राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में पूर्वोत्तर भारत की लोक संस्कृति, परंपराओं, म्यूजि, डांस का रंग एकसाथ देखने को मिला। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर की ओर से राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर के सहयोग से गुरुवार को आयोजित ‘ऑक्टेव-2026’ का उद्घाटन राज्यपाल
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राज्यपाल ने पूर्वोत्तर भारत को सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण अध्याय बताते हुए आठों राज्यों को ‘अष्ट लक्ष्मी’ की संज्ञा दी।
उद्घाटन समारोह में पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों के कलाकारों ने लोक नृत्यों की प्रस्तुतियां दीं। वहीं पारंपरिक परिधानों पर आधारित एथनिक कॉस्ट्यूम शो ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा।
कार्यक्रम में अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा की लोक संस्कृति को एक मंच पर प्रस्तुत किया गया। आठ राज्यों के 14 समूहों ने 15 अलग-अलग लोक नृत्य रूपों की कोरियोग्राफिक प्रस्तुति दी।
कार्यक्रम के फोटोज देखिए…

कार्यक्रम में राज्यपाल बागडे, केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत मौजूद रहे।

कलाकार ने बांसुरी की धुनों से सभी का मन मोह लिया।

कार्यक्रम में डब्ल्यूजेडसीसी के डायरेक्टर अश्विन दलवी भी मौजूद रहे।

पूर्वोत्तर राज्य कलाकार ने राज्यपाल को दुपट्टा भेंट किया।

कार्यक्रम में लोक कलाकारों ने नृत्य प्रस्तुतियों से खूब सराहना पाई।

ऑक्टेव की ओर से आर्ट कैम्प भी आयोजित हुआ, जिसमें कलाकारों की कृतियों को प्रदर्शित किया गया।

