भोपाल7 मिनट पहले
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मध्य प्रदेश में पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों की पूरी प्रक्रिया को तकनीक से जोड़ने की दिशा में राज्य निर्वाचन आयोग ने कई नए प्रयोग किए हैं। इस बार आयोग ने सिर्फ मतदान के दिन की निगरानी को डिजिटल नहीं किया, बल्कि मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन से लेकर चुनाव प्रक्रिया शुरू होने, मतदान केंद्र की सुविधाओं की जांच, मतदान प्रतिशत की रिपोर्टिंग, प्रेक्षकों की रिपोर्ट और EVM के रेंडमाइजेशन तक अलग-अलग स्तरों पर सॉफ्टवेयर और मोबाइल एप का इस्तेमाल बढ़ाया है।
इनमें IEMS का एडवांस वर्जन, पोलिंग स्टेशन सर्वे एप, पीठासीन अधिकारी एप, प्रेक्षा एप और EVM रेंडमाइजेशन सॉफ्टवेयर प्रमुख हैं। इन तकनीकों का फील्ड इस्तेमाल 29 सितंबर 2026 के नगरीय निकाय और पंचायत उपचुनाव में हुआ।
29 सितंबर को प्रदेश में 3 नगरीय निकाय अध्यक्ष, 26 पार्षद, 7 जिला पंचायत सदस्य, 28 जनपद पंचायत सदस्य, 110 सरपंच और 4090 पंच पदों के लिए उपचुनाव निर्धारित था।
IEMS अब सिर्फ डेटा लेने का सिस्टम नहीं, चुनाव खुद आगे बढ़ाएगा
मध्यप्रदेश में IEMS पहले से चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के रिकॉर्ड में 2016 से IEMS के इस्तेमाल के दस्तावेज मिलते हैं। 2018 में नगरीय निकाय चुनाव में मतगणना और परिणाम की घोषणा के लिए IEMS इस्तेमाल करने के निर्देश जारी हुए।
2020-22 में नामांकन, चुनाव की सूचना, मतगणना और परिणाम जैसे अलग-अलग चरण इससे जोड़े गए। अब इसका एडवांस वर्जन तैयार किया गया है।
पहले जिला स्तर से डेटा आने के बाद राज्य स्तर पर चुनाव की अगली प्रक्रिया शुरू होती थी। नए मॉडल में मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन और चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद आगे की प्रक्रिया को सिस्टम आधारित तरीके से शुरू करने का प्रयास है।
यानी जिला स्तर पर बार-बार डेटा भेजने और उसकी मैनुअल मॉनिटरिंग की जरूरत घटेगी। एक चरण पूरा होने के बाद उससे जुड़ा अगला चरण सिस्टम में ट्रिगर किया जा सकेगा।
पोलिंग स्टेशन सर्वे एप- हर बूथ का डिजिटल हेल्थ कार्ड
चुनाव से पहले सबसे जरूरी कामों में एक मतदान केंद्र की सुविधाओं का सत्यापन है। इस बार इसके लिए पोलिंग स्टेशन सर्वे एप का इस्तेमाल किया गया। इसमें मतदान केंद्र पर रैंप है या नहीं, दिव्यांग मतदाताओं के लिए पहुंच आसान है या नहीं, शौचालय उपलब्ध है या नहीं, पेयजल की व्यवस्था है या नहीं, भवन की स्थिति कैसी है, मतदान केंद्र तक पहुंचने वाला रास्ता ठीक है या नहीं जैसी सुविधाओं की जांच की जाती है।
सर्वे में कमी मिलने पर उसी मापदंड के आधार पर सुधार कराया जा सकता है। इससे मतदान केंद्र की सुविधा अब केवल कागज पर दर्ज जानकारी नहीं रहेगी, बल्कि मोबाइल से सर्वे और सुधार की निगरानी के रूप में उपलब्ध होगी।

‘प्रेक्षा’ एप- ऑब्जर्वर की रिपोर्ट अब सीधे IEMS में
चुनाव में नियुक्त प्रेक्षकों के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या रिपोर्टिंग की होती है। अलग-अलग रिपोर्ट तैयार करना, भेजना और फिर उसे चुनाव प्रबंधन सिस्टम में शामिल करना समय लेने वाला काम हो सकता है।
इसके लिए आयोग ने ‘प्रेक्षा’ एप लॉन्च किया है। आधिकारिक एप विवरण के अनुसार यह Madhya Pradesh State Election Commission का Election Observer और Roll Observer App है। इसमें दोनों के लिए अलग मॉड्यूल हैं और रिपोर्ट सीधे IEMS बैकएंड पर जमा की जा सकती है। एप का पहला संस्करण 2 सितंबर 2026 को अपडेट हुआ।
