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Parenting Conflict Impact; Husband Wife Disagreements Vs Child


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10 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा

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सवाल- मैं 36 साल की एक वर्किंग महिला हूं। हमारा 9 साल का बेटा है। समस्या यह है कि मैं और मेरे पति उसकी परवरिश को लेकर बिल्कुल अलग सोच रखते हैं। मैं चाहती हूं कि वह अपनी गलतियों से सीखे, इसलिए उसे समझाकर बात करती हूं। वहीं मेरे पति मानते हैं कि बच्चों को टफ बनाना चाहिए, अनुशासन सिखाना चाहिए।

कई बार मैं किसी बात के लिए उसे ‘हां’ बोल देती हूं, लेकिन पति उसी बात के लिए मना कर देते हैं। बेटा अब समझ गया है कि किस चीज के लिए किसके पास जाना है। अगर मैं मना करती हूं तो वह पापा से पूछ लेता है। मुझे लगता है कि वह इस स्थिति का फायदा उठाने लगा है। क्या माता-पिता की अलग-अलग पेरेंटिंग स्टाइल बच्चे के व्यवहार और व्यक्तित्व पर असर डाल सकती है? हमें क्या करना चाहिए?

एक्सपर्ट- डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- हर माता-पिता अपने बच्चे के लिए अच्छा ही चाहते हैं, लेकिन ‘अच्छा’ क्या है, इसकी परिभाषा हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। कोई अनुशासन को प्राथमिकता देता है, तो कोई कम्युनिकेशन और आजादी को। इसलिए पेरेंटिंग को लेकर पति-पत्नी के बीच मतभेद होना कोई नई अजूबा बात नहीं है। लेकिन जब ये मतभेद रोजमर्रा के फैसलों में दिखाई देने लगे और बच्चा यह समझ जाए कि “मम्मी से नहीं तो पापा से ‘हां’ मिल जाएगी,” तब यह बच्चे के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

पेरेंटिंग में मतभेद का बच्चे पर असर

9 साल की उम्र तक बच्चे में यह समझ विकसित हो जाती है कि किस व्यक्ति से क्या रिस्पॉन्स मिलेगा। वह यह भी सीख जाता है कि किससे कौन-सी बात मनवाई जा सकती है। इसे कई बार लोग ‘चालाकी’ समझते हैं, जबकि चाइल्ड साइकोलॉजी के अनुसार यह अक्सर बच्चे का सीखा हुआ व्यवहार (लर्न्ड बिहेवियर) होता है। बच्चा वही तरीका अपनाता है, जिससे उसकी बात बनने की संभावना सबसे ज्यादा हो।

ऐसे में अगर पेरेंटिंग को लेकर माता–पिता के विचार एक न हों और ये बात बच्चे को समझ में आ जाए तो इसके ये मनोवैज्ञानिक प्रभाव हो सकते हैं-

क्या अलग सोच होना गलत है?

बिल्कुल नहीं। हर बात पर माता-पिता की राय एक होना जरूरी नहीं है। समस्या तब होती है, जब बच्चे के सामने एक ही स्थिति पर अलग-अलग नियम या प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं। इसे इन दो उदाहरणों से समझिए–

1. बच्चा मोबाइल चलाना चाहता है। आपसे परमिशन मांग रहा है।

  • मां कहती हैं, “आज आधा घंटा मोबाइल चला सकते हो।”
  • पिता कहते हैं, “नहीं, बिल्कुल नहीं चला सकते।”

2. बच्चा पॉकेट मनी मांग रहा है।

  • मां कहती हैं, “पहले ये बताओ कि पैसे किसलिए चाहिए। तुम्हारी सारी जरूरतें तो हम पूरी कर रहे हैं।”
  • पापा तुरंत पर्स में से निकालकर 100 रुपए पकड़ा देते हैं।

ऐसी स्थिति में बच्चा यह नहीं सीख पाता कि घर का नियम क्या है।

चाइल्ड साइकोलॉजी के अनुसार, बच्चे नियमों की सख्ती से ज्यादा उनकी कंसिस्टेंसी यानी एकरूपता को समझते हैं। जब हर बार एक जैसे नियम लागू होते हैं, तो बच्चों में सही-गलत की साफ समझ विकसित होती है।

बच्चा ‘पेरेंट शॉपिंग’ क्यों करता है?

कई बार बच्चा सिर्फ यह सीख रहा होता है कि उसकी जरूरत या मांग किस रास्ते से पूरी हो सकती है। इसलिए अगर एक व्यक्ति उसे मना करता है, तो वह स्वाभाविक रूप से दूसरे से पूछ सकता है।

चाइल्ड साइकोलॉजी में इसे ‘पेरेंट शॉपिंग’ कहते हैं। यह व्यवहार तब ज्यादा देखने को मिलता है, जब-

  • नियम पहले से तय न हों।
  • माता-पिता अलग-अलग फैसले लेते हों।
  • बच्चा दोनों की अलग-अलग राय देखता हो।
  • माता-पिता बच्चे के सामने एक-दूसरे के फैसले बदल देते हों।

यह जरूरी नहीं कि बच्चा गलत इरादे से ऐसा कर रहा हो। अक्सर यह इस बात का संकेत होता है कि उसे नियमों और सीमाओं को लेकर एक जैसा मैसेज नहीं मिल रहा है।

बच्चे के व्यक्तित्व पर क्या असर

अगर परिवार में लंबे समय तक यही स्थिति बनी रहे तो बच्चे पर ये प्रभाव पड़ सकते हैं।

  • बच्चा सीमाओं का सम्मान नहीं करता।

उसे लगता है कि हर नियम पर बातचीत करके उसे बदला जा सकता है।

  • जिम्मेदारी कम लेता है।

गलती होने पर वह यह देखने लगता है कि कौन उसका पक्ष लेगा।

  • सही-गलत को लेकर भ्रमित हो सकता है।

उसे समझ नहीं आता कि सही क्या है, क्योंकि दोनों सबसे महत्वपूर्ण लोग अलग बातें कह रहे हैं।

  • माता-पिता के रिश्ते भी प्रभावित होते हैं।

जब बच्चा दोनों के बीच संदेश पहुंचाने लगता है या एक की बात दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करता है, तो परिवार का भावनात्मक माहौल प्रभावित होने लगता है।

इस समस्या का समाधान क्या है?

