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सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) बनने के लिए वकीलों की अनिवार्य प्रैक्टिस टाइम तीन साल से घटाकर एक साल कर दिया है। कोर्ट ने 2025 के उस फैसले में बदलाव किया है, जिसमें शुरुआती ज्यूडीशियल सर्विस में भर्ती के लिए तीन साल की प्रैक्टिस जरूरी की गई थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने यह निर्देश दिए। जस्टिस चंद्रन ने फैसले से असहमति जताते हुए कहा कि बार में तीन साल की प्रैक्टिस जरूरी करने वाले पुराने फैसले पर दोबारा विचार करने का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि एक अप्रैल 2027 के बाद होने वाले सिविल जज (जूनियर डिवीजन) एग्जाम के हर उम्मीदवार के पास कम से कम 1 साल की प्रैक्टिस होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को संबंधित हाईकोर्ट से सलाह लेकर तीन महीने के भीतर लागू सेवा नियमों में बदलाव करने और उन्हें नोटिफाई करने का निर्देश दिया है। प्रैक्टिस सर्टिफिकेट और रिकॉर्ड जरूरी कोर्ट ने कहा कि प्रैक्टिस को सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस के जरिए सत्यापित किया जाएगा। यह सर्टिफिकेट तभी जारी होगा, जब उम्मीदवार की अदालत में मौजूदगी और प्रभावी न्यायिक कार्यवाही में भागीदारी का रिकॉर्ड हाईकोर्ट की तय व्यवस्था के तहत दर्ज हो। कोर्ट ने कहा कि इस भर्ती से चुने गए उम्मीदवारों को स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी में एक साल की गहन ट्रेनिंग लेनी होगी। इसके बाद छह महीने प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज या हायर ज्यूडिशियल सर्विस के किसी सदस्य के अधीन लॉ क्लर्कशिप करनी होगी। इसके बाद उम्मीदवारों को संबंधित हाईकोर्ट के मौजूदा जज के अधीन छह महीने की और क्लर्कशिप करनी होगी। ट्रांजिशन पीरियड में सभी लॉ ग्रेजुएट आवेदन कर सकेंगे ट्रांजिशन पीरियड के लिए कोर्ट ने कहा कि लॉ ग्रेजुएट पहले लागू तीन साल की प्रैक्टिस शर्त के बावजूद आवेदन कर सकेंगे। आवेदन के लिए उम्मीदवारों को एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस पूरी कर चुका माना जाएगा। कोर्ट ने कहा, “सभी लॉ ग्रेजुएट तीन साल की प्रैक्टिस शर्त के बावजूद आवेदन करने के योग्य होंगे। रिव्यू किए जा रहे फैसले को सुनाए हुए एक साल से ज्यादा समय बीत चुका है। इसलिए आवेदन के उद्देश्य से ऐसे उम्मीदवारों को एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस पूरी कर चुका माना जाएगा।” कोर्ट ने प्रैक्टिकल अनुभव की जरूरत बरकरार रखी कोर्ट ने पहले की प्रैक्टिकल अनुभव की शर्त को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। उसने तीन साल की शर्त का उद्देश्य हासिल करने का तरीका बदला है। बेंच ने कहा कि न्यायिक पद संभालने वाले व्यक्ति को अदालतों के कामकाज की पर्याप्त समझ होना जरूरी है। हालांकि, केवल बार में तीन साल की प्रैक्टिस से यह समझ जरूरी तौर पर विकसित नहीं होती। कोर्ट ने कहा, “प्रैक्टिस की शर्त का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायिक पद संभालने वाले व्यक्ति को अदालतों के कामकाज की पर्याप्त जानकारी हो। जैसा कि हमने ऊपर कहा है, केवल बार में तीन साल की प्रैक्टिस से यह सुनिश्चित नहीं होता। हमारे विचार में प्रैक्टिकल अनुभव और न्यायिक क्षमता न्यायिक सेवा में शामिल होने के बाद भी विकसित होती रहती है।” कोर्ट ने कहा कि इस उद्देश्य को भर्ती से पहले सीमित प्रैक्टिकल अनुभव और चयन के बाद तय संस्थागत ट्रेनिंग के मेल से हासिल किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा, “15 जनवरी 2026 के हमारे आदेश के बाद मिले सुझावों में भी लगातार प्रैक्टिकल अनुभव को मजबूत संस्थागत ट्रेनिंग से जोड़ने की जरूरत बताई गई है।” बेंच ने दो अलग-अलग सवालों के बीच अंतर बताया। उसने कहा कि सिविल जज बनने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के लिए अदालतों के कामकाज की कुछ समझ जरूरी है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि न्यायिक क्षमता का हर पहलू परीक्षा से पहले बार में पारंपरिक प्रैक्टिस के जरिए ही हासिल किया जाए। कोर्ट ने कहा कि प्रैक्टिकल अनुभव और न्यायिक ट्रेनिंग प्रोफेशनल और संस्थागत अनुभव के मेल से हासिल की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि ज्यूडिशियल एकेडमियां काफी विकसित हुई हैं। वे तय और निगरानी वाली प्रक्रिया में वे कौशल सिखा सकती हैं, जिन्हें कोई युवा वकील प्रैक्टिस के दौरान असमान तरीके से सीख सकता है। थर्ड ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन केस का भी जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन केस का भी जिक्र किया। उस मामले में कोर्ट ने तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त हटा दी थी, लेकिन नई भर्ती के लिए कम से कम एक साल और बेहतर होगा कि दो साल की ट्रेनिंग की सिफारिश की थी। कोर्ट ने 2025 के फैसले से वकीलों को हुई परेशानी का भी जिक्र किया। इनमें वे वकील शामिल थे, जिन्होंने नियम बदलने के समय अपनी कानूनी पढ़ाई पूरी कर ली थी या कर रहे थे। दो दशक से ज्यादा समय तक नए लॉ ग्रेजुएट बिना पहले से तय प्रैक्टिस अवधि के न्यायिक सेवा में जा सकते थे। 