इसमें प्रेक्षकों के लिए चुनाव संबंधी रिपोर्ट, रोल ऑब्जर्वर रिपोर्ट, प्रशिक्षण सामग्री, दस्तावेज, उपस्थिति और अन्य रिपोर्टिंग जैसी सुविधाएं जोड़ी गई हैं। इससे प्रेक्षक की रिपोर्ट मैदानी स्तर से सीधे केंद्रीय चुनाव प्रबंधन सिस्टम तक पहुंचती है।
EVM रेंडमाइजेशन का अपना सॉफ्टवेयर- इंटर-स्टेट ट्रांसफर के बाद सबसे बड़ी चुनौती
मध्यप्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों में इस्तेमाल होने वाली EVM अब केवल प्रदेश के भीतर ही नहीं रहतीं। राज्य निर्वाचन आयोग ने अपनी EVM Sharing Policy के तहत दूसरे राज्यों को भी EVM किराए पर देना शुरू किया है। इससे एक नई तकनीकी चुनौती सामने आई—एक राज्य की EVM दूसरे राज्य में जाने के बाद दोनों राज्यों के डेटाबेस अलग होते हैं।
ऐसे में मशीनों की पहचान, उपलब्धता, वापसी और दोबारा रेंडमाइजेशन का डेटा एक साथ मैनेज करना चुनौतीपूर्ण है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए MP राज्य निर्वाचन आयोग के IT सिस्टम में EVM Randomization Software तैयार किया गया है।
इसका उद्देश्य EVM की पहचान और उपलब्धता के डेटा को व्यवस्थित तरीके से लेकर रेंडमाइजेशन करना है, ताकि किस मशीन को किस मतदान केंद्र पर भेजा जाएगा, इसकी प्रक्रिया सिस्टम आधारित और ट्रेस करने योग्य रहे। MP में EVM के रेंडमाइजेशन और कमीशनिंग के लिए पहले से दिशा-निर्देश मौजूद हैं। 2020 में आयोग ने आगामी पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों के लिए EVM रेंडमाइजेशन और कमीशनिंग के संबंध में अलग निर्देश जारी किए थे।
एमपी ने सबसे पहले बनाई ईवीएम शेयरिंग पॉलिसी
एमपी के राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए तकनीकी नवाचारों में सबसे अलग प्रयोग EVM Sharing Policy है। मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग ने अपनी अतिरिक्त EVM को दूसरे राज्य निर्वाचन आयोगों को स्थानीय निकाय चुनाव कराने के लिए किराए पर देने की नीति बनाई।
30 जुलाई 2025 को राज्य निर्वाचन आयुक्तों की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में MP ने अपनी EVM Sharing Policy प्रस्तुत की थी। छत्तीसगढ़ के चुनावों में एमपी ने 3,000 EVM किराए पर दी थीं। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र के साथ EVM किराये पर देने के लिए एमओयू हो चुके थे। उत्तराखंड और गुजरात के साथ एमओयू किया गया था, सिक्किम ने EVM के लिए आग्रह किया था।
स्टैंडिंग कमेटी ने MP की EVM Sharing Policy को मान्य किया और इसे सभी राज्यों में लागू करने पर सहमति दी। सभी राज्य निर्वाचन आयोगों से अपने पास उपलब्ध EVM और मतपेटियों की जानकारी तथा स्थानीय निकाय चुनावों की संभावित तारीखें साझा करने का निर्णय भी लिया गया, ताकि जरूरत पड़ने पर राज्यों के बीच EVM शेयरिंग की जा सके।

2025 में महाराष्ट्र, फिर राजस्थान-सिक्किम तक पहुंचा मॉडल
EVM Sharing Policy के तहत MP ने अलग-अलग राज्यों को मशीनें उपलब्ध कराईं। महाराष्ट्र के लिए बड़ी संख्या में EVM उपलब्ध कराने का समझौता हुआ। बाद में राजस्थान के स्थानीय निकाय और पंचायती राज चुनावों के लिए भी MP से EVM उपलब्ध कराने का समझौता हुआ।
सिक्किम के साथ भी EVM उपलब्ध कराने का समझौता हुआ। इससे MP की EVM अब राज्य की सीमाओं के बाहर स्थानीय निकाय चुनावों में भी इस्तेमाल हो रही हैं।
यही वजह है कि अब EVM रेंडमाइजेशन और मशीनों के डेटाबेस को संभालने के लिए नए सॉफ्टवेयर की जरूरत बढ़ गई है।

