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Overactive Brain Vs Night Sleep; Mind Overthinking Symptoms & Reasons


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40 मिनट पहले

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सवाल– मैं 34 साल की हूं और एक आईटी कंपनी में काम करती हूं। दिन भर तो मैं ऑफिस के कामों में व्यस्त रहती हूं, लेकिन जैसे ही रात में बिस्तर पर जाती हूं, मेरा दिमाग सुपर एक्टिव हो जाता है। दिमाग में दिन भर की बातें घूमने लगती हैं। कौन-सा काम अधूरा रह गया, बॉस ने क्या कहा, कल क्या करना है। यहां तक कि नई-पुरानी जाने कहां-कहां की बातें आने लगती हैं। किसी इनविजिबल फ्यूचर और मौत तक का डर सताने लगता है। मैं चाहकर भी अपने दिमाग को रोक नहीं पाती और इन्हीं सबके बारे में सोचती रहती हूं। कई बार दो-तीन घंटे तक नींद नहीं आती। क्या ये स्ट्रेस है या किसी मेंटल हेल्थ इशु के कारण है?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। रात में सोने के समय दिमाग में तरह–तरह के विचार आना काफी कॉमन है। दिनभर हमारा दिमाग काम में बिजी होता है। ईमेल, मीटिंग, फोन, डेडलाइन और छोटे-बड़े फैसले ब्रेन को लगातार सक्रिय रखते हैं। यानी शरीर भले ही थक रहा हो, दिमाग को रुकने का मौका नहीं मिलता।

फिर रात में काम खत्म होता है और हम बिस्तर पर पहुंचते हैं। तब बाहर की हलचल तो थम जाती है, लेकिन दिमाग इतनी जल्दी शांत नहीं होता। दिन भर जिन बातों पर ध्यान देने का समय नहीं मिला, वे एक-एक करके याद आने लगती हैं। रात में ब्रेन ओवरएक्टिव होने के पीछे ये संभावित कारण हो सकते हैं–

रात में कौन से विचार आते हैं?

रात के समय ब्रेन में दो तरह की चीजें एक्टिव हो सकती हैं–

1. बार-बार पुरानी बातों को दोहराना

बार–बार पुरानी या एक ही तरह की बातों को दोहराते रहने को रुमिनेशन कहते हैं। मसलन—

  • बॉस ने ऐसा क्यों कहा?
  • मैंने मीटिंग में वह बात क्यों बोली?
  • मुझसे गलती तो नहीं हो गई?
  • मुझे उस समय कुछ और कहना चाहिए था?

2. भविष्य की चिंता करना

यह चिंता है। इसमें दिमाग बार-बार भविष्य की संभावित परेशानियों के बारे में सोच–सोचकर परेशान होता है, जैसेकि–

  • अगर कल काम पूरा नहीं हुआ तो?
  • अगर बॉस नाराज हो गए तो?
  • अगर कुछ गलत हो गया तो?
  • आगे मेरी नौकरी का क्या होगा?

रुमिनेशन और चिंता, दोनों मिलकर दिमाग को लगातार सक्रिय रख सकते हैं। इसका संबंध एंग्जाइटी, डिप्रेशन या इंसोम्निया के साथ भी देखा गया है। लेकिन सिर्फ ज्यादा सोचने का मतलब कोई मानसिक बीमारी होना नहीं है।

जितना रोकेंगे, विचार उतने ही ज्यादा आएंगे

मान लीजिए कोई आपसे कहे कि अगले एक मिनट तक गुलाबी हाथी के बारे में बिल्कुल मत सोचिए। संभव है कि सबसे पहले आपके दिमाग में गुलाबी हाथी ही आए।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि विचार को रोकने के लिए दिमाग बार-बार जांचता है कि कहीं वही विचार तो नहीं आ रहा। इससे वह विचार और ज्यादा सक्रिय हो सकता है। यही बात रात में भी हो सकती है। आप खुद से कहें– “मुझे बिल्कुल नहीं सोचना है। मुझे अभी सोना है।”

लेकिन दिमाग उसी विचार की निगरानी करने लगता है। इसलिए विचारों से लड़ने की बजाय उन्हें पहचानना बेहतर है। खुद से कहें—

“मेरे दिमाग में यह विचार आया है। मुझे इसे अभी हल करने की जरूरत नहीं है।”

क्या यह OCD (ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर) है?

