मां कामाख्या मंदिर का मुख्य द्वार…करीब 40-50 सीढ़ियां चढ़ने के बाद लगा कि अब मां के दर्शन होंगे। पंडित ने कहा- संभलकर पैर रखिएगा, सीढ़ियां फिसलन भरी हैं।
.
संकरे से रास्ते पर अंधेरे में 10-11 सीढ़ियां उतरकर हम गुफा में पहुंचे। रोशनी के लिए बस एक दीये का सहारा था। सामने मूर्ति थी, पंडित ने कहा- दर्शन कीजिए। हमें लगा यही देवी मां हैं।
पंडित ने चिल्लाते हुए कहा- घुटनों के बल बैठिए और हाथ नीचे गहराई में ले जाइए। फिर पूछा- जल स्पर्श हुआ, हाथ और नीचे ले जाइए। तभी जल स्पर्श हुआ। पंडित बोले- इसे माथे पर लगाइए, दर्शन हो गए।
मां कामाख्या मंदिर आने वाले साधक इसी जल स्पर्श दर्शन पर मंडराते खतरे को लेकर डरे हुए हैं। दरअसल, असम सरकार ने मंदिर में कॉरिडोर बनाने का ऐलान किया है। साधकों को आशंका है कि कॉरिडोर बना, तो जिस प्राकृतिक जल धारा से मां के दर्शन हो रहे हैं, वो तबाह हो जाएगा।

कामाख्या मंदिर कॉरिडोर के खिलाफ कोर्ट जाने वाले याचिकाकर्ता देश के अलग-अलग हिस्सों हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, असम और तमिलनाडु से हैं।
15 दिसंबर, 2023 को कॉरिडोर के खिलाफ 13 साधकों ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन लगाई थी। इनमें असम के CM हिमंता बिस्वा सरमा की बहन गीतिका भट्टाचार्य भी शामिल हैं। दूसरी याचिका मंदिर के पुजारी ने लगाई है। कोर्ट में याचिका पर सुनवाई हुई, कॉरिडोर के लिए सर्वे कराया गया, लेकिन साधकों को रिपोर्ट नहीं मिली और फैसला भी सरकार के पक्ष में आया।
अब पिटीशनर्स सर्वे रिपोर्ट के लिए अगस्त के आखिर तक गुवाहाटी हाईकोर्ट में इंटरलोकेटरी एप्लीकेशन (IA) फाइल करने की तैयारी में हैं। साथ ही असम PWD, NIH और IIT गुवाहाटी में RTI से जानकारी के लिए दोबारा अपील करेंगे। हम इनमें से 3 पिटीशनर्स से मिले। तीनों तंत्र विद्या के साधक हैं।
आखिर कॉरिडोर बनने से साधक क्यों डरे हुए हैं…
पिटीशनर नंबर-1 हिमंता की बहन बोलीं- मां के अस्तित्व से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं
CM हिमंता बिस्वा सरमा की बहन गीतिका भट्टाचार्य कहती हैं, ‘मां के अस्तित्व से छेड़छाड़ कोई भी करे, बर्दाश्त नहीं करूंगी। मैंने 8-9 साल की उम्र से मां को जानना शुरू किया था। मेरे लिए सबसे पहले मां हैं, फिर कोई और।‘
कॉरिडोर से नुकसान के सवाल पर पूछती हैं, ‘आपने मां के दर्शन किए क्योंकि इसके बिना आप हमारी चिंता नहीं समझ सकतीं। यहां देवी मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि जल की प्राकृतिक धारा के रूप में हैं। उनकी दसों महाविद्याएं भी इसी रूप में हैं। जल का स्पर्श ही मां का दर्शन है। इसके अलावा दूसरा कोई ऐसा मंदिर नहीं है।’
‘ये जल धारा कितने फीट नीचे से आ रही है, इसका मूल स्रोत कहां है, 10 महाविद्याओं में जो धारा जाती है, वो इंटरकनेक्टेड है या अलग-अलग, कोई नहीं जानता। इस पर आज तक कोई सर्वे या रिसर्च नहीं हुई।’

