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- Minhaj Merchant Column | Pakistan Balochistan Crisis & Punjabistan Fear
2 घंटे पहले
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मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक
पाकिस्तान का 44 प्रतिशत भूभाग बलूचिस्तान में आता है। इस इलाके में करीब 1.4 करोड़ की छितराई हुई आबादी बसती है, जो पाकिस्तान की कुल 25 करोड़ से अधिक आबादी का छोटा-सा ही हिस्सा है। मार्च 1948 में- जब से पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर कब्जा किया- तब ही से यह सूबा पाकिस्तान के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ता आ रहा है।
1947 में बंटवारे के समय बलूचिस्तान ‘कलात’ नाम की एक स्वतंत्र रियासत थी, जिसके शासक मीर अहमद यार खान हुआ करते थे। पाकिस्तानी हुकूमत ने कलात पर पाकिस्तान में विलय का दबाव डाला था। हालांकि, उसके बाद से बीते सात दशकों से बलूच नेतृत्व और पाकिस्तानी हुकूमत के बीच के रिश्ते उथल-पुथल भरे ही रहे हैं।
पाकिस्तान से आजादी की मांग को लेकर बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने बीते कुछ हफ्तों में पाकिस्तानी सेना पर हमले तेज कर दिए हैं। 5 जुलाई को बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी के लड़ाकों ने बलूचिस्तान के जियारत जिले में मंगी बांध की सुरक्षा कर रहे नौ पुलिसकर्मियों को मार दिया था।
8 जुलाई को बीएलए उग्रवादियों ने पाकिस्तानी सेना के वाहन पर घात लगा कर हमला किया, जिसमें 11 सैनिक मारे गए। इसी बीच, बीएलए उग्रवादियों ने मस्तुंग जिले में भी पाकिस्तान सेना के काफिले को बम से उड़ा दिया, जिसमें अनुमानतः 45 सैनिकों की मौत हो गई। एक प्रतीकात्मक कदम के रूप में बलूच नेताओं ने पाकिस्तान से स्वतंत्रता की घोषणा करते हुए अपने देश का नाम ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ रख दिया है।
हालांकि, इन दावों को अब तक किसी भी देश ने मान्यता नहीं दी है। यहां यह याद रखना जरूरी है कि चीन और अमेरिका, दोनों की ही दिलचस्पी शांतिपूर्ण बलूचिस्तान में है। चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर (सीपैक) बनाकर बलूचिस्तान में बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है। वहीं, अमेरिका बलूचिस्तान के महत्वपूर्ण खनिजों, सोने और तांबे की खदानों तथा तेल सम्पदा तक पहुंच बनाना चाहता है।
भारत भी इस पूरे मसले पर नजर बनाए है। स्थानीय बलूच नेता मीर यार बलूच ने रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का राष्ट्रगान जारी किया है और भारत से नई दिल्ली में बलूचिस्तान का दूतावास खोलने का अनुरोध किया है। हालांकि, नई दिल्ली ने फिलहाल तो इस पर सावधानीपूर्ण प्रतिक्रिया ही दी है, क्योंकि बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा के आसपास सुरक्षा हालात अभी अस्थिर बने हुए हैं।
पाकिस्तान ने 1948 में कब्जे के बाद से ही बलूचिस्तान की उपेक्षा की है। इसीलिए आज भी यह पाकिस्तान के सबसे गरीब प्रांतों में से एक है और वैश्विक आतंकवाद के लिए उपजाऊ भूमि बना हुआ है। अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमलों के बाद अफगान तालिबान के नेता मुल्ला मोहम्मद उमर ने अफगानिस्तान में अमेरिकी-नेतृत्व वाली नाटो सेनाओं के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया था।