सबसे पहले यह समझें कि यह ‘मां बनाम पिता’ की लड़ाई नहीं है। असल सवाल ये है कि-

‘’क्या बच्चा एक सुरक्षित, स्पष्ट और भरोसेमंद माहौल में बड़ा हो रहा है?”

अगर इसका जवाब ‘नहीं’ है तो बदलाव की जरूरत है। इसके लिए नीचे दिए गए 6 कदम उठाएं।

1. नियम पहले आपस में तय करें

रोजमर्रा की महत्वपूर्ण बातों पर माता-पिता पहले से चर्चा कर लें और एक साझा नियम तय करें। हर मुद्दे पर पूरी तरह सहमत होना जरूरी नहीं है, लेकिन बच्चे के सामने तय नियमों पर एक जैसी प्रतिक्रिया होनी चाहिए। इससे बच्चे को पता रहता है कि किस व्यवहार पर क्या अपेक्षा और क्या परिणाम होगा।

2. नियम बदलना हो तो मिलकर बदलें

अगर किसी नियम में बदलाव जरूरी लगे तो बाद में आपस में चर्चा करें। फिर दोनों मिलकर बच्चे को नया नियम बताएं। इससे बच्चे को स्पष्ट संदेश मिलेगा।

3. बच्चे के सामने एक-दूसरे का फैसला न काटें

अगर पति ने किसी बात के लिए मना किया है और लगता है कि फैसला सही नहीं है, तो बच्चे के सामने उसे तुरंत न बदलें। बच्चे से कहें-

“हम दोनों इस पर बात करेंगे और फिर तुम्हें बताएंगे।”

इससे बच्चे को संदेश मिलता है कि माता-पिता एक टीम की तरह फैसले लेते हैं।

4. सख्ती और प्यार में संतुलन रखें

कई माता-पिता मानते हैं कि सख्ती से ही बच्चा जिम्मेदार बनता है, जबकि कुछ का मानना है कि सिर्फ प्यार और समझाइश ही काफी है। लेकिन चाइल्ड साइकोलॉजी के अनुसार सबसे प्रभावी तरीका अथॉरिटेटिव पेरेंटिंग है, जिसमें स्नेह और अनुशासन दोनों का संतुलन होता है। इसमें-

  • प्यार भी होता है।
  • स्पष्ट नियम भी होते हैं।
  • बच्चे की बात भी सुनी जाती है।
  • गलती पर उचित परिणाम भी तय होते हैं।
  • यानी न जरूरत से ज्यादा सख्ती, न पूरी छूट।

5. ‘एक सख्त, एक नरम’ वाला पैटर्न न बनाएं

कई परिवारों में माता-पिता में से एक हमेशा डांटता है और दूसरा हमेशा बचाता है। इससे बच्चा दोनों की भूमिकाएं तय कर लेता है। ये तरीका सही नहीं है। इसकी बजाय–

  • दोनों पेरेंट बच्चे को भरपूर प्यार दें।
  • जरूरत पर दोनों सख्ती करें, दोनों नियम लागू करें।

6. बच्चे को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करें

9 साल का बच्चा कुछ नियम समझ सकता है और उस पर अपनी राय दे सकता है। इसलिए उससे पूछें कि-

  • इस नियम के बारे में तुम्हारी क्या राय है?
  • तुम बताओ कि इसे तोड़ने की क्या सजा होनी चाहिए?

जब बच्चा नियम बनाने में शामिल होता है, तो उनके पालन की संभावना भी बढ़ जाती है।

एक्सपर्ट हेल्प कब जरूरी?

इन स्थितियों में माता–पिता के लिए फैमिली काउंसलर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से सलाह लेना मददगार हो सकता है।

  • पेरेंटिंग से जुड़े फैसलों पर बार-बार टकराव हो रहा हो।
  • बच्चा लगातार बातें छिपाने या झूठ बोलने लगा हो।
  • स्कूल में व्यवहार से जुड़ी शिकायतें मिलने लगी हों।
  • बच्चा माता-पिता के मतभेदों का फायदा उठाने लगा हो।
  • घर का तनाव बच्चों पर असर डालने लगा हो।

याद रखें

बच्चे को ऐसे माता-पिता चाहिए, जो एक टीम की तरह काम करें। दोनों के व्यक्तित्व और सोच अलग हो सकते हैं, लेकिन बच्चे की परवरिश से जुड़े फैसलों में तालमेल जरूरी है। जब घर के नियम स्पष्ट, स्थिर और सम्मानजनक होते हैं, तो बच्चा भी धीरे-धीरे जिम्मेदार बनता है। यही स्वस्थ पेरेंटिंग की सबसे मजबूत नींव है।

************************ ग्राफिक्स- अजीत सिंह

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