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- Rajdeep Sardesai Column | Maharashtra FDA Commissioner Tukaram Mundhe Singham
19 मिनट पहले
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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार
मात्र 100 दिनों में महाराष्ट्र एफडीए (फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) के आयुक्त तुकाराम मुंढे ने उससे पहले के 18 महीनों की तुलना में खानपान के मामलों में मिलावट के ज्यादा मामले उजागर किए हैं। गणेश चतुर्थी से पहले भी मुंढे की छापेमारी जारी रही, जबकि यह महाराष्ट्र में सबसे व्यापक रूप से मनाए जाने वाले त्योहारों में से है। उन्हें अब ‘सिंघम’ कहा जाने लगा है- उस ब्लॉकबस्टर फिल्म के सुपरकॉप की तर्ज पर, जो राजनीतिक भ्रष्टाचार से लोहा लेता है।
मिलावटी भोजन के खिलाफ उनकी कार्रवाई पर हुई प्रतिक्रिया बहुत कुछ उजागर करती है। जिन कारोबारों को ढीले-ढाले रेगुलेशंस की आदत पड़ चुकी है, उन्हें अब लाइसेंस खोने का डर है। दूसरी ओर, आम नागरिकों में उम्मीद है और शायद राहत भी। यह कि आखिरकार कोई तो वह सवाल पूछता हुआ दिखाई दे रहा है, जो सरकार को बहुत पहले पूछना चाहिए था यह कि : आखिर आप हमें खिला क्या रहे हैं?
हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जब बाहर खाना रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। हम बिना सोचे ऑनलाइन खाना यह मानकर ऑर्डर कर देते हैं कि कहीं न कहीं कोई यह जांच जरूर कर रहा होगा कि हम जो खा-पी रहे हैं, वह सुरक्षित है या नहीं।
लेकिन हर वह छापा- जिसमें गंदे और अस्वच्छ किचन, मिलावटी सामग्री या खाद्य सुरक्षा मानकों का खुलेआम उल्लंघन सामने आता है- इस धारणा को चकनाचूर कर देता है। समस्या यह नहीं है कि कानून मौजूद नहीं हैं। समस्या यह है कि उन्हें लागू नहीं किया जाता।
लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल सामने आता है : अपना काम करने वाले किसी अधिकारी को सुपरहीरो क्यों समझा जाना चाहिए? मुंढे के पास कोई सुपरपावर नहीं है। उन्हें बैकग्राउंड म्यूजिक या फिल्मी डायलॉग की भी जरूरत नहीं है। फिर भी ‘सिंघम’ का तमगा उनसे चिपक गया है, क्योंकि नागरिक यह देखने के आदी हो चुके हैं कि ताकतवर लोग व्यवस्था से बच निकलने के रास्ते हमेशा तलाश लेते हैं।
मुंढे अपने पूरे कॅरिअर में ऐसे अधिकारी के रूप में जाने जाते रहे हैं, जो जमे-जमाए हितों को चुनौती देने से नहीं हिचकते और आसानी से समझौता करने को तैयार नहीं होते। 21 वर्षों में उनके 25 तबादले हो चुके हैं। लेकिन ऐन इसी बिंदु पर एक अधिकारी की कहानी भारतीय नौकरशाही की कहानी बन जाती है।
भारत में बुद्धिमान या ईमानदार सिविल सेवकों की कमी नहीं है। हर साल देश के कुछ सबसे प्रतिभाशाली युवा सिविल सेवाओं में आते हैं। कमी उस संस्थागत माहौल में है, जो उन्हें स्वतंत्र होकर काम करने की गुंजाइश नहीं देता।
एक अधिकारी कठिन पोस्टिंग झेल सकता है। लेकिन ऐसी व्यवस्था में टिके रहना मुश्किल है, जहां हर महत्वपूर्ण फैसले से पहले कई तरह के हिसाब लगाने पड़ते हैं। कौन नाराज होगा? क्या कोई राजनेता इसकी शिकायत करेगा? क्या कोई ताकतवर कारोबारी फोन लगाएगा? क्या कोई धार्मिक समूह विरोध करेगा? क्या कोई प्रभावशाली लॉबी अपने संपर्कों का इस्तेमाल करेगी? और क्या काम पूरा होने से पहले ही तबादले का आदेश आ जाएगा?
इसी तरह धीरे-धीरे संस्थाओं की रीढ़ कमजोर पड़ती जाती है। इसलिए नहीं कि हर नौकरशाह भ्रष्ट है। बल्कि इसलिए कि सिस्टम में गड़बड़ है। शायद मुंढे की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं है कि उन्हें ‘सिंघम’ कहा जा रहा है। महत्वपूर्ण यह है कि हम नागरिक मानो ऐसे किसी व्यक्ति के लिए बेताब हैं।
खाद्य सुरक्षा इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि तुकाराम मुंढे एफडीए के प्रमुख हैं। किसी अधिकारी के छापे शुरू कर देने से रेस्तरां अचानक स्वच्छ नहीं हो जाने चाहिए। मिलावटखोरों को सिर्फ तब नहीं डरना चाहिए, जब कोई सख्त आयुक्त पद पर हो। मुंढे के चले जाने के बाद भी व्यवस्था को काम करना चाहिए।
पुनश्च : पिछले हफ्ते मैंने महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ मंत्री से पूछा : “आप मुंढे के बारे में क्या सोचते हैं?’ उनकी तरफ से तीखा जवाब आया, “ओह, वह तो पागल आदमी है!’ लेकिन शायद हमें ऐसे और सरकारी कर्मचारियों की जरूरत है, जिनमें थोड़ा-सा ‘पागलपन’ हो, जिनकी जिम्मेदारी नागरिकों के प्रति हो, न कि अपने राजनीतिक आकाओं के प्रति।
मुंढे के पास कोई सुपरपावर नहीं है। उन्हें बैकग्राउंड म्यूजिक या फिल्मी डायलॉग की जरूरत नहीं है। फिर भी ‘सिंघम’ का तमगा उनसे चिपक गया है, क्योंकि नागरिक यह देखने के आदी हो चुके हैं कि ताकतवर लोग व्यवस्था से बच निकलने के रास्ते हमेशा तलाश लेते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

