पीएम मोदी 6 जुलाई की सुबह नई दिल्ली से इंडोनेशिया के लिए निकले थे। फिर ऑस्ट्रेलिया होते हुए न्यूजीलैंड पहुंचे। वे 6 दिनों में 3 देशों का दौरा करके 12 जुलाई की सुबह दिल्ली लौट आए।
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करीब 144 घंटे के इस मैराथन दौरे से क्या-क्या लेकर लौटे पीएम मोदी और भारत के लिए उसके मायने क्या हैं; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…

पहला पड़ाव था- इंडोनेशिया का जकार्ता। ये पीएम मोदी की चौथी इंडोनेशियाई यात्रा थी। उन्होंने राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो से मुलाकात की। दो दिन के टूर में उन्होंने इंडोनेशियाई संसद में भाषण दिया। दोनों देशों के बीच 14 समझौतों पर साइन हुए। इनमें 2 डील सबसे अहम हैं-
1. सबांग पोर्ट डील भारत और इंडोनेशिया मिलकर सुमात्रा के उत्तर में सबांग पोर्ट डेवलप करेंगे। इंडोनेशिया ने मई 2018 में ही भारत को इसका न्योता दिया था। तब पीएम मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान इसके लिए ज्वॉइंट टास्क फोर्स बनाने का फैसला हुआ था। 2023 तक प्रोजेक्ट को लेकर एक स्टडी भी हुई।
अब समझौते पर साइन होने से काम आगे बढ़ पाएगा। सबांग समुद्र में गहरे पानी वाला पोर्ट है। ये 50 हजार टन के जहाजों, पनडुब्बियों और युद्धपोतों को भी संभाल सकता है।
पोर्ट में भारत कितना इन्वेस्टमेंट करेगा और ये कब तक पूरा होगा, अभी ये जानकारी सामने नहीं आई है। दोनों देशों ने अंडमान-निकोबार और इंडोनेशिया के आचे व सुमात्रा द्वीपों के बाकी हिस्सों के बीच कनेक्टिविटी बेहतर करने पर भी सहमति जताई है।
भारत के लिए डील के मायने
- भारत ग्रेट निकोबार द्वीप पर जहाजों के लिए ट्रांसशिपमेंट हब बना रहा है। सबांग इससे महज 160 किमी दूर है। ये मलक्का स्ट्रेट के उत्तरी किनारे पर है, जो कि दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक है। मलक्का से चीन का करीब 70% तेल और बाकी समुद्री व्यापार होता है।
- मलक्का पर निर्भरता दशकों से चीन की बड़ी चिंता रही है। इसे चीनी स्ट्रैटेजिस्ट ‘मलक्का डाइलेमा’ कहते हैं। इसी की काट के लिए चीनी नेवी हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में कंट्रोल बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
- ग्रेट निकोबार पोर्ट और सबांग पोर्ट शुरू होने से मलक्का के दोनों तरफ भारत की मौजूदगी होगी। इससे हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी के मुकाबले भारत को एक स्ट्रैटजिक बैलेंस मिल जाएगा।
- चीन, जापान और दक्षिण कोरिया ने इंडोनेशिया में बड़े पैमाने पर निवेश किए हैं। चूंकि चीन, इंडोनेशिया का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर भी है, इसलिए इंडोनेशिया सबांग पोर्ट को चीन-विरोधी गठबंधन के सैन्य अड्डे के बतौर श करना नहीं चाहेगा, लेकिन पोर्ट डेवेलप होने से भारत की मौजूदगी जरूर बढ़ेगी।

समझौतों पर साइन करते हुए पीएम मोदी, साथ में राष्ट्रपति प्रबोवो हैं।
2. ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की सप्लाई DRDO के तहत आने वाले ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय के बीच ये एग्रीमेंट हुआ है। इसके तहत भारत इंडोनेशिया को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम देगा।
इंडोनेशिया ने पहले 10 करोड़ डॉलर में ब्रह्मोस की 12 मिसाइल्स की एक बैटरी लेने का प्रपोजल दिया था। अब इसे दोगुना कर दिया गया है। अनुमान हैं कि पूरी डील करीब 63 करोड़ डॉलर की हो सकती है। इसमें मिसाइल सिस्टम के अलावा ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी शामिल है।
इस पैकेज में सरफेस-टू-सरफेस और एयर-लॉन्च्ड, यानी मिसाइल के दोनों सुपरसोनिक वैरिएंट शामिल हैं, जिनकी रेंज 300 किलोमीटर है। ब्रह्मोस भारत के सुखोई-30 MKI जैसे लड़ाकू विमानों पर तैनात है। इंडोनेशिया भी अपने सुखोई-30 बेड़े में इसे इंटीग्रेट करेगा।
इस डील के साथ फिलीपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया ब्रह्मोस खरीदने वाला तीसरा देश बन जाएगा।
भारत डायनेमिक्स लिमिटेड, BDL और इंडोनेशियाई कंपनी ‘रिपब्लिकॉर्प’ के बीच भारत की एस्ट्रा Mk-1 एयर-टू-एयर मिसाइल को लेकर भी समझौता हुआ है।

