Husband Wife Fight Vs Child; Parental Conflicts Long Term Impacts


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29 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा

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सवाल- मैं 37 साल की गृहिणी हूं। मेरे पति प्राइवेट नौकरी करते हैं और अक्सर काम का तनाव घर लेकर आते हैं। पिछले दो साल से हमारे बीच लगभग रोज किसी–न–किसी बात पर बहस, झगड़ा हो जाता है। हमारा 8 साल का बेटा झगड़ा शुरू होते ही अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लेता है। पहले वह बहुत हंसमुख था, लेकिन अब छोटी-छोटी बात पर डर जाता है और स्कूल जाने से भी कतराने लगा है। कभी-कभी कहता है, “आप लोग फिर लड़ोगे क्या?” मुझे लगता है कि वह तनाव में रहने लगा है। क्या हमारे झगड़े उसकी मेंटल हेल्थ पर लॉन्ग टर्म असर डाल सकते हैं? अब हमें क्या करना चाहिए?

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

पति-पत्नी के बीच कभी-कभार मतभेद होना सामान्य बात है। लेकिन अगर घर में रोज झगड़े होने लगें, आवाज ऊंची होने लगे और बच्चा बार-बार इन सबका गवाह बने, तब यह सिर्फ पति-पत्नी के बीच का मामला नहीं रह जाता। इसका असर पूरे परिवार और खासतौर से बच्चे की मेंटल–इमोशनल हेल्थ पर पड़ता है।

बच्चे में दिख रहे बदलाव

आपके बेटे के व्यवहार में ये बदलाव दिख रहे हैं-

  • डर जाना
  • स्कूल से बचना
  • झगड़ा शुरू होते ही अपने कमरे में बंद हो जाना
  • बार-बार पूछना कि “आप लोग फिर लड़ोगे क्या?”

ये सारे संकेत बताते हैं कि वह घर के तनाव को महसूस कर रहा है। बच्चे अक्सर अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते। अपने डर, चिंता और असुरक्षा को वे अपने व्यवहार के जरिए दिखाते हैं।

माता- पिता हैं बच्चे का सेफ्टी नेट

चाइल्ड साइकोलॉजी के अनुसार, बच्चे के लिए माता-पिता उसका सबसे सुरक्षित संसार होते हैं। जब वह संसार अस्थिर और तनावपूर्ण दिखने लगता है तो उसके भीतर ‘सेफ्टी’ की भावना कमजोर होने लगती है। वह हर समय सतर्क रहने लगता है कि अगला झगड़ा कब होगा।

क्या हर झगड़ा बच्चे को नुकसान पहुंचाता है?

नहीं। यह समझना बहुत जरूरी है। अगर पति-पत्नी किसी बात पर शांत तरीके से असहमति जताते हैं, एक-दूसरे का सम्मान करते हैं और बाद में समस्या का समाधान भी बच्चे के सामने दिखता है, तो बच्चा सीखता है कि मतभेद रिश्तों का सामान्य हिस्सा हैं। समस्या तब होती है, जब-

  • माता–पिता के बीच रोज झगड़े हों।
  • झगड़े में चिल्लाना, धमकाना, अपमान करना शामिल हो।
  • उनके बीच कई दिनों तक तनाव बना रहे।
  • बच्चा खुद को झगड़े की वजह मानने लगे।
  • घर में हमेशा तनाव का माहौल रहे।

ऐसे माहौल में बच्चा ‘इमोशनल सर्वाइवल मोड’ में रहने लगता है। उसका दिमाग पढ़ाई, खेल और सीखने की बजाय अपनी सुरक्षा पर ज्यादा फोकस हो जाता है।

झगड़े को कैसे समझता बच्चे का ब्रेन?

8 साल की उम्र में बच्चा दुनिया को अभी भी काफी हद तक माता-पिता के नजरिए से देखता है। अगर वह रोज लड़ाई देखता है तो उसके मन में कई तरह के सवाल आते हैं-

  • क्या मेरी वजह से झगड़ा हुआ?
  • क्या मम्मी-पापा अलग हो जाएंगे?
  • अगर वे अलग हो गए तो मैं किसके साथ रहूंगा?
  • क्या मैं कुछ कर सकता हूं?

