से देखने वाले जानते थे कि भारत अच्छा प्रदर्शन करेगा। भारत ने 2023 पैरा एशियाई खेलों में 111 पदक जीते थे और अगस्त 2023 में हुई विश्व पैरा एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में भी शानदार प्रदर्शन किया था।
2022 से 2024 के बीच हमारे खिलाड़ियों ने निशानेबाजी, एथलेटिक्स, टेबल टेनिस और बैडमिंटन में अपनी अलग पहचान बनाई थी और पेरिस से इस प्रदर्शन के चरम पर पहुंचने की उम्मीद थी। फिर भी मीडिया का समर्थन बहुत कम था।
मुझसे बार-बार पूछा गया, इसका रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट क्या है? कितने लोग इसे देखेंगे? लेकिन यह केवल आंकड़ों का सवाल कब से हो गया? जैसे-जैसे पदकों की संख्या बढ़ेगी, देश में भी इसमें दिलचस्पी बढ़ने लगी। मैं किसी एक व्यक्ति को अलग से रेखांकित नहीं करना चाहता, लेकिन सच्चाई यह है कि इनमें से कई एथलीटों का इससे पहले मीडिया से कभी सामना ही नहीं हुआ था। मुझे यकीन है कि हम लॉस एंजेलेस 2028 में पदक तालिका में शीर्ष 10 में जगह बना सकते हैं। देश में अब जिस तरह की प्रतिभा और क्षमताएं मौजूद हैं, उसे देखते हुए यह कोई दूर की कौड़ी नहीं है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

