‘किसी भी महिला को अपने बचपन में पिता, जवानी में पति और जब पति मर जाए तो बुढ़ापे में बेटों के नियंत्रण में रहना चाहिए। उसे कभी भी स्वतंत्र रूप से जीने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।’
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22 अगस्त को पुणे में राहुल गांधी ने मनुस्मृति के इस श्लोक को शर्मनाक बताते हुए कहा- ‘महिला की पहचान उसके पिता, पति या बेटे से नहीं, बल्कि उसकी अपनी होती है।’ इसके बाद से बवाल मचा है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता ने कहा- ‘राहुल पागल हैं। महिला अधिकारों के बहाने हिंदू धर्म को बदनाम करने का बहाना ढूंढते हैं।’
आखिर मनुस्मृति कहां से आई, इसमें क्या-क्या लिखा है और राहुल गांधी के बयान से असली दिक्कत क्या है; डिबेट के हर पहलू को समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: आखिर मनुस्मृति कहां से आई और कैसे इतनी चर्चित हो गई?
जवाब: मनुस्मृति हिंदू धर्म के सबसे पुराने ग्रंथों में से एक है। इसे मनु संहिता या मानव धर्मशास्त्र के नाम से भी जानते हैं। यह किताब करीब 1800 साल पहले अस्तित्व में आई थी। उस वक्त वैदिक हिंदुत्व, मंदिर आधारित पौराणिक हिंदुत्व में बदल रहा था।
इतिहासकार नरहर कुरुंदकर अपनी किताब ‘मनुस्मृति: कॉन्टेम्परेरी थॉट्स’ में लिखते हैं, ‘मनुस्मृति दो शब्दों का मेल है, पहला मनु और दूसरा स्मृति। यानी मनु द्वारा लिखा गया धार्मिक लेख मनुस्मृति कहा जाता है। ईसा के जन्म से दो-तीन सौ साल पहले इसकी रचना शुरू हुई थी।’
इतिहास और संस्कृति के विद्वान पैट्रिक ओलिवेल अपनी किताब ‘मानुस कोड ऑफ लॉ: ए क्रिटिकल एडिशन एंड ट्रांसलेशन ऑफ द मानव धर्मशास्त्र’ में लिखते हैं, ‘मनुस्मृति का यूनीक और सिमैट्रिकल स्ट्रक्चर इस बात की ओर इशारा करता है कि इसे या तो किसी ‘प्रतिभाशाली व्यक्ति’ ने लिखा या फिर किसी ‘सशक्त अध्यक्ष’ ने इसे तैयार किया।’
पंजाब यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर राजीव लोचन बताते हैं, ‘जब अंग्रेज भारत आए, तो उन्हें लगा कि जैसे मुस्लिमों के पास कानून की किताब के तौर पर शरिया है, ऐसे ही हिंदुओं के पास भी मनुस्मृति है। इसी वजह से मनुस्मृति के आधार पर हिंदू मुकदमों की सुनवाई शुरू कर दी। यहीं से इस विचार ने जन्म लिया कि मनुस्मृति हिंदुओं का मानक धर्मग्रंथ है और ये प्रचलित हो गया।’
सवाल-2: मनुस्मृति में क्या-क्या लिखा है?
