5 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
अमेरिका में जीई एप्लायंसेज के 1.1 मिलियन स्क्वायर फुट के कुकिंग-एप्लायंस प्लांट की असेंबली लाइन पर आपका सहकर्मी फिजिकल एआई का एक रूप हो सकता है। इसे दो पैरों वाला इंसान जैसा रोबोट समझने की भूल न करें।
मैं इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन और फिजिकल एआई की बात कर रहा हूं, जहां मशीनें महसूस करने, प्रतिक्रिया देने और जटिल फिजिकल टास्क पूरे करने में सक्षम हो रही हैं। छह-एक्सिस वाले रोबोटिक आर्म विशाल स्टोवों को पलटते हैं, ग्लास कुकटॉप को मेटल फ्रेम पर चिपकाते हैं और कंट्रोल बोर्ड को प्रोग्राम करते हैं।
इंसान और मशीनें साथ में काम करते हुए हर 15 सेकंड में एक यूनिट बनाने की होड़ में लगे हैं। पूरा ऑपरेशन मॉनिटर किया जाता है और डेटा लगातार सिस्टम से मैनेजर्स तक पहुंचता रहता है, ताकि प्रोडक्टिविटी की हरेक संभावना का इस्तेमाल किया जा सके।
आप सोच सकते हैं कि इसमें नया क्या है? कोई एनालिटिकल व्यक्ति तर्क दे सकता है कि मैन्युफैक्चरिंग, खासकर कम मार्जिन वाले कंज्यूमर-गुड्स बिजनेस के पास हाई-स्पीड प्रोडक्शन के अलावा कोई खास विकल्प है भी नहीं।
हर 15 सेकंड में एक यूनिट बनाना शायद जरूरी है। और फिर इस एआई-डॉमिनेटेड माहौल में इंसान के लिए काम करना कितना दिलचस्प हो सकता है? लेकिन यह उतना भी उबाऊ नहीं, जितना आप सोच रहे हैं। आठ घंटे की शिफ्ट में किसी व्यक्ति को फास्ट और फोकस्ड रहना पड़ता है, लेकिन जरूरी नहीं कि उसका जॉब बार-बार वही फिजिकल मूवमेंट दोहराना हो।
ऊपर बताई फैक्ट्री को ही लें। अगर कैमरा कोई गड़बड़ पकड़ता है, जैसे गैस्केट सही जगह नहीं लगा, तो एआई-ड्रिवन इंस्पेक्शन सिस्टम तत्काल असेंबली लाइन रोक सकता है और रॉक म्यूजिक बजा कर इंसानी सुपरवाइजर्स को अलर्ट कर सकता है। इससे काम की प्रकृति पूरी तरह बदल जाती है।
कर्मचारी अब कन्वेयर बेल्ट को बिना सोचे-समझे देखते रहने वाले लोग नहीं हैं। वे एक डायनेमिक सिस्टम के एक्टिव फर्स्ट रिस्पॉन्डर बन गए हैं। वे तेजी से ‘रोबोट रैंगलर्स’ बन रहे हैं- वे लोग जो रोबोटिक सेल्स की निगरानी करते हैं, सिस्टम पर नजर रखते हैं, तकनीकी गड़बड़ियां दूर करते हैं और मशीनों की परफॉर्मेंस को ऑप्टिमाइज करते हैं।
बदलाव यह है कि अब रिपीटेटिव काम करने के बजाय इस काम को करने वाली टेक्नोलॉजी को मैनेज करना है। वो दिन लद गए, जब कर्मचारियों को घंटों तक भारी मेटल चेसिस उठानी पड़ती थी या थका देने वाले अजीब रिस्ट-मूवमेंट करने पड़ते थे। जब मशीनें फिजिकल स्ट्रेन का बड़ा हिस्सा संभाल लेती हैं तो इंसान ज्यादा मेंटली अलर्ट रह सकते हैं और समस्याओं को एनालाइज कर निर्णय करने पर ध्यान दे सकते हैं।
आधुनिक प्लांट्स में फ्लेक्सिबिलिटी की भी ज्यादा जरूरत होगी। कर्मचारियों को अलग-अलग स्टेशनों और जिम्मेदारियों के बीच रोटेट किया जा सकता है। सुबह ऑटोमेटेड ग्लास-कुकटॉप असेंबली सेल संभालने वाला वर्कर दोपहर में ऑटोनॉमस मटेरियल-हैंडलिंग व्हीकल्स की निगरानी कर सकता है।
यहीं पर 2030 का जॉब सिनेरियो दिलचस्प हो जाता है। अगर भविष्य की फैक्ट्री को टेक्नोलॉजी प्रॉब्लम सॉल्वर की जरूरत होगी तो आपको आज क्या करना चाहिए- यदि आप 2030 में ऐसी फैक्ट्रियों का हिस्सा बनना चाहते हैं तो।
1. एआई और ऑटोमेशन के बेसिक्स सीखें। आपको एआई साइंटिस्ट बनने की जरूरत नहीं, लेकिन यह समझना चाहिए कि सेंसर, मशीन विजन, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन सिस्टम और एआई-बेस्ड डिसीजन-मेकिंग कैसे काम करते हैं। 2. डेटा लिटरेसी विकसित करें। किसी फ्यूचर वर्कर को डैशबोर्ड पढ़ने, बेसिक स्टैटिस्टिक्स समझने, असामान्य पैटर्न पहचानने और डिसीजन लेने के लिए डेटा का इस्तेमाल करने में सहज होना होगा। अगर कोई मशीन कहती है कि कुछ गड़बड़ हुई है तो इंजीनियर का इंतजार करने के बजाय वर्कर को यह आना चाहिए कि उस जानकारी का मतलब क्या है। 3. पायथन, पीएलसी प्रोग्रामिंग, रोबोटिक्स सॉफ्टवेयर या इंडस्ट्रियल कंट्रोल सिस्टम्स का शुरुआती ज्ञान भी किसी वर्कर को ऑटोमेटेड फैक्ट्री में कहीं ज्यादा मूल्यवान बना सकता है। 4. ट्रबलशूटिंग और प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स मजबूत करें। मशीन किसी गड़बड़ को पहचान सकती है, लेकिन इंसानों की जरूरत फिर भी पड़ेगी- यह समझने के लिए कि ऐसा क्यों हुआ, आगे क्या करना है और ऐसा दोबारा न हो।
फंडा यह है कि 2030 तक सबसे ज्यादा एम्प्लॉयेबल फैक्ट्री वर्कर शायद वह व्यक्ति नहीं होगा, जो हाथों से तेज काम कर सके। वह ऐसा व्यक्ति हो सकता है, जो मशीन को समझ सके, उसके डेटा पर सवाल उठा सके, उसकी गड़बड़ियां ठीक कर सके और उसे बेहतर काम करना सिखा सके। फ्यूचर स्मार्ट वर्कर को बदलना होगा, इससे पहले कि फैक्ट्री उसे बदल दे।

