5 जुलाई को इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा- अमेरिका ही नहीं, बल्कि हमारे कुछ और दोस्त भी हैं। जैसे- 1.4 अरब आबादी वाला भारत। नेतन्याहू का ये बयान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को जवाब था। वेंस ने पिछले महीने कहा था कि ट्रम्प दुनिया के इकलौते
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आखिर नेतन्याहू ने इकलौते भारत का ही जिक्र क्यों किया, दोनों देशों की ‘पक्की दोस्ती’ के पीछे की कहानी, 4 चैप्टर्स में…

भारत-इजराइल में औपचारिक राजनयिक संबंध 1992 में बने, लेकिन उससे काफी पहले से इजराइल मुसीबत में भारत की गुपचुप तरीके से मदद करने लगा था…
1962: जब इजराइली झंडे लगे जहाज हथियार लेकर भारत पहुंचे
- 20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारत पर हमला कर दिया। इजराइली दस्तावेजों के मुताबिक, 27 अक्टूबर 1962 को पीएम जवाहरलाल नेहरू ने इजराइली पीएम डेविड बेन गुरियन को चिट्ठी लिखकर हथियारों की मदद मांगी।
- 2 नवंबर को गुरियन ने जवाब दिया, ‘मैं आपसे सहमत हूं। सभी देशों को संप्रभुता की गारंटी देनी चाहिए। आपकी सीमाओं पर तनाव कम करने के लिए हर संभव कोशिश का समर्थन करना चाहिए।’
- 18 नवंबर, 1962 को नेहरू ने गुरियन को एक और चिट्ठी में लिखा, ‘सीमाई इलाकों में हम आज जिस गंभीर स्थिति का सामना कर रहे हैं। उसकी चिंता करने के लिए हम आपके आभारी हैं। हमने किसी की एक इंच भी जमीन पर दावा नहीं किया है। लेकिन हम अपनी जमीन पर हमले का विरोध करने के लिए मजबूर हैं।’
- दस्तावेजों में शामिल एक नोट से पता चला कि भारत को जंग के दौरान इजराइल से हथियार और गोला-बारूद मिले थे। हालांकि अरब देश न नाराज हों, इसलिए भारत ने इजराइल से बिना झंडे वाले जहाजों में हथियार भेजने को कहा था, लेकिन हथियार इजराइली झंडे वाले जहाजों में भारत पहुंचाए गए।

इजराइल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन ने 1958 में पीएम नेहरू की छोटी बहन कृष्णा नेहरू से मुलाकात की थी। पीएम नेहरू खुद कभी बेन गुरियन से नहीं मिले।
1965 और 1971: पाकिस्तान के खिलाफ मोर्टारों की खेप भेजी
- थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान इजराइल ने M-58 नाम के 160mm के मोर्टार और गोला-बारूद दिए थे। इसे गोपनीय तरीके से पोलैंड के मूल के इजराइली व्यापारी श्लोमो जब्लुडोविच की कंपनी ने अंजाम दिया।
- 1971 में भारत जब बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में शामिल हुआ, तब उसे दोबारा भारी मोर्टारों की जरूरत पड़ी। जंग में अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की तरफ था। इजराइल खुलेआम मदद करता, तो अमेरिका नाराज हो सकता था।
- नेहरू मेमोरियल म्यूजियम में रखे दस्तावेजों के मुताबिक, 3 अगस्त 1971 को श्लोमो दिल्ली में भारतीय उच्चायुक्त प्रकाश कौल से मिले और हथियारों की आपूर्ति बढ़ाने का वादा किया। श्लोमो ने इजराइली सरकार से बात की और सितंबर में ईरान के लिए बने भारी मोर्टारों की खेप को भारत भेज दी।
1999: कारगिल में इजराइली तकनीक से उड़ाए पाकिस्तानी बंकर
- मई 1999 के आखिर तक भारतीय सेना को जंग में भारी नुकसान उठाना पड़ा था। बोफोर्स तोपें और मौजूदा हथियार कम पड़ रहे थे। लेजर-गाइडेड बम के अलावा सटीक लोकेशन बताने वाला नेविगेशन सिस्टम चाहिए था। उस समय अमेरिका के पास सैटेलाइट-आधारित GPS तकनीक थी।
- अमेरिका ने एक साल पहले, यानी 1998 में भारत के पोखरण न्यूक्लियर टेस्ट के चलते उसे हथियार देने से मना कर दिया। अमेरिका सहित जापान और कनाडा जैसे देशों ने भी बैन लगाए। वहीं इजराइल न सिर्फ भारत का विरोध करने से बचा, बल्कि उसने भारत की सैन्य मदद भी की।
- नीदरलैंड्स के फॉरेन एक्सपर्ट निकोलस ब्लारेल अपनी किताब ‘द इवॉल्यूशन ऑफ इंडियाज इजराइल पॉलिसी’ में लिखते हैं, ‘इजराइल ने भारतीय वायुसेना के मिराज 2000 विमानों के लिए लेजर डेजिग्नेटर पॉड और लेजर-गाइडेड बम दिए। ये पॉड एक अदृश्य लेजर बीम छोड़ते हैं, जिसका पीछा करते हुए सटीक निशाने पर बम गिराया जा सकता है।’
- ऐसे सर्चर और ड्रोन दिए, जो ऊंचाई पर दुश्मन के बंकरों की रियल टाइम तस्वीरें खींच सटीक लोकेशन का पता लगा लेते थे।
- कारगिल इलाके की सैटेलाइट तस्वीरें दीं, जिनसे टाइगर हिल और पॉइंट 4875 जैसे स्ट्रैटेजिक लोकेशंस पर वापस कब्जा करने में मदद मिली। भारत को मोर्टार और गोला-बारूद की खेपें भी भेजीं।