भारत UAE को भी ब्रह्मोस मिसाइल बेचने को लेकर बात कर रहा है।
भारत के लिए डील के मायने
- ब्रह्मोस के जरिए भारत अपने स्वदेशी हथियारों का एक्सपोर्ट बढ़ाना चाह रहा है। ब्रह्मोस का एक्सपोर्ट बढ़ा, तो प्रोडक्शन भी बढ़ेगा और इसकी लागत कम होगी।
- कूटनीतिक रूप से भी ये समझौता अहम है। दक्षिण चीन सागर में 90% समुद्री इलाके पर चीन का कब्जा है। इसे लेकर चीन का मलेशिया, ताइवान, फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया से विवाद है।
- ये देश इसे अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सीमा का उल्लंघन मानते हैं।
- ऐसे में दक्षिण चीन सागर में इंडोनेशिया जैसे देशों को ब्रह्मोस देना भारत के लिए चीन को काउंटर करने की रणनीति के लिहाज से अहम है।
बाकी अहम डील
- दोनों देशों में बैटरी, EV और सेमीकंडक्टर वगैरह में इस्तेमाल होने वाले क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर भी समझौता हुआ है। निकिल और रेयर अर्थ मेटल्स की सप्लाई चेन भी मजबूत की जाएगी।
- स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) और इंडोनेशिया की ‘क्राकाताउ स्टील’ मिलकर इंडोनेशिया में स्टेनलेस स्टील स्लैब बनाएंगी।
- भारत का UPI इंडोनेशिया के पेमेंट सिस्टम से जुड़ेगा। भारत अब तक 23 देशों के साथ ये समझौता कर चुका है।
- इंडोनेशिया में IIM बेंगलुरु का कैंपस भी खुलेगा।

पीएम मोदी का दूसरा पड़ाव था- ऑस्ट्रेलिया का मेलबर्न। वे यहां 8 और 9 जुलाई को रहे। पीएम मोदी और ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बानीज के बीच तीसरी सालाना भारत-ऑस्ट्रेलिया समिट हुई। दोनों देशों के बीच 18 समझौते और घोषणाएं हुईं। इनमें दो डील सबसे अहम हैं-
1. यूरेनियम सप्लाई डील भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच 2014 में ‘सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट’ हुआ था। इसके तहत ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम की सप्लाई होनी थी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने सप्लाई बेहद सीमित रखी। उसको चिंता थी कि यूरेनियम का इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में हो सकता है।
अब दोनों देशों ने उसी एग्रीमेंट को अमल में लाने के लिए ‘एडमिनिस्ट्रेटिव अरेंजमेंट’ पर साइन किए हैं। यानी अब ऑस्ट्रेलिया भारत को जरूरत भर का यूरेनियम एक्सपोर्ट करेगा।
संयुक्त बयान में कहा गया है कि ये सप्लाई सिर्फ यूरेनियम के शांतिपूर्ण इस्तेमाल, यानी बिजली वगैरह बनाने के लिए होगी। सप्लाई की निगरानी इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी, यानी IAEA करेगी।
ऑस्ट्रेलिया किस कीमत पर और कितना यूरेनियम देगा, सप्लाई कब होगी, अभी ये डिटेल्स सामने नहीं आए हैं।