जवाब: नरहर कुरुंदकर कहते हैं, ‘मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय हैं, जिनमें 2,684 श्लोक हैं। कुछ संस्करणों में श्लोकों की संख्या 2,964 है। यह हिंदुओं को धर्म और उनके कर्तव्यों के बारे में बताते हैं।’
वेंडी डोनिगर और ब्रायन स्मिथ अपनी किताब ‘द लॉज ऑफ मनु’ में लिखते हैं, ‘मनुस्मृति का सार यह है कि दुनिया और वास्तव में जीवन कैसे जिया जाता है, और इसे कैसे जीना चाहिए। ये किताब धर्म के बारे में है, जो कर्तव्य, कानून, अर्थशास्त्र और व्यवहार से भी जुड़ी है।’

वेंडी और ब्रायन के मुताबिक, ‘मनुस्मृति के लेखक ब्राह्मण को मानव जाति का आदर्श प्रतिनिधि मानते हैं। जबकि क्रम में सबसे नीचे रखे गए शूद्र को ‘ऊंची’ जातियों की सेवा करने का इकलौता कर्तव्य दिया गया है। कुछ श्लोकों में महिलाओं के खिलाफ उनके पूर्वाग्रह दिखते हैं।’
सवाल-3: क्या मनुस्मृति वाकई महिला और दलित विरोधी है?
जवाब: मनुस्मृति में महिलाओं के कर्तव्यों और जीने के तरीकों के बारे में बताया गया है, जो मौजूदा समय में सही नहीं माना जाता। शूद्रों को लेकर भी कई विवादित बातें लिखी गईं हैं। कुछ श्लोकों के अर्थ से समझिए…
अध्याय 1, श्लोक 31: ब्रह्मा ने संसार की रचना की थी और उनके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, पेट से वैश्य और पैर से शूद्र पैदा हुए।
अध्याय 5, श्लोक 148: किसी भी महिला को अपने बचपन में पिता; जवानी में पति और जब पति मर जाए तो बुढ़ापे में बेटों के नियंत्रण में रहना चाहिए। उसे कभी भी स्वतंत्र रूप से जीने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अध्याय 9 के श्लोक 3 में भी लगभग यही बात लिखी गई है।
अध्याय 5, श्लोक 151: पिता या पिता की सहमति से भाई जिसके साथ शादी कर दे, उस पति की सेवा महिला को जीवनभर करनी चाहिए और उसकी मौत के बाद ब्रह्मचर्य में रहना चाहिए।
अध्याय 8, श्लोक 21: जब शूद्र राजा के लिए कानून की व्याख्या करता है, तो उसका राज्य कीचड़ में डूबी गाय की तरह डूब जाता है और वह असहाय होकर देखता रहता है।
अध्याय 8, श्लोक 129: एक योग्य शूद्र को कभी धन नहीं जुटाना चाहिए; क्योंकि जब एक शूद्र धनवान यानी अमीर हो जाता है, तो वह ब्राह्मणों को परेशान करता है।
अध्याय 8, श्लोक 371: जब कोई स्त्री अपने पति को धोखा दे, उसका तिरस्कार करे तो राजा को उसे सार्वजनिक चौराहे पर कुत्तों से भक्षण करवा देना चाहिए।
अध्याय 9, श्लोक 335: शूद्र का सबसे बड़ा धर्म यह है कि वह वेदों के ज्ञाता, विद्वान, गृहस्थ और सम्मानित ब्राह्मण की सेवा करे।
(ये सभी श्लोक और उनके अर्थ पैट्रिक ओलिवेल और सुमन ओलिवेल की किताब ‘मनुस कोड ऑफ लॉ’ से लिए गए हैं।)
सवाल-4: जब राहुल ने किताब में लिखी बातें ही कहीं, तो दिक्कत क्या है?
जवाब: मनु-स्मृति में लिखी विवादित बातों का विरोध करने पर अक्सर यह आरोप लगता है कि मनुस्मृति के बहाने सिर्फ हिंदू धर्म को निशाना बनाया जा रहा है।
आधुनिक समय में मनुस्मृति की सबसे ज्यादा चर्चा तब शुरू हुई, जब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 25 दिसंबर 1927 को महाराष्ट्र के कोलाबा जिले (अब रायगढ़) में मनुस्मृति को जलाया था। तब भी अगड़ी जाति के लोगों ने ये कहकर उनका विरोध किया कि ये हिंदू धर्म के खिलाफ है।
राहुल गांधी के बयान पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी कहा, ‘कांग्रेस हिंदू परंपराओं को ही निशाना क्यों बनाती है? अल्पसंख्यक महिलाओं की स्थिति पर चुप क्यों रहती है?’