इजराइल को 14 मई 1948 को आजादी मिली। संयुक्त राष्ट्र में इजराइल और फिलिस्तीन को बांटकर दो देश बनाने का प्रस्ताव पेश हुआ, तो भारत ने इसके खिलाफ वोट किया था। हालांकि, अगले ही साल 17 सितंबर, 1950 को भारत ने आधिकारिक रूप से इजराइल को एक संप्रभु राष्ट्र के बतौर मान्यता दी।
‘इंडिया इजराइल पॉलिसी’ नाम की किताब लिखने वाले भारत के फॉरेन एक्सपर्ट पी.आर. कुमारस्वामी कहते हैं कि भारत और इजराइल के बीच 1950 से 1992 तक बिना रिश्तों के मान्यता वाला संबंध रहा।’
1971 की जंग में इजराइल ने विदेशी मंचों पर भी भारत का समर्थन किया और पाकिस्तानी सेना के पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में नरसंहार की आलोचना की थी। इजराइली पीएम गोल्डा मीर चाहती थीं कि इसके बदले इंदिरा गांधी इजराइल को पूर्ण राजनयिक मान्यता दें और औपचारिक राजनयिक संबंध कायम हों।
हालांकि तब भारत ने मान्यता नहीं दी। उलटा 1988 में जब फिलिस्तीन देश की घोषणा हुई, तो भारत इसे मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश था। हालांकि 4 साल बाद स्थिति तब बदलनी शुरू हुई, जब पीएम नरसिम्हा राव ने इजराइल से राजनयिक संबंध बनाए और दोनों देशों में पहली बार दूतावास खोले गए।

फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन (PLO) के चेयरमैन यासर अराफात 3 मार्च, 1980 को भारत आए थे। दिल्ली हवाई अड्डे पर उनकी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और विदेश मंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के साथ ली गई तस्वीर।
पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत-इजराइल रिश्तों का एक नया दौर शुरू हुआ। 2015 में इतिहास में पहली बार संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत ने फिलिस्तीन में इजराइली हमलों की निंदा करने वाले एक प्रस्ताव पर वोटिंग से परहेज किया। जबकि इसे 45 देशों ने पारित किया था।
पीएम मोदी के दौर में इजराइल को खुला समर्थन दिया
- 2017 में मोदी, इजराइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। अगले ही साल इजराइली पीएम नेतन्याहू भी भारत दौरे पर आए।
- इस दौरान एक शब्द प्रचलित हुआ- डी-हाइफनेशन। जानकार मानते हैं कि पीएम मोदी के दौर में भारत ने इजराइल और फिलिस्तीन के मुद्दे को डी-हाइफनेट किया है, यानी ऐतिहासिक रूप से भारत भले ही फिलिस्तीन के अस्तित्व को स्वीकारने वाली टू-नेशन थ्योरी का समर्थन करता रहा हो, लेकिन अब दोनों देशों का समर्थन या विरोध, दोनों ही मुद्दों के आधार पर तय होते हैं।
- 7 अक्टूबर 2023 को इजराइल पर हमास के हमले की भारत ने निंदा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X पर लिखा था, ‘हमास के आतंकवादी हमले से स्तब्ध हूं। हम इजराइल के साथ एकजुटता से खड़े हैं।’
- 27 अक्टूबर 2023 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में गाजा में इजराइली हमले और मानवीय युद्धविराम का प्रस्ताव लाया गया। 120 देशों ने इसके पक्ष में वोट किया, लेकिन भारत ने वोटिंग से परहेज किया।
- विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था, ‘हम आतंकवाद की निंदा करते हैं। भारत इजराइल के प्रति सहानुभूति रखता है और ऐसे प्रस्ताव का समर्थन नहीं कर सकता, जो हमास के हमले की सीधे तौर पर निंदा न करे।’
- 2023 और 2024 में संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के खिलाफ कई प्रस्ताव लाए गए। जैसे- गाजा में इजराइली कब्जे को रोकना और इजराइल को हथियारों की बिक्री रोकना। भारत इन पर वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रहा। हालांकि इजराइल-हमास में सीजफायर के प्रस्तावों का समर्थन भी किया।
- इजराइल और ईरान के युद्ध के दौरान भी भारत का रुख संतुलित रहा। अप्रैल 2024 से ही दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हमले शुरू कर दिए थे। इस दौरान भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर संयम बरतने और बातचीत से मामला हल करने की अपील की।
- जून 2025 में SCO समिट के दौरान ईरान पर इजराइल-अमेरिका के हमलों की निंदा का प्रस्ताव पास हुआ और सभी देशों ने एक साझा बयान दिया, लेकिन भारत ने इस प्रस्ताव और डिक्लेरेशन से दूरी बनाई।
- 25-26 फरवरी 2026 को पीएम मोदी इजराइल की यात्रा पर गए थे। उन्होंने कहा, ‘भारत मजबूती से और पूरे भरोसे के साथ इजराइल के साथ खड़ा है। कोई भी चीज आतंकवाद को न्यायसंगत नहीं ठहरा सकती।’ इसके ठीक दो दिन बाद 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ जंग छेड़ दी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25-26 फरवरी को इजराइल का दौरा किया था। इस दौरान AI, टेक्नोलॉजी, खेती और भारतीय कामगारों को इजराइल भेजने जैसे जरूरी समझौते हुए थे।

इजराइली हथियारों की खरीद में भारत की एक-तिहाई हिस्सेदारी
- SIPRI के मुताबिक, 2021-25 के बीच भारत के कुल डिफेंस इम्पोर्ट में इजराइल की हिस्सेदारी 15% है। बीते सालों में भारत ने हथियारों के लिए रूस पर निर्भरता कम करके, इजराइल और फ्रांस की तरफ रुख किया है।
- स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट, यानी SIPRI के मुताबिक 2020 से 2024 के बीच इजराइली हथियारों की बिक्री में सबसे ज्यादा 34% हिस्सेदारी भारत की थी। इस दौरान भारत ने 20.5 बिलियन डॉलर, यानी करीब 2 लाख करोड़ रुपए के हथियार खरीदे।
- इनमें इजराइली ड्रोन, रडार और सर्विलांस सिस्टम, गाइडेड बम, राइफल, लाइट मशीन गन, बराक-8 मिसाइल सिस्टम और स्पाइडर एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं।
- भारत इजराइल से राफेल लड़ाकू विमान से दागी जाने वाली ‘डर्बी’ और ‘पाइथन-5’ एयर-टू-एयर मिसाइलें भी खरीदता है।
भारत-इजराइल के बीच 1 लाख करोड़ का कारोबार
1992 में भारत और इजराइल के बीच द्विपक्षीय रिश्तों की शुरुआत हुई, तब दोनों देशों का व्यापार 202 मिलियन डॉलर का था। 2022-23 तक बढ़कर यह 10.77 बिलियन डॉलर, यानी १ लाख करोड़ पहुंच गया।
हालांकि बीते 2 सालों में द्विपक्षीय व्यापार में कमी आई है। इसकी वजह इजराइल-हमास जंग और इसकी वजह से समुद्री रास्ते में आई अड़चने हैं।

