भारत में 10 और 20 रुपए के प्लास्टिक नोट के फील्ड ट्रायल की मंजूरी मिल गई है। 3 हजार करोड़ रुपए कीमत के 200 करोड़ नोट जल्द लोगों की जेब में होंगे। ये बात 27 जुलाई को वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में बताई।
.
2012 में मनमोहन सरकार ने भी 10 रुपए के प्लास्टिक नोट के ट्रायल की मंजूरी दी थी, लेकिन यह कभी जमीन पर नहीं आ सके। 2016-17 में ये प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
प्लास्टिक नोट हैं क्या, पुराना प्रोजेक्ट क्यों अटक गया था और भारत में इन्हें फिर लाने की कोशिश क्यों हो रही; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सबसे पहले प्लास्टिक नोट की शुरुआत का रोचक किस्सा…
साल 1966, ऑस्ट्रेलिया ने पाउंड करेंसी छोड़कर ऑस्ट्रेलियाई डॉलर लॉन्च किया। इसमें उस दौर के सारे एडवांस सेफ्टी फीचर मौजूद थे। इसके बावजूद कुछ ही महीनों में मार्केट में 10 डॉलर के नकली नोटों की बाढ़ आ गई। कोई असली-नकली में फर्क नहीं कर पा रहा था।
इसके पीछे कोई बड़ा गिरोह नहीं, सिर्फ चार लोग थे- दुकानदार, आर्टिस्ट, फोटोग्राफर और एक टेलर। फोटोग्राफर ने असली नोट की फोटो खींची, आर्टिस्ट ने उसका वॉटरमार्क कॉपी किया और टेलर ने एक हफ्ते की प्रिंटिंग ट्रेनिंग ली। मेलबर्न शहर में दुकानदार के गैराज में नकली नोट छपने लगे। इस पूरे रैकेट को फंड कर रहा था रॉबर्ट किड नाम का एक क्रिमिनल।
एक रोज दुकानदार की भाभी अनजाने में घर में पड़ा 10 डॉलर का नोट उठाकर चॉकलेट खरीदने गईं। सेल्सगर्ल को नोट का टेक्सचर अजीब लगा। उसने फौरन पुलिस को बता दिया और यहीं से पूरा गिरोह बेनकाब हुआ। सरकार हैरान थी कि इतनी आसानी से नोट कॉपी किया जा सकता है।
1968 में रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया के गवर्नर डॉ. हर्बर्ट कूंब्स ने देश के टॉप साइंटिस्ट्स को ऐसा नोट बनाने की चुनौती दी, जिसकी नकल न की जा सके। करीब २० साल की रिसर्च के बाद वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक नोट तैयार किया, जिसकी कॉपी बनाना लगभग नामुमकिन था।
जनवरी 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया का पहला प्लास्टिक नोट लॉन्च किया और आगे चलकर यह तकनीक 25 से ज्यादा देशों को एक्सपोर्ट भी की।

10 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का यह नोट 1988 में लॉन्च हुआ पहला प्लास्टिक नोट है।
सवाल-1: प्लास्टिक नोट है क्या और बनते कैसे हैं?
जवाबः भारत में करेंसी नोट कागज से बनते हैं, लेकिन प्लास्टिक नोट एक खास और हाई क्वालिटी वाले प्लास्टिक से बनते हैं। ध्यान रहे, ये वो प्लास्टिक नहीं, जो घर के सामान में इस्तेमाल होता है।
हर प्लास्टिक प्रोडक्ट अलग तरह के पॉलिमर से बनता है और नोट के लिए एक खास पॉलिमर इस्तेमाल होता है। इसे बाय-एक्सिअली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन, यानी BOPP कहते हैं, जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से बनता है। ये आम प्लास्टिक से ज्यादा लचीला और मजबूत होता है। खिंचाव पड़ने पर इसका आकार नहीं बदलता।

सवाल-2: भारत में प्लास्टिक नोट लाने की कोशिश कब से हो रही?
जवाबः यह आइडिया 2009 में RBI ने दिया। 10 रुपए के 100 करोड़ नोट पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर छापने की योजना थी।
- 2012 में सरकार ने इसे मंजूरी दी। कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला में फील्ड ट्रायल होना था। ये शहर इसलिए चुने गए ताकि अलग-अलग जलवायु में नोट का टिकाऊपन जांच सके।
- मैसूर में एक बड़ी बैंक-नोट पेपर मिल भी लगाई, ताकि भारत इस मामले में आत्मनिर्भर बने
- ट्रायल की जिम्मेदारी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रन प्राइवेट लिमिटेड, यानी BRBNMPL और करेंसी छापने वाली संस्था SPMCIL की थी। 2015-16 की RBI रिपोर्ट में इसका जिक्र भी है, लेकिन इसके बाद काम अचानक रुक गया।
- अगले दो सालों की रिपोर्ट्स में प्रोजेक्ट का कहीं जिक्र नहीं मिलता। 2018-19 में RBI ने अपना रास्ता बदल लिया। पॉलिमर नोट की जगह 100 रुपए के ‘वार्निश्ड’ नोट का ट्रायल एजेंडे में डाला गया। यह एक कैमिकल होता है, जिसकी कोटिंग से नोटों की सुरक्षा और मजबूती बेहतर होती है।