मंच पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने खासी चर्चा बटोरी।
पूर्वोत्तर के आठ राज्य ‘अष्ट लक्ष्मी’ : राज्यपाल
मुख्य अतिथि राज्यपाल हरिभाऊ किशनराव बागडे ने कहा- भारत की पहचान उसकी विविधता में एकता से है और इसी से ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना साकार होती है। उन्होंने कहा- भारतीय संस्कृति किसी एक भाषा, प्रदेश या परंपरा तक सीमित नहीं है। देश की वास्तविक सांस्कृतिक शक्ति उसकी अलग-अलग लोक परंपराओं, भाषाओं, संगीत, नृत्य, कला, शिल्प और जीवन-पद्धतियों में निहित है।
उन्होंने कहा- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। इन राज्यों की प्रकृति, जनजातीय परंपराएं, लोक आस्थाएं, पर्व-त्योहार, संगीत, नृत्य, वेशभूषा और हस्तशिल्प भारतीय सांस्कृतिक विरासत को और समृद्ध करते हैं।
राज्यपाल ने आयोजन के लिए केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर के निदेशक डॉ. अश्विन महेश दलवी की सराहना की। उन्होंने केंद्र के पूर्व निदेशक फुरकान खान के योगदान की भी प्रशंसा की।
‘एकता में विविधता’ को समझना जरूरी : शेखावत
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा- भारत की विविधता का वास्तविक अर्थ तब सामने आता है, जब अलग-अलग क्षेत्र एक-दूसरे के करीब आते हैं और एक-दूसरे की संस्कृति को समझते हैं।
उन्होंने कहा- शरीर के सभी अंग अलग-अलग हैं, लेकिन शरीर से अलग उनका कोई अस्तित्व नहीं है। इसी तरह भारत में अलग-अलग भाषाएं, संस्कृतियां और परंपराएं होने के बावजूद वे भारतीयता के व्यापक भाव से जुड़ी हैं।
15 लोक नृत्यों ने बांधा समां
उद्घाटन समारोह का सबसे आकर्षक हिस्सा आठ राज्यों के 15 लोक नृत्य रूपों की कोरियोग्राफिक प्रस्तुति रही। प्रसिद्ध कोरियोग्राफर प्रोफेसर तरुण प्रधान के निर्देशन में तैयार इस प्रस्तुति में एक के बाद एक लोक नृत्यों ने दर्शकों को पूर्वोत्तर की विविध सांस्कृतिक दुनिया से परिचित कराया।
प्रस्तुति की शुरुआत अरुणाचल प्रदेश के ताई खेमती नृत्य से हुई, जिसे ‘पीकॉक डांस’ के रूप में भी जाना जाता है। इसमें भगवान बुद्ध के प्रति आध्यात्मिक भाव को नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया। अरुणाचल प्रदेश के ही जुजु-जाजा नृत्य ने भी दर्शकों को आकर्षित किया।
मणिपुर के पुंग ठोल चोलम में कलाकारों ने पारंपरिक ढोल गले में लटकाकर कलाबाजियों और तेज गति के साथ प्रस्तुति दी। इसके बाद थांगटा में तलवार और भाले से जुड़े युद्ध कौशल को नृत्य के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। ‘थांग’ का अर्थ तलवार और ‘टा’ का अर्थ भाला बताया गया। मणिपुर के लाई हारोबा नृत्य ने भी दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं।
त्रिपुरा के होजागिरी नृत्य में कलाकारों ने असाधारण संतुलन और कौशल का प्रदर्शन किया। सिर पर बोतल और दीपक रखते हुए तथा हाथों में थाली लेकर घड़े पर खड़े होकर किए गए इस नृत्य ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। वहीं त्रिपुरा के ममिता नृत्य में फसल की पैदावार के बाद देवी लक्ष्मी की पूजा और आस्था को नृत्य के रूप में प्रस्तुत किया गया।
सिक्किम के तमंग सेलो नृत्य के जरिए बौद्ध परंपरा में विवाह समारोह की झलक दिखाई गई। इसी राज्य के सिंघी छम में कलाकार हिम शेर की वेशभूषा में मंच पर उतरे और प्रस्तुति के जरिए दर्शकों को रोमांचित किया।
मेघालय के वांगला नृत्य में अच्छी फसल के लिए सूर्य देवता ‘सालजोंग’ के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा दिखाई गई। असम के बोडो समुदाय का ऊर्जावान बारदोई सिखा नृत्य भी दर्शकों को खूब पसंद आया। इसके बाद असम के प्रसिद्ध बिहू नृत्य की प्रस्तुति ने माहौल में और ऊर्जा भर दी।
मिजोरम के चेराव नृत्य में कलाकारों ने बांस की छड़ियों के बीच बेहतरीन तालमेल के साथ प्रस्तुति दी। इसी राज्य के सरलामकाई यानी सोलकिया नृत्य में युद्ध में जीत का जश्न नृत्य के माध्यम से दिखाया गया।
वहीं नगालैंड के पारंपरिक नागा वार डांस में कलाकारों ने ढोल की थाप पर हुंकार, तेज फुटवर्क और युद्ध कौशल से जुड़ी मुद्राओं के जरिए वीरता और सामुदायिक शक्ति का प्रदर्शन किया। अलग-अलग राज्यों के इन नृत्यों ने मिलकर पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक विविधता का जीवंत चित्र मंच पर प्रस्तुत किया।
एथनिक कॉस्ट्यूम शो में दिखी आठ राज्यों की पहचान
कार्यक्रम में पूर्वोत्तर के पारंपरिक परिधानों पर आधारित ‘एथनिक कॉस्ट्यूम शो’ भी आकर्षण का केंद्र रहा। भानुश्री दास के निर्देशन में हुए इस शो में आठों राज्यों के पारंपरिक पहनावे को मंच पर प्रदर्शित किया गया।
‘सेवन सिस्टर्स एंड वन ब्रदर’ के रूप में पहचाने जाने वाले पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की अलग-अलग पारंपरिक पोशाकें पहनकर युवक-युवतियां मंच पर पहुंचे। प्रत्येक राज्य की पोशाक को मॉडल्स ने अलग-अलग और फिर जोड़ों में प्रस्तुत किया। अंत में सभी आठ मॉडल एक साथ मंच पर आए और दर्शकों के सामने पूर्वोत्तर की विविध वेशभूषाओं का सामूहिक प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम में राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर के निदेशक निहाल चंद गोयल, सांसद मंजू शर्मा और विधायक गोपाल शर्मा आदि मौजूद रहे।
