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उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। पश्चिमी यूपी में इसका असर सहारनपुर में लगातार दूसरे दिन दिखाई देगा। एक दिन पहले सपा मुखिया अखिलेश यादव ने सहारनपुर पहुंचकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा और विपक्षी एकजुटता का संदेश दिया। अब गुरुवार को राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया एवं केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी रामपुर मनिहारान पहुंचेंगे। वह गोचर महाविद्यालय में आयोजित ‘स्वाभिमान रैली’ को संबोधित करेंगे। रालोद इस रैली के जरिए पश्चिमी यूपी में अपनी राजनीतिक ताकत और संगठन की सक्रियता का प्रदर्शन करने की तैयारी में है। राजनीतिक नजरिए से देखें तो अखिलेश यादव के दौरे के ठीक अगले दिन जयंत चौधरी का सहारनपुर पहुंचना महत्वपूर्ण है। दोनों नेताओं की सियासी दिशा फिलहाल अलग है। सपा जहां भाजपा के खिलाफ विपक्षी माहौल बनाने में जुटी है, वहीं रालोद भाजपा के साथ गठबंधन का हिस्सा है। ऐसे में जयंत की रैली को भाजपा के जवाब से ज्यादा रालोद की अपनी राजनीतिक जमीन और भविष्य की सौदेबाजी की ताकत मजबूत करने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। ‘स्वाभिमान’ के जरिए पुराने आधार को साधने की कोशिश रालोद की राजनीति का पारंपरिक आधार पश्चिमी यूपी के किसान और जाट मतदाता रहे हैं। मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, मेरठ, बिजनौर और सहारनपुर समेत पश्चिमी यूपी की राजनीति में किसान मुद्दे लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। ‘स्वाभिमान रैली’ के नाम के जरिए भी रालोद क्षेत्रीय सम्मान, किसान और ग्रामीण सरोकारों को राजनीतिक संदेश में बदलने की कोशिश कर सकती है। लेकिन जयंत के सामने चुनौती केवल अपना पुराना वोट बैंक बचाने की नहीं, बल्कि उसे विस्तार देने की भी है। 2027 में रालोद यदि पश्चिमी यूपी में ज्यादा सीटों और प्रभाव की दावेदारी करना चाहती है तो उसे जाट-किसान आधार के साथ गैर-जाट, पिछड़े, युवा और दूसरे सामाजिक वर्गों तक भी अपनी पहुंच बढ़ानी होगी। भाजपा गठबंधन में रहते हुए अपनी पहचान की परीक्षा रालोद फिलहाल भाजपा के साथ सत्ता में है और जयंत चौधरी केंद्र में मंत्री हैं। ऐसे में उनके सामने दोहरी राजनीतिक चुनौती है। एक तरफ गठबंधन के प्रति अपनी भूमिका निभानी है, दूसरी तरफ पश्चिमी यूपी में रालोद को केवल भाजपा की सहयोगी पार्टी की छवि से बाहर निकालकर स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करना है। यही वजह है कि रामपुर मनिहारान की रैली का महत्व केवल भीड़ जुटाने तक सीमित नहीं रहेगा। जयंत अपने भाषण में जिन मुद्दों को उठाते हैं, उनसे यह संकेत मिल सकता है कि 2027 को लेकर रालोद पश्चिमी यूपी में किन मुद्दों और सामाजिक समूहों को प्राथमिकता देने जा रही है। अखिलेश के ‘पीडीए’ के सामने जयंत का सामाजिक आधार एक दिन पहले अखिलेश यादव सहारनपुर में थे। सपा की रणनीति पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए समीकरण को मजबूत करने की है। सहारनपुर जैसे जिले में यह समीकरण खास मायने रखता है। इसके अगले दिन जयंत चौधरी की रैली पश्चिमी यूपी की राजनीति के दूसरे बड़े सामाजिक आधार की तस्वीर सामने रखेगी। यानी सहारनपुर में लगातार दो दिन के राजनीतिक कार्यक्रमों को 2027 के दो अलग-अलग सियासी मॉडल के तौर पर भी देखा जा सकता है—एक तरफ सपा का पीडीए विस्तार, दूसरी तरफ रालोद का किसान-जाट आधार के साथ व्यापक सामाजिक विस्तार का प्रयास। रैली से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा जयंत का राजनीतिक संदेश रामपुर मनिहारान में जयंत चौधरी की सभा में भीड़ निश्चित रूप से रालोद के लिए शक्ति प्रदर्शन होगी, लेकिन राजनीतिक रूप से उससे बड़ा सवाल संदेश का होगा। जयंत भाजपा गठबंधन में रहते हुए किसानों, युवाओं और पश्चिमी यूपी के क्षेत्रीय मुद्दों को किस तरह उठाते हैं, इस पर राजनीतिक नजरें रहेंगी। 2027 के चुनाव में सीट बंटवारे और क्षेत्रवार दावेदारी के समय किसी भी सहयोगी दल की ताकत का आकलन उसके संगठन और जमीन पर प्रभाव से होता है। ऐसे में यह रैली रालोद के लिए अपनी बारगेनिंग पावर दिखाने का अवसर भी है। पश्चिमी यूपी में अभी से शुरू हुआ शक्ति प्रदर्शन अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के लगातार दो दिन सहारनपुर पहुंचने से एक बात साफ है कि 2027 की लड़ाई में पश्चिमी यूपी को कोई भी दल हल्के में लेने के मूड में नहीं है। भाजपा अपने गठबंधन को मजबूत करने में जुटी है, सपा पीडीए के जरिए अपना आधार बढ़ाना चाहती है और रालोद अपने पारंपरिक किसान-जाट प्रभाव को दोबारा व्यापक राजनीतिक ताकत में बदलने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में रामपुर मनिहारान की ‘स्वाभिमान रैली’ जयंत चौधरी के लिए सिर्फ जनसभा नहीं, बल्कि 2027 से पहले पश्चिमी यूपी में रालोद की राजनीतिक मौजूदगी का शक्ति परीक्षण भी है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि जयंत चौधरी मंच से किसानों और क्षेत्रीय मुद्दों के साथ-साथ 2027 की राजनीति को लेकर क्या संकेत देते हैं।
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अखिलेश के दौरे के अगले दिन जयंत की ‘स्वाभिमान रैली’:पश्चिमी यूपी में सियासी ताकत दिखाएंगे रालोद मुखिया, 2027 से पहले जाट-किसान बेल्ट के साथ दूसरे सामाजिक समीकरणों पर भी नजर
