भास्कर की टीम ने DRG में सेवा दे रही लक्ष्मी उर्फ सनी और जवान बामन राम से बातचीत की है।
“मैं सिर्फ 15 साल की थी, जब नक्सली मुझे अपने साथ ले गए। छोटी उम्र में हाथ में बंदूक थमा दी। जवानों को मारना सिखाया। नक्सल संगठन में रहते हुए मेरी शादी हुई, लेकिन नक्सलियों ने मेरी आंखों के सामने ही मेरे पति को सूली पर लटका दिया। आज मैं DRG में हूं और
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“नक्सलियों ने मुझे पुलिस का मुखबिर बताकर मारना चाहा। मेरे परिवार को गांव से भगा दिया और मुझे गर्म लोहे से दागा। एक बार मुझे मारने आए तो मैं नहीं मिला, मेरे ही नाम के दो गांव वाले मिल गए और नक्सलियों ने उनकी हत्या कर दी। आज मैं DRG में हूं और उन्हीं नक्सलियों के खिलाफ बंदूक लेकर खड़ा हूं।”
ये दोनों घटनाएं बस्तर में नक्सल हिंसा के दौरान लोगों पर हुए अत्याचार की तस्वीर सामने लाती हैं। पहली कहानी सरेंडर महिला नक्सली लक्ष्मी उर्फ सनी की है, जो अब दंतेश्वरी फाइटर्स में महिला कमांडो हैं। दूसरी कहानी DRG जवान बामन राम की है, जो नक्सल हिंसा के पीड़ित रहे हैं। दोनों अब सुरक्षा बलों के साथ मिलकर नक्सलियों के खिलाफ काम कर रहे हैं।
पढ़िए दोनों की पूरी कहानी, नक्सलियों की प्रताड़ना से लेकर DRG में शामिल होने तक का सफर…
देखिए पहले ये तस्वीरें-

DRG के जवान ने हमसे बातचीत की। लेकिन वे अपना फेस नहीं दिखाना चाहते थे।

लक्ष्मी ओयामी के पति को नक्सलियों ने मार डाला था।
पढ़िए दोनों जवानों की कहानी…
मैं लक्ष्मी ओयामी हूं। बीजापुर जिले के गंगालूर की रहने वाली हूं। साल 2002 में मैं जब करीब 15 साल की थी, तब नक्सली लीडर गणेश उइके गांव आया था और वह मुझे और मेरे भाई को जबरदस्ती नक्सल संगठन में भर्ती करने लेकर चला गया था। हम बहुत गरीब परिवार से थे। माता-पिता खेती-किसानी का काम करते थे। मैं नक्सलियों के साथ नहीं जाना चाहती थी। मैं पढ़ाई करना चाहती थी।
मैं कई मुठभेड़ में शामिल रही। इसमें कई जवान मारे गए। मुझे ACM कैडर का चार्ज दिया गया था। मैं पश्चिम बस्तर डिवीजन में सक्रिय थी। भैरमगढ़, नेशनल पार्क, गंगालूर समेत अन्य जगहों पर रहकर काम की हूं। संगठन में रहते हुए ही मुझे DVCM कैडर के एक नक्सली के साथ प्यार हो गया था। संगठन में ही हमारी शादी हुई, लेकिन साल 2011-12 के आसपास पति ने अपना पद छोड़ दिया और गांव चले गए।
इस बीच पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी, जिसमें हमारे कई साथी मारे गए। इसके बाद नक्सलियों को शक हुआ कि मेरे पति पुलिस के लिए मुखबिरी कर रहे हैं। उन्हें गांव से उठा लिया गया। उस समय गणेश उइके समेत 100 से ज्यादा नक्सली वहां मौजूद थे। मैं भी उसी जगह थी। नक्सलियों ने मेरे पति को बहुत मारा।
मैंने उसे बचाने की बहुत कोशिश की थी, लेकिन नक्सलियों ने मेरी आंखों के सामने ही मेरे पति का हाथ बांधा और फिर उसे सूली पर टांग दिया। मैं अपनी आंखों के सामने ही अपने पति को सूली पर लटकता हुआ देखी, तब से मैं संगठन को छोड़ना है सोच ली थी। लेकिन मुझे संगठन से बाहर निकलने का मौका नहीं मिला।
मेरे भाई ने पहले ही सरेंडर कर दिया था और वे दंतेवाड़ा DRG में थे। साल 2021 में किसी तरह से मैं जंगल से बाहर आई। भाई ने मुझे दंतेवाड़ा पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करवाया। मुझ पर 5 लाख रुपए का इनाम घोषित था। अरनपुर IED ब्लास्ट में भाई भी शहीद हो गए। मेरे पति संतोष ओयामी की मेरे आंखों के सामने हत्या की गई।
इस बात का गुस्सा मेरे अंदर था और नक्सलियों से बदला लेने के लिए ही मैं DRG की दंतेश्वरी फाइटर टीम में शामिल हो गई। मैं पहले जंगल में घूमती थी, लेकिन तब मैं लोकतंत्र की विरोधी थी। हाथों में हथियार और काली वर्दी थी। जवानों की हत्या में शामिल थी, लेकिन मैंने दोबारा हथियार उठाया।
ये हथियार लोकतंत्र के विरोध में नहीं था, ये हथियार नक्सलियों के विरोध में था। देश की सुरक्षा के लिए है। नक्सलियों से अपना बदला लेने के लिए उठाया। दंतेश्वरी फाइटर्स का हिस्सा रहते हुए मैं कई बड़े ऑपरेशन में शामिल रही। कई नक्सलियों को ढेर किया है।
जब नक्शा संगठन में थी तब तिरंगा का विरोध करती थी, लेकिन अब तिरंगा को मैं सलामी देती हूं। बस्तर से भले ही नक्सली खत्म हो गए हैं। लेकिन उन्होंने मुझे जो जख्म दिया है। उसे में कभी भूल नहीं पाऊंगी।

