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- Vijay Shankar Mehta Column | Learn Friendship Lessons From Krishna Arjun
34 मिनट पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
दोस्त कभी ज्यादा होते ही नहीं हैं। जो थोड़े-बहुत होते भी हैं, वे दो प्रकार के हैं- अंतरंग और बहिरंग। मित्रता में समानता, संयम, संस्कृति बहुत जरूरी हैं। अगर आपको मित्र बनाने में रुचि है और मित्रता के मामले में अकेलापन महसूस हो रहा हो तो यह प्रयोग करिए।
अपने रिश्तों में से मित्रता निकालिए। तब जो भी मित्र मिलेंगे, कम से कम देखे-परखे होंगे। यह प्रयोग अर्जुन और कृष्ण ने किया था। यह दोनों साले-बहनोई थे और इन्होंने इस रिश्तेदारी को मित्रता में बदला। इनकी दोस्ती इतनी प्यारी थी कि कई अवसरों पर अर्जुन ने कृष्ण को गुरु ही कह दिया।
और ठीक भी बात है, मित्र कब गुरु की भूमिका में आ जाए, कह नहीं सकते। सच्चा मित्र होता भी वही है, जो अवसर आने पर शिष्य भी बन जाए और अपने आप को गुरु भी बना ले। मित्र ताश के पत्ते की तरह नहीं होते कि बाजी फेंको या उठाओ। मित्र तो एक ग्रंथ के पन्नों की तरह होते हैं। ग्रंथ बंद कर लो तो भी काम के और खोल के पृष्ठ में से कोई अच्छा विचार निकालो तो भी उपयोगी।