पीएम मोदी ‘ऑस्ट्रेलिया-भारत CEO फोरम’ में भी शामिल हुए।
भारत के लिए डील के मायने
- झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान, मेघालय और कर्नाटक में यूरेनियम के कुछ भंडार हैं, लेकिन इसके खनन में तकनीकी और पर्यावरण से जुड़ी दिक्कतें हैं।
- इसलिए भारत कजाखस्तान, कनाडा और नामीबिया वगैरह से यूरेनियम इम्पोर्ट करता है। वहीं ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का करीब 28% यूरेनियम है।
- भारत का लक्ष्य 2047 तक 100 गीगावाट (GW) तक न्यूक्लियर एनर्जी की क्षमता हासिल करना है। अभी भारत में टोटल परमाणु ऊर्जा क्षमता 8.78 GW है। देश के कुल बिजली उत्पादन में न्यूक्लियर सोर्सेज की हिस्सेदारी सिर्फ 3.1% है।
- ऐसे में ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की सप्लाई भारत के लिए एक भरोसेमंद और बड़ा सोर्स खुलने जैसा है। भारत के लिए कोयले पर निर्भरता घटाने और क्लीन एनर्जी का सोर्स बढ़ाने के लिहाज से अहम है।
- यूरेनियम को लेकर इस साल भारत की ये दूसरी बड़ी डील है। इससे पहले कनाडा से भी ऐसी डील हुई है।
2. क्रिटिकल मिनरल्स प्रोडक्शन भारत और ऑस्ट्रेलिया ने लीथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स की सप्लाई चेन मजबूत करने के लिए समझौता किया है। इसे ‘क्रिटिकल मिनरल्स पार्टनरशिप’ कहा जा रहा है।
इसके तहत सरकारी एजेंसियों और प्राइवेट कंपनियों के बीच लॉन्ग-टर्म ऑफटेक, रिफाइनिंग और वैल्यू-एडिशन के लिए निवेश की व्यवस्था तय हुई है। यानी दोनों देशों की कंपनियां मिलकर मिनरल्स की सप्लाई में लंबे समय के लिए इन्वेस्टमेंट करेंगी।
कच्चे माल की खरीद के अलावा प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग भी मिलकर होगी।
भारत के लिए डील के मायने
- क्रिटिकल मिनरल्स का इस्तेमाल बैटरी, इलेक्ट्रिक गाड़ियों के मोटर, मोबाइल फोन से लेकर जेट इंजन तक बनाने में होता है। सेमीकंडक्टर और EVs की बैटरी में लीथियम और कोबाल्ट की जरूरत होती है।
- वहीं भारत अपनी जरूरत का 100% लीथियम, कोबाल्ट और निकिल विदेशों से खरीदता है। जम्मू-कश्मीर में 59 लाख टन का लीथियम रिजर्व मिला है, लेकिन इसकी माइनिंग शुरू नहीं हो पाई है।
- भारत ने 2025 में करीब 10 हजार करोड़ रुपए का 18,200 टन लीथियम इम्पोर्ट किया था। इसमें से करीब 68% चीन, 24% चिली और बाकी अन्य देशों से आया। भारत कोबाल्ट के कम्पाउंड भी फिनलैंड, जर्मनी और चीन जैसे देशों से मंगवाता है।
- इन क्रिटिकल मेटल्स को रिफाइन करके इन्हें बैटरी में इस्तेमाल लायक बनाने में चीन सबसे आगे है। दुनिया का करीब 74% लिथियम, 35% निकिल और 80% कोबाल्ट चीन में रिफाइन होता है। बैटरी बनाने में इस्तेमाल होने वाले LFP कैथोड मटीरियल का तो 98% प्रोडक्शन अकेले चीन में होता है। इसीलिए भारत का EV और बैटरी सेक्टर एक तरह से चीन पर निर्भर है।
- 2030 तक भारत में क्रिटिकल मिनरल्स की मांग दोगुनी होने का अनुमान है। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया से इनकी सीधी सप्लाई और रिफाइनिंग से भारत को चीन पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

करीब 30 खनिज और तत्व जैसे- लीथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट, गैलियम और डिस्प्रोसियम जैसे रेयर अर्थ एलिमेंट्स को ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ माना जाता है।
बाकी अहम डील
- डिफेंस सेक्टर में एक जॉइंट डिक्लेरेशन पर साइन हुए हैं। अब हर साल रक्षा मंत्री स्तर की बातचीत होगी।
- ‘डिफेंस इनोवेशन कॉरिडोर’ के जरिए दोनों देशों के डिफेंस स्टार्टअप्स और इंडस्ट्रीज एक साथ काम कर सकेंगी।
- व्यापार बढ़ाने के लिए CECA यानी ‘कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक कोऑपरेशन एग्रीमेंट’ पर जल्द बातचीत पूरी की जाएगी।
- साइबर, क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन से जुड़ी ‘PACTS’ पार्टनरशिप को लागू करने पर सहमति बनी।
- ऑस्ट्रेलिया के कोकोस कीलिंग आइलैंड्स (हिंद महासागर में) पर एक अस्थायी स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल बनेगा। इससे भारत के गगनयान जैसे स्पेस मिशनों की ट्रैकिंग क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
- इंडो-पैसिफिक रीजन में सहयोग बढ़ाने के लिए ‘मैरिटाइम सिक्योरिटी कोलैबोरेशन रोडमैप’ तय किया गया है।