नक्सल हिंसा पीड़ित जवान की कहानी
मेरा नाम बामन राम है। मैं तुलार गुफा का रहने वाला हूं। नक्सलियों को शक था कि मैं पुलिस की मुखबिरी करता हूं, इसलिए उन्होंने मुझे मेरे परिवार के साथ गांव से भगा दिया था। हम लोहंडीगुड़ा तरफ शिफ्ट हो गए थे, लेकिन अब जब नक्सली खत्म हुए तो हम फिर अपने गांव लौट आए हैं।
मैं DRG में पदस्थ हूं। उस समय इलाके में नीति, कमलेश जैसे बड़े नक्सली लीडर सक्रिय थे। उस समय गांव में एक मुठभेड़ हुई थी, जिसमें नक्सलियों को नुकसान हुआ था। उन्हें मुझ पर शक था कि मैं पुलिस की मुखबिरी किया हूं।
एक बार नक्सली गांव आए। उन्होंने लोहे की सरिया गर्म की और मुझे पैरों पर दाग दिया। जलने के निशान आज भी हैं। इसके बाद मैं अपने परिवार के साथ गांव छोड़कर चला गया। बाद में नक्सली दोबारा गांव आए।
गांव में मेरे नाम के दो और लोग भी थे। नक्सली भ्रम में उन दोनों को अलग-अलग दिनों में मैं समझकर उनकी हत्या कर दी। मैं साल 2024 में दंतेवाड़ा DRG में शामिल हुआ। नक्सली मेरे दुश्मन थे, इसलिए आज उन्हीं के खिलाफ लड़ रहा हूं।
मैंने सोच लिया था कि कभी आमना-सामना होगा तो जवाब जरूर दूंगा। मेरे गांव में भी नक्सली तिरंगा झंडा फहराने नहीं देते थे। उसकी जगह वे काला झंडा फहराते थे, लेकिन अब जब नीति उर्फ निर्मला मारी गई, नक्सली खत्म हुए तो गांव में भी तिरंगा झंडा फहराने लगा है।
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