ये स्ट्रेस बच्चे के भीतर डर पैदा कर सकता है। ये डर बच्चे शब्दों में नहीं बोल पाते। इसलिए उनके व्यवहार और कुछ संकेतों पर गौर करने की जरूरत है-

माता-पिता के लिए सबसे जरूरी बात

अक्सर माता-पिता कहते हैं, “हम बच्चे के सामने नहीं लड़ते” या “उसे कुछ समझ नहीं आता।”

असलियत यह है कि बच्चे सिर्फ शब्द नहीं सुनतेञ। वे चेहरे के भाव, आवाज का उतार-चढ़ाव, कमरे का माहौल और शरीर की भाषा भी पढ़ लेते हैं।

इसलिए अगर बच्चा डर रहा है तो उसकी भावना को ‘ओवररिएक्शन’ कहकर खारिज न करें। उसके डर को स्वीकार करना ही समाधान की शुरुआत है।

इस स्थिति को कैसे संभालें?

1. झगड़े का तरीका बदलें

  • मतभेद होना सामान्य है, लेकिन उसे संभालने का तरीका बदला जा सकता है। इसलिए आप आपस में कुछ बातें तय करें, जैसेकि–
  • गुस्सा बढ़े तो बातचीत रोक दें।
  • तय करें कि बच्चे के सामने बहस नहीं करेंगे।
  • चिल्लाने की बजाय शांत आवाज में बात करें।
  • एक-दूसरे का अपमान करने या ताने देने से बचें।

2. बच्चे को भरोसा दें

  • अगर बच्चे ने झगड़ा देखा है तो बाद में उससे इस बारे में बात जरूर करें। उसे कहें—
  • “मम्मी-पापा की बहस हुई थी, लेकिन यह तुम्हारी गलती नहीं है। हम मिलकर इसे सुलझा रहे हैं और तुम सुरक्षित हो।”
  • यह एक छोटा-सा वाक्य बच्चे के मन का बहुत बड़ा बोझ कम कर सकता है।

3. बच्चे की दिनचर्या सामान्य रखें

तनाव के समय नियमित दिनचर्या बच्चे को सुरक्षा का एहसास देती है। रूटीन जितना स्थिर रहेगा, बच्चा उतना सुरक्षित महसूस करेगा। इसलिए इन बातों का ध्यान रखें-

  • समय पर स्कूल
  • पर्याप्त नींद
  • साथ बैठकर खाना
  • रोज कुछ समय खेलना
  • स्क्रीन टाइम सीमित रखना

4. रोज 15-20 मिनट सिर्फ बच्चे के लिए रखें

इसे बच्चे का ‘स्पेशल टाइम’ मानें। इस दौरान-

  • मोबाइल दूर रखें।
  • बच्चा जो खेलना चाहे, वही खेलें।
  • उसे बीच में टोकें नहीं।
  • सलाह देने की बजाय उसकी बातें सुनें।
  • ऐसा समय बच्चे के भीतर दोबारा भरोसा बनाने में मदद करता है।

5. अगर माफी मांगी है तो उसे दिखाएं भी

बच्चे आप दोनों के बीच सिर्फ झगड़ा नहीं, बल्कि प्यार, दोस्ती और ख्याल भी देखें। अगर आकोप दोनों के बीच बहस हुई थी और बाद में आपने एक-दूसरे से सम्मानपूर्वक बात की या सामान्य व्यवहार किया, तो बच्चा सीखता है कि बहस से रिश्ते टूटते नहीं हैं। उन्हें बेहतर भी किया जा सकता है।

चाइल्ड काउंसिलर की मदद कब जरूरी?

अगर बच्चे में नीचे दिए बदलाव 4-6 हफ्तों से बने हुए हैं या बढ़ रहे हैं तो चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से मिलना बेहतर होगा-

  • स्कूल जाने से लगातार इनकार।
  • बार-बार घबराहट या डर।
  • पढ़ाई में अचानक गिरावट।
  • बहुत ज्यादा चुप या आक्रामक होना।
  • नींद या भूख में बड़ा बदलाव।
  • खुद को दोष देना।
  • दोस्तों से पूरी तरह दूरी बना लेना।

इसी तरह अगर पति-पत्नी के झगड़े लगातार बढ़ रहे हैं और दोनों उन्हें नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं, तो मैरिज या फैमिली काउंसलिंग लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।

अंतिम बात

बच्चों को ऐसे माता-पिता नहीं चाहिए, जो कभी गलती न करें। उन्हें ऐसे माता-पिता चाहिए, जो गलती होने पर उसे स्वीकार करें, सम्मानपूर्वक सुलझाएं और बच्चे को यह भरोसा दिलाएं कि परिवार उसके लिए सुरक्षित जगह है। जब घर का भावनात्मक माहौल बेहतर होता है, तो अधिकांश बच्चों में डर, चिंता और असुरक्षा भी धीरे-धीरे कम होने लगती है।

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ग्राफिक्स– अंकुर बंसल

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