पीएम मोदी का आखिरी पड़ाव था- न्यूजीलैंड का ऑकलैंड। वे 10 और 11 जुलाई को यहां रहे। ये पिछले 40 सालों में किसी भारतीय पीएम की पहली न्यूजीलैंड यात्रा थी। इससे पहले 1986 में तब के पीएम राजीव गांधी न्यूजीलैंड गए थे। पीएम मोदी और न्यूजीलैंड के पीएम क्रिस्टोफर लक्सन के बीच बातचीत हुई। इसके बाद 10 समझौते और 8 इनिशिएटिव की घोषणा हुई। इनमें 2 चीजें सबसे अहम थीं-
1. फ्री ट्रेड एग्रीमेंट और रोडमैप टू 2030 मार्च 2025 में भारत और न्यूजीलैंड के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर बातचीत शुरू हुई और दिसंबर 2025 में पूरी हुई। 27 अप्रैल 2026 को इस पर औपचारिक साइन हुए। यानी ये डील मोदी की मौजूदा यात्रा से पहले ही हो चुकी थी।
अब इस यात्रा में इसे ‘स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप’ के लेवल पर अपग्रेड किया गया। यानी तय हुआ कि FTA जल्द ही लागू करने ट्रेड बढ़ाया जाएगा। साथ ही ‘इंडिया-न्यूजीलैंड रोडमैप टू 2030’ नाम का एक दस्तावेज जारी किया गया।
इसके तहत दोनों देश ट्रेड, डिफेंस, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद, खेती, एजुकेशन और टेक्नोलॉजी के सेक्टर में पार्टनरशिप बढ़ाएंगे। 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार दोगुना करके करीब 7 बिलियन न्यूजीलैंड डॉलर, यानी 35 हजार करोड़ रुपए तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
FTA के तहत भारत न्यूजीलैंड को केमिकल्स, प्रोसेसिंग फूड, एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स वगैरह की सप्लाई करेगा। इस सामान पर जीरो टैरिफ लगेगा। वही न्यूजीलैंड से कीवी सहित दूसरे फल, लकड़ी और क्रिटिकल्स मिनरल्स वगैरह आएंगे। एग्रीमेंट के तहत पहले दिन से ही न्यूजीलैंड के 57 % सामान पर जीरो टैरिफ लागू हो जाएगा।
इस पर भी सहमति बनी है कि न्यूजीलैंड भारत में अगले 15 सालों में 20 अरब डॉलर, यानी करीब 1.72 लाख करोड़ रुपए का निवेश करेगा।

ऑकलैंड में भारतीयों को संबोधित करते हुए पीएम ने एक मफलर दिखाया और कहा- ’25-30 साल पहले मुझे यहां आने का मौका मिला था। तब गिफ्ट में मिले इस मफलर को मैंने कई बार इस्तेमाल किया और आज भी संभाल कर रखा है।
भारत के लिए डील के मायने
- न्यूजीलैंड भारत के लिए अभी एक छोटा ट्रेड पार्टनर है। भारत जिन देशों को सबसे ज्यादा सामान एक्सपोर्ट करता है, उनमें न्यूजीलैंड 80वें नंबर पर है, जबकि भारत जिन देशों से सामान इम्पोर्ट करता है, उनमें 74वें नंबर पर है। इसका मतलब है कि दोनों देशों में ट्रेड बढ़ाने की काफी गुंजाइश है।
- 2022 से 2026 के बीच 4 सालों में दोनों देशों के बीच समुद्री व्यापार 8% बढ़कर करीब 1.15 अरब डॉलर तक पहुंचा है।
- हालांकि इन चार सालों में भारत का ट्रेड सरप्लस घटा है और इस साल 2.3 करोड़ डॉलर का घाटा हुआ है। FTA के जरिए ये असंतुलन बेहतर हो सकता है।
2. डिफेंस और मैरिटाइम पार्टनरशिप दोनों देशों ने डिफेंस में आपसी साझेदारी, लॉजिस्टिक सपोर्ट और जॉइंट नेवी एक्सरसाइज बढ़ाने पर सहमति जताई है। इसका मतलब है कि दोनों देशों की नेवी एक-दूसरे के पोर्ट और मैरीटाइम फैसिलिटीज का इस्तेमाल कर सकेंगे।
भारत के लिए डील के मायने
- न्यूजीलैंड, दक्षिण प्रशांत महासागर में बसा द्वीपीय देश है और इंडो-पेसिफिक रीजन में भारत के लिए स्ट्रैटजिक नजरिए से अहम है। यहां भी चीन अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार बढ़ा रहा है।
बाकी अहम डील
- दोनों देशों ने काउंटर-टेररिज्म पर एक ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप बनाने का फैसला किया है।
- ड्रग्स की तस्करी, साइबर फ्रॉड वगैरह से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी।
- नागालैंड और उत्तराखंड में ‘एग्रीकल्चर सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस’ बनाने की घोषणा हुई।
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