मुल्ला उमर 2001 में पाकिस्तान भाग गया था। पाकिस्तानी हुकूमत ने उसे क्वेटा में ही छिपाकर रखा था। यानी पाकिस्तानी फौज एक ओर तो नाटो का साथ देने का ढोंग कर रही थी, वहीं दूसरी ओर वह तालिबान की मददगार भी बनी रही था। ऐसा दोहरा खेल खेलना पाकिस्तानी लीडरान की प्रवृत्ति रही है। उन्होंने लगभग एक दशक तक ओसामा बिन लादेन को भी एबटाबाद में छिपाकर रखा था, जब तक कि 2011 में अमेरिकी नेवी सील्स ने उसे ढूंढकर मार नहीं गिराया।
पश्चिमी देशों के लिए पाकिस्तान की उपयोगिता के कारण बलूचिस्तान के मुक्ति आंदोलन को भले ही व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन न मिल पाए, लेकिन इसे पाकिस्तान के जातीय आधार पर बिखरने की शुरुआत माना जा सकता है। उधर पीओके में भी असंतोष बढ़ रहा है। खैबर पख्तूनख्वा में उथल-पुथल है। बलूचिस्तान से सीमा साझा करने वाले सिंध में भी पाकिस्तानी फौज और हुकूमत में पंजाबियों के दबदबे के खिलाफ लंबे समय से प्रदर्शन चल रहे हैं।
11.2 करोड़ (44%) आबादी वाले पाकिस्तानी पंजाबी इस मुल्क का सबसे समृद्ध और प्रभावशाली जातीय समूह हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि जहां पंजाबी पाकिस्तानी 44 प्रतिशत हैं, वहीं पंजाब देश के केवल 26 प्रतिशत भूभाग पर फैला हुआ है। उधर, बलूच आबादी महज 6 प्रतिशत है, लेकिन बलूचिस्तान में पाकिस्तान का 44 प्रतिशत भूभाग आता है।
यदि बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और सिंध भी बांग्लादेश की तरह पाकिस्तान से अलग हो जाएं तो वह ‘पंजाबिस्तान’ नाम का एक छोटा-सा राज्य भर रह जाएगा। अतीत में यूरोप के यूगोस्लाविया में भी इसी तरह का विघटन हुआ था। लंबे जातीय संघर्षों के बाद वहां से सात स्वतंत्र राष्ट्र उभरे थे- स्लोवेनिया, क्रोएशिया, सर्बिया, मोंटेनेग्रो, बोस्निया एंड हर्जेगोविना, उत्तर मैसेडोनिया और कोसोवो।
हालांकि, दोनों स्थितियों में एक स्पष्ट अंतर भी दिखता है। शीत युद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो देशों ने एक भू-राजनीतिक रणनीति के तहत जानबूझकर यूगोस्लाविया को विखंडित किया था। लेकिन पाकिस्तान के मामले में अमेरिका की रुचि देश को एकजुट बनाए रखने में है।
1947 से अमेरिका और ब्रिटेन पाकिस्तान का उपयोग अपने भू-राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करने वाले किसी देश के तौर पर करते रहे हैं। पाकिस्तान के सैन्य तानाशाहों से निपटना सरल है और उन्हें घूस देना भी उतना ही आसान है। सीआईए और आईएसआई अंदरखाने मिलकर ही काम करती हैं।
देखें तो पाकिस्तान ऐतिहासिक रूप से अमेरिका का एक प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी रहा है। अमेरिका 1989 से ही पाकिस्तान द्वारा भारतीय नागरिकों पर कराए गए आतंकी हमलों को अनदेखा करता रहा है। लेकिन क्या वह खनिज सम्पदा से भरपूर बलूचिस्तान में सुलग रही क्रांति को भी अनदेखा कर सकता है?
बलूचिस्तान की आजादी का आंदोलन महत्वपूर्ण है… बलूचिस्तान मुक्ति आंदोलन को भले व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन न मिले, इसे पाकिस्तान के जातीय आधार पर बिखरने की शुरुआत माना जा सकता है। पीओके और खैबर पख्तूनख्वा में भी उथल-पुथल है। सिंध में पंजाबियों के दबदबे के खिलाफ लंबे समय से प्रदर्शन चल रहे हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

