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नई दिल्ली5 दिन पहले

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अब आप अपने सोने को बैंक लॉकर की तरह ज्वेलर्स (सर्राफा व्यापारी) के पास भी जमा कर सकेंगे। खास बात ये है कि इससे आपको 2.5% तक का ब्याज भी मिल सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार अगले दो हफ्तों के में एक नई और अपडेटेड ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम’ का एलान कर सकती है।

नई स्कीम में देशभर के सराफा व्यापारियों को ‘कलेक्शन पार्टनर्स’ के रूप में शामिल किया जा सकता है, जिससे वे आम लोगों से सोना जमा कर सकेंगे। इससे पहले सिर्फ बैंकों को ही सोना जमा करने की अनुमति थी।

सरकार का यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस अपील के बाद आया है, जिसमें उन्होंने देश के लोगों से एक साल तक सोना न खरीदने की बात कही थी।

नई स्कीम से 1000 टन सोना जुटाने की उम्मीद

‘ऑल इंडिया ज्वेलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन’ (AIJGF) ने कहा है कि नए फ्रेमवर्क के तहत ज्वेलर्स को कलेक्शन पार्टनर बनाने से घरों में रखे सोने को इकट्ठा करने में तेजी आएगी। इससे उम्मीद है कि सरकार बाजार से 1000 टन से ज्यादा सोना जुटा सकेगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर भारतीय परिवारों के पास मौजूद कुल सोने का सिर्फ 5% हिस्सा भी इस नई स्कीम में जमा होता है, तो इससे देश के बाजार में करीब 90 अरब डॉलर (लगभग 8.57 लाख करोड़ रुपए) की नकदी आ सकती है। इससे भारत को 2 साल तक बाहर से सोना नहीं मंगाया पड़ेगा, डॉलर की मांग घटेगी और भारतीय रुपया मजबूत होगा।

भारतीय घरों और मंदिरों में 50,000 टन सोना रखा

भारतीय व्यापारियों के संगठन एसोचैम (द एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया) की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय घरों और मंदिरों में 50,000 टन सोना रखा है, जिसकी वैल्यू करीब 10 ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग ₹830 लाख करोड़ है।

यह दुनिया के सबसे बड़े 10 सेंट्रल बैंकों के कुल भंडार से भी ज्यादा है। भारतीयों के पास इतना सोना है कि अमेरिका और चीन को छोड़कर दुनिया के लगभग हर देश की सालाना GDP से भी ज्यादा है।

भारत ने हर महीने ₹57 हजार करोड़ खर्च कर 60 टन सोना खरीदा

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड कंज्यूमर है। वित्त वर्ष 2026 में भारत ने हर महीने औसतन 60 टन सोना आयात किया है। इस पर हर महीने करीब 6 बिलियन डॉलर यानी करीब 57 हजार करोड़ रुपए का खर्च आया है।

पुरानी स्कीम: 10 साल में 25,000 टन में से सिर्फ 38 टन सोना आया

सरकार ने 2015 में सोने का आयात (इंपोर्ट) कम करने के लिए यह स्कीम शुरू की थी। इसके तहत लोग अपना सोना बैंक में जमा कर 2.25% से 2.5% तक सालाना ब्याज कमा सकते थे। लेकिन, यह स्कीम बुरी तरह फेल रही, क्योंकि…

  • भारत के घरों में अनुमानित 25,000 टन सोना है, पर 10 साल में इस स्कीम में सिर्फ 38 टन सोना ही आया।
  • लोगों की कम दिलचस्पी को देखते हुए सरकार ने बाद में इसके मीडियम और लॉन्ग-टर्म डिपॉजिट बंद कर दिए थे।

पुरानी स्कीम फेल होने की 4 बड़ी वजहें

ट्रेडबुल्स सिक्योरिटीज के भाविक पटेल और इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पुरानी स्कीम के फ्लॉप होने के ये 4 मुख्य कारण थे।

  1. सरकारी खजाने पर बोझ: योजना में सरकार को सालाना 2% ब्याज तो देना ही पड़ता था, साथ ही मैच्योरिटी के समय सोने के बढ़े हुए दाम भी अपनी जेब से भरने पड़ते थे। सुरक्षित इंतजाम (हेजिंग) न होने से सरकार को भारी नुकसान हुआ।
  2. गहनों से भावनात्मक लगाव: भारतीय परिवार अपने पुरखों के और पुराने गहनों को थोड़े से ब्याज के लिए पिघलाना नहीं चाहते। इन गहनों से उनकी यादें, धर्म और समाज में प्रतिष्ठा जुड़ी होती है।
  3. टैक्स और पूछताछ का डर: लोगों को डर रहता है कि घर में रखे पुराने सोने को बैंक में जमा करने पर सरकार टैक्स की जांच (स्क्रूटनी) शुरू कर देगी और पुराने बिल या कागजात मांगेगी।
  4. बैंकों की कम दिलचस्पी: बैंकों को इस स्कीम को आगे बढ़ाने में कोई खास मुनाफा या व्यावसायिक फायदा नहीं मिल रहा था, इसलिए उन्होंने इसे प्रमोट करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

भारतीय एजेंसियों के अनुसार सोने की वर्तमान कीमत…

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