रूस ने 2019 में 100 रुबेल के वर्निश्ड नोट पहली बार जारी किए थे।
प्लास्टिक नोट वाले प्रोजेक्ट के ठंडे बस्ते में जाने की कोई पुख्ता वजह नहीं मिलती। जानकार ३ वजहें बताते हैं- ATM पॉलिमर नोटों को ठीक से पहचान और डिस्पेंस नहीं कर पा रहे थे, नोट हैंडलिंग में दिक्तत आ रही थी और 2016 में हुई नोटबंदी।
17 साल बाद, 2026 में वही आइडिया लौटा है। इस बार बड़े स्केल पर। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि 10 रुपए के 100 करोड़ नोट और 20 रुपए के 100 करोड़ नोट लॉन्च होंगे। यानी कुल 3000 करोड़ वैल्यू के 200 करोड़ नोट। BRBNMPL ने प्लास्टिक नोट बनाने के लिए दुनिया भर की कंपनियों के प्रस्ताव भी मंगवाए हैं।
भारत की पेपर करेंसी में करीब 25% 10 और 20 के नोट ही है। हालांकि कीमत के मामले में यह सिर्फ 1.3% है।
सवाल-3: आखिर प्लास्टिक नोट के फायदे क्या हैं?
जवाबः RBI की 3 बड़ी मौजूदा चुनौतियों का समाधान प्लास्टिक नोट कर सकती है…
1. कागजी नोट से 6 गुना ज्यादा तक लाइफ
- पिछले 3 सालों में RBI ने 8,270 करोड़ नए नोट जारी किए हैं और 6,213 करोड़ पुराने नोट नष्ट किए हैं। कारण- कागज की करेंसी जल्दी खराब हो जाती है।
- प्लास्टिक नोट पानी, तेल, मिट्टी में गंदे नहीं होते। यह आसानी से फटते नहीं। कागज नोट की तुलना में यह 2 से 6 गुना ज्यादा चलते हैं।
- अगर यह फट भी जाए, तो रिसायकल करके फिर से प्लास्टिक के दानों में बदला जा सकता है, जिससे प्लास्टिक नोट बन जाएंगे।
2. छपाई की औसत लागत घटेगी
- पिछले 10 सालों में 26 हजार करोड़ नोट बनाने में RBI ने 52 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए हैं। हर साल औसतन 5200 करोड़ रुपए। साल-दर-साल नोटों का सर्कुलेशन 12% से बढ़ रहा है।
- प्लास्टिक नोट छापने की कीमत पेपर नोट से 30%-60% ज्यादा आ सकती है। लेकिन इसकी लाइफ का एवरेज निकालेंगे तो प्लास्टिक नोट बेहतर विकल्प है।
- ऑस्ट्रेलिय ने 1994-2019 के बीच 25 सालों में प्लास्टिक नोटों से 1 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर, यानी 6.6 हजार करोड़ रुपए बचाए हैं। ब्रिटेन का अनुमान है कि अगले 10 सालों 100 मिलियन पाउंड, यानी 1.2 हजार करोड़ रुपए बचेंगे।