22 अगस्त को पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति का जिक्र किया।
3 तर्क दिए जाते हैं…
1. वेदों की तरह मनुस्मृति हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ नहीं
मानवाधिकार जन-निगरानी समिति के संयोजक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लेनिन रघुवंशी कहते हैं, ‘मनुस्मृति वेद और उपनिषद जैसा पवित्र ग्रंथ नहीं है। इसकी कई बातें उनसे मेल नहीं खाती हैं।’
लेखक और सीनियर पत्रकार आर. जगन्नाथन कहते हैं, ‘मनुस्मृति या किसी भी धार्मिक ग्रंथ का उदाहरण देकर उस धर्म के आज के माने वालों को दोषी नहीं बनाना चाहिए। ये ग्रंथ तब के लिए थे, जब ये लिखे गए थे।’
2. हिंदू नियम मनुस्मृति के आधार पर नहीं बने
मशहूर माइथोलॉजिस्ट देवदत्त पट्टनायक के मुताबिक, ‘लोग इसे मनु की संहिता समझते हैं, जो गलत है। असल में यह मनु के विचार हैं। मुस्लिमों के शरिया और कैथोलिक ईसाइयों के चर्च डॉग्मा की तरह यह कोई कानून की किताब नहीं है।’
3. पितृसत्ता सिर्फ हिंदू धर्म की समस्या नहीं
आर. जगन्नाथन लिखते हैं कि लगभग सभी मौजूदा धर्म पुरुषों के बनाए हैं। जब पुरुष ही धर्मग्रंथ लिखते हैं, तो उनमें एक तरफ झुकाव पर हैरानी नहीं जतानी चाहिए। अगर राहुल के मुताबिक, धार्मिक ग्रंथ पितृसत्ता को मजबूत करते हैं, तो वे इसके लिए दूसरे धार्मिक ग्रंथों के उदाहरण भी दे सकते थे।
सवाल-5: मनुस्मृति में विवादास्पद बातें हैं, तो इसका समर्थन कौन लोग करते हैं?
जवाब: नरहर कुरुंदकर लिखते हैं, ‘मनुस्मृति के समर्थकों का मानना है कि सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की थी और दुनिया का कानून प्रजापति मनु-भृगु की परंपरा से आया है। ऐसे में मनुस्मृति का सम्मान करना चाहिए।’
नरहर कुरुंदकर लिखते हैं, ‘कहा जाता है कि स्मृतियां वेदों पर आधारित हैं और मनुस्मृति भी वेदों के हिसाब से ही है। इस वजह से इसे वेदों की तरह ही सम्मान मिलना चाहिए। शंकराचार्य के साथ-साथ दूसरे धर्मगुरुओं ने भी इसी आधार पर इसका बचाव किया है। जबकि मनुस्मृति के आधुनिक समर्थक कहते हैं कि इस किताब के कुछ हिस्सों को छोड़ दिया जाए तो ये किताब समाज के कल्याण की बात करती है।’
लेखक संजीव सभलोक एक आर्टिकल में लिखते हैं, ‘मनुस्मृति के कुछ हिस्सों को छोड़ दिया जाए, तो आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती भी इसे सपोर्ट करते थे। विनायक दामोदर सावरकर, गोलवलकर भी इसके समर्थकों में शामिल हैं।
सावरकर का मानना था कि मनुस्मृति ‘वेदों के बाद सबसे ज्यादा पूजा जाने वाला ग्रंथ है’ और ‘राष्ट्र के आध्यात्मिक और दिव्य यात्रा का आधार है।’ गोलवलकर ने मनु को ‘मानव जाति का पहला, सबसे महान और बुद्धिमान नियम बनाने वाला व्यक्ति’ माना है।‘
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