‘बिना सर्वे कराए इतने बड़े प्रोजेक्ट का टेंडर कैसे हुआ’
गीतिका आगे कहती हैं, ‘CM हिमंता ने कॉरिडोर बनाने का ऐलान किया। कुछ महीने बाद ही एक कंपनी को टेंडर दे दिया गया। ये सब बिना किसी सर्वे या एक्सपर्ट की राय के हुआ।‘
‘प्रोजेक्ट का जलधारा पर क्या असर पड़ेगा, ये जानने के लिए सरकार ने क्या किया, इसका पता लगाने के लिए हमने RTI के तहत कई बार जानकारी मांगी। हम एक डिपार्टमेंट से दूसरे डिपार्टमेंट गए, लेकिन जवाब नहीं मिला।’
पिटीशनर नंबर-2 ‘मां के रूप से छेड़छाड़ और डीप कंस्ट्रक्शन के खिलाफ’
पश्चिम बंगाल के तंत्र साधक राजर्षि नंदी कहते हैं, ‘हम कोई सोशल एक्टिविस्ट नहीं, सिर्फ साधक हैं। हमारा एक ही मकसद है कि मां का वास्तविक स्वरूप ना बिगड़े। पर्वत के रूप में मौजूद भगवान शिव को कोई नुकसान न पहुंचे। अगर तोड़फोड़ या खुदाई हुई, तो वहां प्रवाहित हो रही ऊर्जा डिस्टर्ब होगी।’
इसे दो पॉइंट में समझिए…
1. शास्त्रों में मां कामाख्या को शिव के ऊपर रखे कमल पर बैठा दिखाया गया है, जबकि शिव खुद शेर पर लेटे हैं, यानी जिस नीलांचल पर्वत पर मां का स्थान है, वो शिव हैं। शिव के नीचे सिंह रूप में विष्णु और जिस कमल पर मां बैठी हैं, वो ब्रह्मा हैं। अब सोचिए पर्वत पर खुदाई और नया कंस्ट्रक्शन हुआ, तो क्या होगा। मैं नीलांचल पर्वत पर किसी भी तरह के डीप कंस्ट्रक्शन के खिलाफ हूं।
2. मां का अस्तित्व यहां जल के रूप में है। ये जल 10 जगह से प्रकट होता है। इसी के आधार पर इन्हें 10 महाविद्या कहा गया है। शास्त्र पढ़ने वाला साधक ही बता सकता है कि दसों जगह प्रकट जल धारा की प्रकृति में क्या अंतर है। यही जल पर्वत के नीचे भी बह रहा है। ऐसे में अगर कहीं ड्रिलिंग या ब्लास्टिंग हुई, तो जल स्रोत पर असर हो सकता है। दस में से कोई भी जल धारा बंद हो सकती है।
देवप्रश्न के दौरान मां ने दिया आदेश- कोर्ट जाओ
राजर्षि नंदी कहते हैं, ‘हम कोर्ट जाने को लेकर दुविधा में थे। फिर सोचा मां से ही पूछ लेते हैं। आपको लगेगा कि मां से कैसे पूछेंगे। इसके लिए एक प्रक्रिया है, जिसे देवप्रश्न कहते हैं। दुनियाभर में 200-250 ऐसे साधक होंगे, जो देवप्रश्न यानी मां से सवाल कर सकते हैं। हमने केरल के दो साधकों को यहां आने के लिए राजी किया।’

देवप्रश्न में हमारे दो सवाल थे:
1. हमें क्या करना चाहिए?
2. इस लड़ाई का नतीजा क्या निकलेगा?
दोनों सवालों के जवाब मिले।
जवाब 1. मां का आदेश मिला कि हमें कोर्ट जाना चाहिए। ये सामान्य लड़ाई नहीं होगी, बल्कि स्प्रिचुअल वर्ल्ड में लड़े जाने वाले धर्म युद्ध की तरह होगी। एक तरफ बेहद ताकतवर लोग होंगे, तो दूसरी तरफ तुम लोग। इसके लिए कठिन साधना करनी होगी, केस तभी आगे बढ़ेगा।
जवाब 2. मां ने कहा कि लड़ाई का नतीजा सकारात्मक होगा। सरकार को रुकना पड़ेगा।