ब्रिटेन में 2016 में प्लास्टिक नोटों की शुरुआत हुई। 2022 तक पूरी तरह से पेपर नोट रिप्लेस हुए।
3. नकली नोटों पर लगाम लगेगी
- भारत में 2024-25 में 2 लाख 17 हजार से ज्यादा नकली नोट पकड़े गए थे। 2025-26 में 2 लाख 30 हजार।
- प्लास्टिक बैंक नोट को छापने की तकनीक और ज्यादा निवेश के चलते इसे कॉपी करना आसान नहीं है।
- नोट छापने वाली ब्रिटिश कंपनी डे ला रुए के मुताबिक, ‘जिन देशों ने प्लास्टिक नोट अपनाए हैं, वहां नकली नोट की सप्लाई घटी है।’
सवाल-4: प्लास्टिक नोट का क्या कोई नुकसान भी है?
जवाबः सीधे तौर पर कोई बड़ा नुकसान तो नहीं है, लेकिन 3 चुनौतियां जरूर हैं… 1. शुरुआती लागत ज्यादा
- प्लास्टिक नोट बनाने का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए काफी निवेश करना पड़ेगा। ऑस्ट्रेलिया की CCL सेक्योर और ब्रिटेन की डी ला रू जैसी कुछ चुनिंदा कंपनियां ही दुनिया में पॉलिमर प्लास्टिक नोट बनाती है। इनसे करार करना होगा।
- नोट बनाने की तकनीक और सामान भी विदेशों से इम्पोर्ट होगा। हालांकि भारत दुनिया में BOPP का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया को यह सिस्टम शुरू करने में दो दशक लगे थे। आज अगर भारत अपने दम पर प्लास्टिक नोट छापने की सोचता है, तो रिसर्च एंड डेवलपमेंट में लंबा समय लगेगा।
- BOPP पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से बनता है, जो भारत आयात करता है। बीते दिनों मिडिल ईस्ट में संघर्ष के चलते दुनिया भर में तेल का संकट पैदा हुआ था। भविष्य में फिर ऐसा होता है तो प्लास्टिक नोट बनाने की कॉस्ट और बढ़ सकती है।
2. मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर बदलना पड़ेगा
- भारत की एटीएम मशीनें अभी प्लास्टिक नोटों के लिए तैयार नहीं है। देश के सभी एटीएम प्लास्टिक नोट कम्पैटिबल बनाने में समय और संसाधन लगेंगे।
- ब्रिटेन ने 2016 में पहला प्लास्टिक नोट जारी कर दिया था। कैश वेंडिंग मशीनों का इंफ्रास्ट्रक्चर और कैश काउंटिंग मशीनों को बदलने में उसे 340 मिलियन पाउंड, यानी करीब 4.3 हजार करोड़ रुपए लगे।
3. प्लास्टिक नोट भी नकली बनाए जा रहे
- जिन देशों में प्लास्टिक नोट शुरु हुए, वहां नकली नोटों का सर्कुलेशन पूरी तरह बंद नहीं हुआ।
- नकली नोट बनाने वाले 3D प्रिटिंग टकनीक और AI की मदद से नोट के सभी सुरक्षा फीचर कॉपी कर लेते हैं। ट्रासपेरेंट विंडों की जगह सामान्य प्लास्टिक की शीट लगा देते हैं। रात में या भीड़-भाड़ वाली जगह में लोग इन नोटों से चकमा खा जाते हैं।
- रोमानिया की एक गैंग ने प्लास्टिक नोट बनाने की तकनीक 2014 में ही कॉपी कर ली थी। उन्होंने 100 लू (इंडोनेशिया की करेंसी) के इतने नोट बनाए कि इन्हें ‘सुपर लू’ नाम दिया गया।
- मेक्सिको में 50 पेसो के नकली पॉलिमर नोट पकड़े गए थे। जांच में पता चला कि चीन से इम्पोर्ट की गई पतली प्लास्टिक शीट्स पर प्रिंटिंग की गई।

ऑस्ट्रेलिया में इस तरह के नकली नोट सर्कुलेट हुए हैं। ज्यादातर नकली नोटों के नीचे PROPS लिखा था।
सवाल-5: क्या भारत में सभी नोट प्लास्टिक के हो जाएंगे, आगे क्या?
जवाबः अभी सिर्फ 10 और 20 रुपए के 200 करोड़ नोट का फील्ड ट्रायल होना है। RBI ने पेपर नोट बंद कर प्लास्टिक पर शिफ्ट होने का कोई फैसला नहीं किया।
हां, अगर ट्रायल सफल रहता है, तो आगे चलकर ₹50, ₹100, ₹200 और ₹500 के नोट भी प्लास्टिक में आ सकते हैं। लेकिन अभी ऐसी कोई घोषणा नहीं हुई है।
पूरी तरह प्लास्टिक नोटों पर शिफ्ट होना कोई एक-दो साल का काम नहीं। ऑस्ट्रेलिया को भी अपनी पूरी करेंसी प्लास्टिक में बदलने में करीब 8 साल लगे थे।
आज दुनिया के कुल कैश में सिर्फ 3% हिस्सा ही प्लास्टिक नोटों का है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, रोमानिया, कनाडा, वियतनाम और मालदीव जैसे गिने-चुने करीब 12 देश ही पूरी तरह प्लास्टिक करेंसी पर गए हैं, और उन्हें भी इसमें 5 से 8 साल का वक्त लगा।
————-
ये खबर भी पढ़िए…
गुलाबी पेट्रोल, टैंक में चींटी के वीडियो वायरल; सरकार पेट्रोल में जबरन एथेनॉल मिलाने पर क्यों तुली है, पीछे की पूरी कहानी

कहीं गुलाबी रंग का पेट्रोल, कहीं टैंक से चिपकी चीटियां, कहीं पेट्रोल के साथ दिखता पानी। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियोज वायरल हैं और सभी के साथ एक ही नाम जुड़ा है- एथेनॉल। इन वीडियोज की असलियत संदिग्ध हो सकती है, लेकिन देश में एथेनॉल पर बहस बिल्कुल असली है। पूरी खबर पढ़िए…