सिर्फ बार-बार सोचने का मतलब OCD नहीं है। OCD में विचार अक्सर व्यक्ति की इच्छा के खिलाफ आते हैं। वे परेशान करने वाले होते हैं और व्यक्ति को उनसे छुटकारा पाने या पूरी तरह आश्वस्त होने की जरूरत महसूस हो सकती है।

इसके बाद व्यक्ति कुछ काम बार-बार कर सकता है, जिसे कंपल्शन कहते हैं। ये दो तरह के हो सकते हैं—

फिजिकल कंपल्शन

जैसेकि बार-बार हाथ धोना, ताला चेक करना, चीजों को खास तरीके से लगाना या बार-बार वापस जाकर देखना।

मेंटल कंपल्शन

जैसेकि मन–ही–मन गिनती करना, किसी शब्द या प्रार्थना को दोहराना, पुरानी घटना को बार-बार याद करके जांचना या अपनी भावनाओं को बार-बार परखना।

मेंटल कंपल्शन बाहर से दिखाई नहीं देते। लेकिन इनमें भी काफी समय जा सकता है। OCD में इन कामों से थोड़ी देर के लिए राहत मिलती है। फिर वही संदेह या बेचैनी वापस आ सकती है।

ये ओवरथिंकिंग है या OCD

करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट

यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। पिछले दो हफ्तों को ध्यान में रखकर नीचे दिए सवालों का जवाब दें। नीचे ग्राफिक्स में दो सेक्शन में कुल 10 सवाल हैं। पहले सेक्शन में ‘ओवरस्टिमुलेशन और रूमिनेशन’ से जुड़े सवाल हैं और दूसरे सेक्शन में OCD से जुड़े सवाल हैं। आपको इन सवालों को 0 से 3 के स्केल पर रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपका जवाब ‘कभी नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘लगभग हर दिन’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपना स्कोर टोटल करें। नीचे ग्राफिक के बाद स्कोर की एनालिसिस देखें।

स्कोर इंटरप्रिटेशन

सेक्शन A में अगर स्कोर 9 या उससे ज्यादा है तो इसका मतलब है कि ओवरस्टिमुलेशन और रूमिनेशन मुख्य समस्या हो सकती है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है।

सेक्शन B में अगर सवाल 8 और 10 का अंक 2 या 3 है तो OCD (ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर) मुख्य समस्या हो सकती है।

नींद पर असर कितना गंभीर?

अगर रात में ये चीजें हो रही हैं तो इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है–

  • नींद आने में काफी समय लग रहा है।
  • बार-बार नींद खुल रही है।
  • सुबह जल्दी नींद खुल रही है।
  • इसका असर अगले दिन की ऊर्जा, ध्यान या काम पर पड़ रहा है।

ऐसे में आप 14 दिन की स्लीप डायरी बनाएं और उसमें रोज लिखें—

  • कितने बजे बिस्तर पर गई।
  • कितने बजे उठी।
  • नींद आने में कितना समय लगा।
  • रात में कितनी बार नींद खुली।
  • दिन में झपकी ली या नहीं।
  • चाय-कॉफी कब और कितनी पी।
  • शाम को स्क्रीन पर कितना समय बिताया।
  • अगले दिन ऊर्जा और एकाग्रता कैसी रही।

