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- Navneet Gurjar’s Column – Rich Music, Literature, And A Weak Monsoon
4 घंटे पहले
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नवनीत गुर्जर
इस बार मानसून बेहद कमजोर रहा। इसे बिहार में आई बाढ़ से जोड़कर मत देखिए। वो तो नेपाल से छोड़े गए बेइंतहा पानी का परिणाम है। कमजोर मानसून के कारण कई राज्यों के कई हिस्सों में फसलें चौपट हो गईं। कहीं पैदावार प्रभावित हुई। कहीं किसानों को बीज तक नसीब नहीं हो सका।
दरअसल, हमने अंधाधुंध तरीके से पेड़ काटे। हमारे किसानों ने ज्यादा से ज्यादा फसल के चक्कर में जंगल, बीड़ तो छोड़ी ही नहीं, मेड़ें तक को मिनिएचर बना दिया। हरियाली गायब हो गई।
नतीजा यह हुआ कि बादलों को बुलावा देने वाला कोई नहीं बचा। न पेड़, न हरियाली। जैसे शहर कंक्रीट के जंगल बन गए, वैसे ही गांव और खेतों ने भी हरियाली का दामन छोड़ दिया।
हमने अपने बच्चों को भी यह नहीं सिखाया कि बारिश का हमारे देश के संदर्भ में महत्व क्या है। उसका उपयोग, उसकी महत्ता समझाने के लिए हमारे पास कुछ भी नहीं बचा। ऊपर से हमने बच्चों को पहली कविता क्या सिखाई?
“रेन-रेन गो अवे, कम अगेन अनॉदर डे। लिट्टिल बेबी वॉन्ट्स टु प्ले, रेन-रेन गो अवे।’
मतलब, “बच्चे खेलना चाहते हैं, इसलिए बारिश, अभी तू जा। फिर कभी आना।’ पश्चिमी देशों में बार-बार बारिश होती है इसलिए उन्होंने यह कविता बनाई। हमारे यहां ऐसा कहां है? हमारे बच्चे तो बारिश में ज्यादा अच्छे से खेलना-कूदना चाहते भी हैं और जानते भी हैं।
फिर हम क्यों सिखा रहे हैं- “रेन-रेन गो अवे…?’ पहले से ही कम हो रही है और हम कह रहे हैं अभी तू जा। फिर कभी आना। कोई ठहरकर सोचने को तैयार नहीं है। इसके उलट महाराष्ट्र- जहां के अधिकांश हिस्सों में इस बार भले ही सूखा पड़ा हो- लेकिन उन्होंने बारिश को बुलाने वाली कविता रची-
“येरे-येरे पावसा, तुला देतो पैसा, पैसा झाला खोटा, पाउस आला मोठा।’
मतलब- “आओ-आओ बारिश, मैं तुम्हें पैसे दूंगा। पैसा भले खोटा निकला लेकिन बारिश जमकर आई।’ जाने क्यों हम पश्चिम के अंधानुकरण में फंसे हैं। अगर इसी तरह हम कविता गा-गाकर बारिश को भगाते रहे तो आने वाली पीढ़ी बारिश का महत्व भला कैसे जानेगी? उसे सहेजने और सम्भालने की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है।
हां, हिंदुस्तानी कण्ठ-संगीत में जरूर बारिश के लिए तरह-तरह से आह्वान किया जाता है। लेकिन उसे गाने वाले अब कम हैं और सुनने वाले और भी कम। यहां बात हो रही है राग मल्हार की। दरअसल, मल्हार एक राग-परिवार है। इसके सदस्य के रूप में कई राग हैं, जिनमें प्रमुख हैं- मियां की मल्हार, गौड़ मल्हार, मेघ मल्हार, सूर मल्हार, रामदासी मल्हार, नट मल्हार, जयंत मल्हार, शुद्ध मल्हार, धानी मल्हार आदि।
देखिए इन रागों में वर्षा का आह्वान कैसे किया जाता है। जैसे मियां की मल्हार में बंदिश- “घन गरजत- बरसत बूंद-बूंद…।’ मेघ मल्हार की बंदिश- “सखी बदरा बरसे झनन-झनन।’ गौड़ मल्हार- “गरजत, बरसत सावन आयो रे…।’ हर जगह बारिश का स्वागत,… लेकिन हम क्या सीख और सिखा रहे हैं- “रेन-रेन गो अवे!’
अब अंत में आते हैं बिहार की बाढ़ पर। यहां इस बाढ़ के कारण बरसों से बेघर होते आए लोगों के लिए महान कवि कुसुमाग्रज की ये कविता- “गंगा माई पाहुनी आली, गेली घरट्यात राहुन…।’
हिंदी में देखिए :… “गंगा मैया आई थी, मेहमान बनकर। कुटिया में रहकर गई, मायके आई हुई लड़की की तरह। चारों दीवारों पर नाची। खाली हाथ अब जाती कैसे? खैर से पत्नी बची है। दीवार चूरा हो गई, चूल्हा बुझ गया। जो था, नहीं था, सब गया! परसाद में पलकों के नीचे, चार कतरे रख गई है पानी के!’
- जाने क्यों हम पश्चिम के अंधानुकरण में फंसे हैं। अगर इसी तरह हम “रेन-रेन गो अवे’ गा-गाकर बारिश को भगाते रहे तो आने वाली पीढ़ी बारिश का महत्व भला कैसे जानेगी? उसे सहेजने और सम्भालने की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है।