पिटीशनर नंबर-3 सरकार ने सर्वे एजेंसी चुनने का फैसला बार-बार क्यों बदला
हरियाणा के योगेंद्र शर्मा 9 साल से मां कामाख्या के साधक हैं। वे कहते हैं, ‘कॉरिडोर के डिजाइन के मुताबिक, पहाड़ी पर बने मंदिर के लिए मल्टीलेवल पार्किंग और चौड़ी सड़कें बननी हैं। ये भूकंप वाला हाइली सेंसेटिव एरिया है। मल्टीलेवल पार्किंग के लिए नींव गहरी रखनी होगी, क्या ये संभव है।’
उनके मुताबिक, 15 दिसंबर 2023 को 13 साधकों ने इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई। कोर्ट ने मामला गुवाहाटी हाईकोर्ट भेजा, जिसने सर्वे का निर्देश दिया। सरकार ने पहले IIT गुवाहाटी के जरिए पार्सन्स नाम की कंपनी चुनी, लेकिन ये हाइड्रोलॉजी के बजाय वाटर हार्वेस्टिंग के एरिया में काम करती है। लिहाजा अगली सुनवाई से पहले सरकार ने इसे हटा दिया।
वे आगे बताते हैं,
इसके बाद हैदराबाद की नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (NGRI) को सर्वे का जिम्मा मिला और उसने 20 महीने का वक्त मांगा। सरकार ने उसे हटाकर रुड़की के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (NIH) को जिम्मा सौंपा, जिसने 6 से 8 महीने में सर्वे पूरा करने पर सहमति दी। इसे ठेका L&T कंपनी के जरिए दिया गया।

याचिकाकर्ताओं का सवाल है कि एक ही तरह के सर्वे के लिए दो संस्थानों के समय और प्रक्रिया में इतना अंतर क्यों।
जनवरी 2026 में सरकार ने कोर्ट को बताया कि NIH ने रिपोर्ट सौंप दी है। IIT गुवाहाटी ने उसे मंजूरी भी दे दी है। इसके बाद 11 फरवरी 2026 को कोर्ट ने निर्माण शुरू करने की परमिशन दे दी। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सरकार कोर्ट में दिए अपने पहले भरोसे से पलट गई, जिसमें कहा था कि केस लंबित रहने तक निर्माण नहीं होगा।‘
योगेंद्र शर्मा का दावा है कि 14 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री के असम दौरे और कॉरिडोर प्रोजेक्ट के शुभारंभ की घोषणा से पहले ये कदम उठाया गया।

पिटीशनर के वकील बोले… जिसे कॉरिडोर का टेंडर, उसी को सर्वे कराने का जिम्मा भी मिला
कामाख्या कॉरिडोर को लेकर 13 साधकों की पिटीशन के अलावा एक और पिटीशन लगाई गई। ये मंदिर के पुजारी नबज्योति ने मई 2024 में लगाई थी। इनके एडवोकेट उपमन्यु हजारिका कहते हैं, ‘इस हाइड्रोलॉजिकल सर्वे के लिए सरकार ने L&T को 78 लाख रु. का फंड सेंक्शन किया। फिर कंपनी ने सरकारी संस्था नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलोजी (NIH) रुड़की से सर्वे कराया।‘
‘सवाल ये है कि सरकार ने खुद इस संस्था को सर्वे का जिम्मा क्यों नहीं दिया। बीच में प्राइवेट कंपनी लाने की क्या जरूरत थी। दरअसल L&T को कॉरिडोर का टेंडर दिया जा चुका था इसलिए उसे शामिल किया गया। रिपोर्ट भी तभी छिपाई जा सकती थी, जब सर्वे किसी प्राइवेट कंपनी ने कराया हो।‘
सरकार ने सर्वे रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की
हजारिका कहते हैं, ‘हमारे एक साथी ने जब सर्वे रिपोर्ट के लिए PWD, NIH और IIT गुवाहाटी में RTI डाली, तो NIH से जवाब आया कि प्राइवेट कंपनी ने कराया है। मालिकाना हक भी उसी का है। जब तक वो ना कहे, रिपोर्ट की जानकारी नहीं दे सकते। हम RTI के तहत सिर्फ सरकारी डेटा ही दे सकते हैं।‘
हजारिका कहते हैं, ‘जिसके पास कॉरिडोर बनाने का टेंडर है, उसी को सर्वे का जिम्मा दिया गया। जरा सोचिए, क्या कोई टेंडर रद्द होने देगा। शुरू में ये टेंडर 402 करोड़ का था। अब एसक्लेशन चार्ज के साथ 800-1000 करोड़ का हो गया होगा।’
हमने पूछा क्या आप नहीं चाहते कि कॉरिडोर बने? इसके जवाब में हजारिका कहते हैं, ‘कॉरिडोर बने, लेकिन कम से कम कंस्ट्रक्शन हो। अगर इसे बनाने में जल प्रवाह ही बंद हो गया, तो मंदिर की शक्ति खत्म हो जाएगी। ये बड़ा नुकसान होगा। जब आत्मा ही मर जाएगी, तो फिर मंदिर को संवारकर क्या मिलेगा।‘