साथ ही ये बातें समझना भी जरूरी है–

  • अगर नींद की समस्या तीन महीने या उससे ज्यादा समय तक बनी रहे तो इसे लंबे समय का इंसोम्निया माना जा सकता है।
  • इसके पीछे कारण सिर्फ तनाव ही नहीं होता। डॉक्टर जरूरत पड़ने पर दवाओं, कैफीन, थायरॉइड की समस्या, दर्द, हार्मोनल बदलाव, डिप्रेशन, एंग्जाइटी या शिफ्ट वर्क जैसी वजहों को भी देखते हैं।
  • अगर तेज खर्राटे आते हैं, नींद में सांस रुकती है या घुटन के साथ नींद खुलती है, तो स्लीप एप्निया की जांच भी जरूरी हो सकती है।

रात में ब्रेन को शांत करने के 6 स्टेप्स

1. सोने से 2 घंटा पहले काम बंद करें

काम खत्म करते समय एक छोटी-सी सूची बनाएं—

  • आज क्या पूरा किया।
  • क्या अधूरा रह गया।
  • कल सबसे पहले कौन-सा काम करना है।

इससे दिमाग को यह भरोसा मिलता है कि कोई जरूरी बात भूली नहीं है। उन्हें लिख लिया गया है।

2. सोने से पहले 45-60 मिनट का शांत समय रखें

इस दौरान ऑफिस का काम, ईमेल और बहुत ज्यादा उत्तेजित करने वाली स्क्रीन गतिविधियों से दूर रहें। दिमाग को काम से आराम की स्थिति में आने का समय दें।

3. सोचने, चिंता करने का टाइम फिक्स करें

शाम को करीब 20 मिनट का समय “सोचने के लिए” फिक्स करें। अपनी हर चिंता के बारे में खुद से पूछें—

क्या यह ऐसी समस्या है, जिसे मैं अभी हल कर सकती हूं?

अगर हां, तो एक छोटा कदम तय करें।

अगर यह सिर्फ “अगर ऐसा हो गया तो?” वाली चिंता है तो उसे लिख लें और उस समय आगे न बढ़ाएं। रात में खुद से कहें—

“यह बात मैंने लिख ली है। इसे अभी हल करने की जरूरत नहीं है।”

4. विचार आए तो उसे पहचानें

दिमाग में विचार आते ही खुद से कहें—

“मेरा दिमाग मीटिंग को दोबारा चला रहा है।”

या

“यह भविष्य की चिंता है।”

अपने विचार को रोकने की कोशिश न करें। उसे पहचानें और अपना ध्यान धीरे से वर्तमान में वापस लाएं।

5. बिस्तर को चिंता की जगह न बनाएं

बिस्तर पर तभी जाएं, जब नींद आने लगे। अगर काफी देर तक नींद नहीं आ रही, तो बिस्तर से उठकर हल्की रोशनी वाली जगह पर शांत काम करें। नींद आने लगे तो वापस बिस्तर पर जाएं। बार-बार घड़ी न देखें। इससे नींद को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

6. नींद की बुनियादी आदतें सुधारें

  • रोज लगभग एक ही समय पर उठें।
  • सुबह कुछ देर प्राकृतिक रोशनी लें।
  • दिन में नियमित शारीरिक गतिविधि करें।
  • सोने से छह घंटे पहले कैफीन लेना बंद करें।
  • रात में भारी भोजन और निकोटिन से बचें।
  • नींद आने के लिए शराब का सहारा न लें।
  • कमरे को अंधेरा, शांत और आरामदायक रखें।
  • दिन में लंबा नैप न लें।

डॉक्टर से कब मिलना चाहिए?

अगर नींद की समस्या कई महीनों से बनी हुई है और काम या रिश्तों पर असर पड़ रहा है तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की सलाह लें।

अंतिम बात

हमारा लक्ष्य दिमाग को पूरी तरह खाली करना नहीं है। विचार आना सामान्य है। हमें यह सीखना है कि हर विचार को खींचना या पकड़कर उसका विश्लेषण करने लगना जरूरी नहीं है। विचारों को आने दें, उन्हें पहचानें और फिर उन्हें जाने दें।

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ग्राफिक्स- विपुल शर्मा

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