टाटा, अडाणी जैसी कंपनियों के इजराइल में निवेश
- 2000 से 2025 के बीच टाटा, अडाणी ग्रुप्स, टेक महिंद्रा, सन फार्मा, SBI जैसी कई भारतीय कंपनियों ने इजराइल में 443 मिलियन डॉलर का निवेश किया है। 2000 से 2024 के बीच इजराइल ने भी भारत में 334.2 मिलियन डॉलर का निवेश किया है।
- अडाणी ग्रुप ने इजराइल की गडोत कंपनी के साथ 1.2 बिलियन डॉलर में इजराइल का सबसे बड़ा हाइफा पोर्ट खरीदा है। अडाणी ग्रुप इसे मैनेज करता है। यह इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर, यानी IMEC की अहम कड़ी है।
- ‘मेक इन इंडिया’ के तहत इजराइल की डिफेन्स कंपनी- ‘राफेल एडवांस्ड सिस्टम्स’ और ‘एलबिट सिस्टम्स’ ने भारत के कल्याणी ग्रुप, अडाणी डिफेंस और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ साझेदारी की है। इससे भारत में ही इजराइली टेक्नोलॉजी के ड्रोन, मिसाइल सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक्स फ्यूज के मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स बनाए जाएंगे।

नेतन्याहू के बयान के 3 मायने हैं…
1. अकेला पड़ गया है इजराइल: स्ट्रैटजिक एक्सपर्ट ब्रह्म चेलानी के मुताबिक युद्ध के समय नेतन्याहू सरकार के तौर-तरीकों के चलते इजराइल दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है। यह लंबे समय में इजराइल के लिए खतरनाक है। वो दूसरे देशों का समर्थन जुटाना चाहता है, इसीलिए भारत का जिक्र किया। भारत और इजराइल के संबंध अहम हैं, लेकिन भारत में इजराइल के लोगों के प्रति सद्भावना है, न कि नेतन्याहू की सरकार के लिए।
2. नेतन्याहू घरेलू राजनीति साध रहे: भारतीय थिंकटैंक ORF में नॉन-रेसिडेंट फेलो और मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार कबीर तनेजा कहते हैं, ‘नेतन्याहू के भारत को दोस्त बताने वाले बयान को उनकी घरेलू राजनीति से जोड़कर देखा जाना चाहिए। उन पर मुकदमे चल रहे हैं और चुनाव आने हैं। घरेलू समर्थन कम न हो, इसलिए वे दिखा रहे हैं कि इजराइल अलग-थलग नहीं पड़ा है।’
कबीर तनेजा कहते हैं कि इजराइल-भारत की स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप खास तौर पर डिफेंस सेक्टर में है। इजराइल भारत को एडवांस हथियार देता है। ये साझेदारी नेतन्याहू के पहले भी थी और उनके बाद भी रहेगी।
3. भारत की संतुलन की पॉलिसी के लिए मुश्किल: जॉर्डन, लीबिया और रूस में भारत के राजदूत रहे अनिल त्रिगुणायत बताते हैं, ‘नेतन्याहू का का यह बयान भारत को गलत ब्रैकेट में डाल रहा है। भारत ने कभी भी इजराइल को बिना शर्त समर्थन नहीं दिया है। इस बयान के बाद भारत, इजराइल के साथ अपने संबंधों का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है।’
दरअसल, भारत बाकी देशों से भी अपने रिश्ते संतुलित रखने की कोशिश करता है। मिसाल के लिए जून 2025 में SCO समिट के दौरान भारत ने ईरान पर इजराइल और अमेरिका के हमलों की निंदा वाले प्रस्ताव से दूरी बनाई। हालांकि सितंबर में दोबारा इसी प्रस्ताव की घोषणा पर भारत ने साइन कर दिए थे।
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