गुवाहाटी हाईकोर्ट की परमिशन के बाद कामाख्या कॉरिडोर के तहत पार्किंग स्थल की खुदाई की जा रही है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी भी निर्माण से मंदिर को नुकसान पहुंचने की आशंका दिखे तो साधक फिर अपील कर सकते हैं।
पुजारी नबज्योति के वकील उपमन्यु हजारिका ने सर्वे रिपोर्ट के लिए हाईकोर्ट में इंटरलोकेटरी एप्लीकेशन फाइल की है। इस पर कोर्ट ने सरकार से 30 सितंबर 2026 तक रिपोर्ट न देने की लिखित वजह बताने का आदेश दिया है।
हमने साधकों के आरोपों और सवालों को लेकर सरकार का पक्ष जानने की कोशिश की, लेकिन खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं मिला है। जवाब आने पर स्टोरी में अपडेट करेंगे।
अब एक्सपर्ट्स की बात… जिस इंस्टीट्यूट ने सर्वे किया, उसके पूर्व डायरेक्टर ने दी थी सर्वे की सलाह
इस मामले पर रुड़की के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के पूर्व निदेशक सुधीर कुमार से पिटीशनर्स ने राय मांगी थी। उन्होंने लिखित में सलाह दी, जो पिटीशन में भी अटैच है।
सुधीर कहते हैं, ‘मां कामाख्या मंदिर एक अलग पहाड़ की चोटी पर स्थित है। ये समुद्र तल से 270 फीट ऊंची है और ग्रेनाइटिक नीस से बनी है। इसमें भूजल सिर्फ दरारों और जोड़ों के जरिए प्रवाहित होता है। कोई भी निर्माण जल के प्रवाह पर असर डाल सकता है। बहुमंजिला इमारत या बड़े कंस्ट्रक्शन को देखते हुए जरूरी है कि इस पहाड़ी की एक डिटेल जियो हाइड्रोलॉजिकल स्टडी कराई जाए।‘
‘गर्भगृह क्षेत्र की जल धारा को संरक्षित करने के लिए स्टडी जरूरी है। सभी ऐसे मंदिर, जिनके गर्भगृह में जल है, उनके चारों ओर ग्राउंड पेनिट्रेटिंग राडार (GPR) का इस्तेमाल करके सब सरफेस मैपिंग की जाए। इससे उन दरारों का पता लगाया जा सकेगा, जिनके जरिए पानी गर्भगृह में आ रहा और बाहर जा रहा है।‘
‘पूरी पहाड़ी पर दरारें और जोड़ हैं, यही वजह है कि वहां जलाशय और कुंड भी हैं। इन कुंडों को भी दरारों और जोड़ों से ही पानी मिलता होगा, इसलिए इन कुंडों के आसपास भी GPR सर्वेक्षण कराना जरूरी है।‘
देश के चर्चित मंदिर कॉरिडोर और उनसे जुड़े विवाद…

………………………
ये खबर भी पढ़ें…
सनातन धर्म के बड़े पद महामंडलेश्वर का सौदा

‘जो कहोगे, वही पद देंगे। महामंडलेश्वर बना देंगे। जगतगुरु भी बना सकते हैं। बस 20 लाख रुपए का व्यवहार करना होगा। आश्रम खोलना है, जमीन अखाड़े के नाम पर होगी। देखरेख और संचालन आप ही करना।’ ये ऑफर हमें देश के तीन बड़े अखाड़ों में ऊंचे पदों पर बैठे महंतों ने अलग-अलग मुलाकातों में दिया। पढ़िए पूरी खबर…
