- Hindi News
- Opinion
- Chetan Bhagat Column | Satya Niketan Education Crisis & Delhi Reality
3 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार
पहले यह माना जाता था कि एजुकेशन की मदद से ही छात्र अपनी बदहाली से छलांग लगाकर बाहर आ सकते हैं। आज भी ऐसा ही है, लेकिन फर्क इतना है कि यह छलांग अब लगातार कठिन होती जा रही है। सत्य निकेतन हादसे ने हमें यही बताया है।
यह दक्षिण दिल्ली की एक छोटी-सी बस्ती है, जो आलीशान कॉलोनियों से घिरी हुई है। यहां छोटे-छोटे भूखंडों पर बने तंग, एक-दूसरे में सिमटे मकान खरपतवार की तरह बढ़ते चले गए हैं। इनमें से कई इमारतों में छात्र छोटे-छोटे कमरे किराये पर लेकर रहते हैं।
वे वहां कॉलेज की पढ़ाई या प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते हुए रहते हैं। कॉलोनी में छात्र-अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाले तरह-तरह के कारोबार भी हैं- खाना पहुंचाने वाली सेवाएं, जेरॉक्स की दुकानें, चाय की थड़ियां, पेइंग गेस्ट (पीजी) और कोचिंग सेंटर संचालक। इन वस्तुओं और सेवाओं की उपलब्धता ही सत्य निकेतन जैसी बस्तियों को फलने-फूलने का अवसर देती है। यह किसी झुग्गी-बस्ती जैसी दिख सकता है, फर्क यह है कि यह शिक्षा-केंद्रित स्लम होती है।
छात्र आते-जाते रहते हैं; कुछ प्रवेश परीक्षाओं में सफल होते हैं, ज्यादातर नाकाम रहते हैं। लेकिन इन छात्रों को सामान और सेवाएं उपलब्ध कराने वाले कारोबारी लगातार बने रहते हैं। परीक्षाओं के नतीजे चाहे जो हों, वे हमेशा कमाई करते हैं।
मुनाफे की तलाश में गुणवत्ता की अनदेखी की जाती है और नियमों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है। बिना फायर-सेफ्टी वाला अवैध रूप से बना गेस्टहाउस भी किराये पर उठ जाता है, क्योंकि छात्रों के पास विकल्प ही क्या हैं? 80 गज के प्लॉट पर अनुमति से ज्यादा मंजिलें तान दी जाती हैं, लेकिन कोई समस्या नहीं। अगर कमरा खाली है, तो कोई ना कोई छात्र उसे ले ही लेगा। इमारत के चारों ओर बिजली के खुले तार लटक रहे हैं? क्या फर्क पड़ता है, जब तक सोने के लिए एक बेड मिल रहा हो?
बस इतना समझ लीजिए कि सत्य निकेतन की जिंदगी वैसी नहीं है, जैसी बॉलीवुड की कॉलेज कैंपस वाली फिल्मों में दिखाई जाती है। देशभर से जाने कितने युवा छात्र ऐसी जगहों पर आते हैं और खस्ताहाल, अवैध ठिकानों पर डेरा जमाते हैं। फिर शुरू होती है दो से पांच साल तक चलने वाली लंबी और कठिन यात्रा।
यह कोई कॉलेज होस्टल नहीं है। यहां न कोई ओरिएंटेशन होता है, न बैच के साथियों से मुलाकात। यहां छात्रों के लिए न कोई कॉमन रूम है, न खेल की सुविधाएं। न सांस्कृतिक गतिविधियां हैं, न पाठ्येतर गतिविधियां। यहां केवल एक ही उद्देश्य है और एक ही गतिविधि- जीवन की चक्की में पिसते रहना।
और वे पिसते रहते हैं- दिन-रात, इस उम्मीद में कि परीक्षा निकाल लेंगे। इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले के लिए, या मेडिकल कॉलेज में। या सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए- शीर्ष स्तर की सिविल सेवाओं से लेकर निचले स्तर की किसी सरकारी भर्ती तक।
कुछ भी आसान नहीं है। संभावनाएं बहुत कम हैं- पेपर-लीक हो या न हो। किसी को परवाह नहीं कि आपका दिन, महीना या साल खराब रहा। और जैसा कि हालिया हादसा दिखाता है, किसी को आपकी जिंदगी की भी परवाह नहीं है।
इससे हमें शर्म महसूस होनी चाहिए। हमें पूछना चाहिए कि एक देश और समाज के रूप में हम क्या कर रहे हैं? हम अगली पीढ़ी को कैसी संस्कृति सौंप रहे हैं? क्या संदेश दे रहे हैं? क्या यही कि भारत में जिंदगी ऐसी ही होती है?
हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं से बहुत कम अवसरों के लिए बेहद तीखी प्रतिस्पर्धा करने को कहती है, जबकि हमारा समाज एक अच्छी जिंदगी तक पहुंचने के लिए पर्याप्त वैकल्पिक रास्ते बनाने में विफल रहा है। और अवसरों की इस कमी के इर्द-गिर्द एक पूरा संदिग्ध बिजनेस-इकोसिस्टम खड़ा हो गया है। जब खुद हताशा एक उद्योग बन जाए, तो इसे क्या कहा जाना चाहिए?
सत्य निकेतन का अर्थ होता है- ‘सच्चाई का घर’। लेकिन इस हादसे ने छात्रों के जीवन की दु:खद सच्चाई को उजागर कर दिया है। हम चाहें तो इसे एक अलग-थलग घटना मानकर छोड़ सकते हैं, या इसका इस्तेमाल एक बड़ी सच्चाई का सामना करने के लिए कर सकते हैं- यह कि हमें इन हालात में आमूलचूल बदलाव करने होंगे।
हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं से बहुत कम अवसरों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा करने को कहती है। हमारा समाज अच्छी जिंदगी तक पहुंचने के लिए पर्याप्त रास्ते बनाने में विफल रहा है। और अवसरों की इस कमी के इर्द-गिर्द एक पूरा संदिग्ध बिजनेस-इकोसिस्टम खड़ा हो गया है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