2025 के फैसले में परीक्षा में बैठने के लिए भी तीन साल की प्रैक्टिस जरूरी कर दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि केवल परीक्षा में बैठने के लिए तीन साल की शर्त से युवा वकील का न्यायिक सेवा में प्रवेश कई साल पीछे हो सकता है। बेंच ने यह भी कहा कि जिन युवा वकीलों के पास मजबूत प्रोफेशनल नेटवर्क या आर्थिक मदद नहीं है, उन्हें सार्थक प्रैक्टिस के मौके हासिल करने में मुश्किल हो सकती है। महिला उम्मीदवारों और दिव्यांग लोगों को भी प्रैक्टिस के मौके पाने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि नई व्यवस्था एक सीमित दखल है। वह यह नहीं कह रही कि तीन साल की शर्त अपने आप में अनुचित है। इसके बजाय कोर्ट ने एक साल की प्रैक्टिस को गहन ट्रेनिंग और निगरानी वाली क्लर्कशिप के साथ जोड़ा है। इससे उम्मीदवारों को अदालत का अनुभव मिलने के साथ न्यायिक पद के लिए संस्थागत तैयारी भी होगी। जस्टिस चंद्रन ने तीन साल की शर्त के पक्ष में राय दी जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने बहुमत के उस फैसले से असहमति जताई, जिसमें तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त बदली गई है। उन्होंने कहा कि पुराना फैसला तीन जजों की बेंच का सोच-समझकर दिया गया फैसला था और उस पर दोबारा विचार करने का कोई आधार नहीं है। उनके मुताबिक न्यायिक सेवा में आने वाले वकीलों के लिए बार का अनुभव जरूरी है। जस्टिस चंद्रन ने कहा कि न्यायिक सेवा की तुलना दूसरी सरकारी सेवाओं से नहीं की जा सकती, क्योंकि न्यायिक अधिकारियों का काम अलग तरह का होता है। उन्होंने कहा कि जज स्वतंत्र रूप से जीवन, आजादी, संपत्ति और प्रतिष्ठा से जुड़े सवालों पर फैसला करता है। न्यायिक फैसले सामान्य प्रशासनिक निगरानी के अधीन नहीं होते। उन्होंने इस तर्क को खारिज किया कि तीन साल की प्रैक्टिस का ज्यादा फायदा नहीं है, क्योंकि युवा वकीलों को शुरुआत में मुकदमे नहीं मिल सकते या उन्हें बहस करने के मौके नहीं मिलते। जस्टिस चंद्रन ने कहा कि वकील शुरुआती वर्षों में फाइलों पर काम करके, अदालत की कार्यवाही देखकर, बार के दूसरे सदस्यों से बातचीत करके और ट्रायल व बहस का तरीका देखकर सीखते हैं। उन्होंने कहा कि ड्राफ्टिंग, रिसर्च, जिरह और दलीलें तैयार करने जैसे कौशल भी प्रैक्टिस के दौरान विकसित होते हैं। जस्टिस चंद्रन ने बहुमत की ओर से लाई गई तय ट्रेनिंग व्यवस्था का भी विरोध किया। उन्होंने कहा कि एक साल की प्रैक्टिस वाले उम्मीदवारों को ट्रेनिंग और क्लर्कशिप में दो और साल लगाने होंगे। इससे उनके वेतन पर असर पड़ सकता है और नियमित न्यायिक सेवा में प्रवेश में देरी हो सकती है। उन्होंने उम्मीदवारों की अलग-अलग कैटेगरी के लिए एक जैसी या अलग ट्रेनिंग व्यवस्था लागू किए जाने को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ज्यादातर हाईकोर्ट बार में अनुभव की जरूरत के पक्ष में थे। केवल अकादमिक योग्यता मुकदमेबाजी की असली परिस्थितियों के अनुभव की जगह नहीं ले सकती। जस्टिस चंद्रन ने कहा, “फैसला करने वाले व्यक्ति की कानूनी और विश्लेषण की क्षमता अदालतों में होने वाली कार्यवाही देखकर प्रोफेशन में बेहतर सीखी जाती है। जरूरी नहीं कि वह पीठासीन अधिकारी के रूप में कार्यवाही चलाए, बल्कि कानून के एक गंभीर और सीखने के इच्छुक विद्यार्थी के रूप में सीखे। कोर्टरूम सभी क्लासरूम में सबसे गहरा क्लासरूम है।” उन्होंने अंत में कहा कि वकीलों के न्यायिक सेवा में आने से पहले तीन साल की प्रैक्टिस जरूरी है। उन्होंने कहा, “पूरे सम्मान और गहरे अफसोस के साथ मैं असहमति जताता हूं। मेरे विचार में सोच-समझकर दिए गए फैसले पर दोबारा विचार की कोई गुंजाइश नहीं है।” पांच साल बाद योजना की समीक्षा होगी बहुमत ने कहा कि नई योजना को हमेशा के लिए तय व्यवस्था नहीं माना जाना चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह योजना फैसले की तारीख से पांच साल तक लागू रहेगी। कोर्ट के मुताबिक यह अवधि सीमित प्रैक्टिस, तय ट्रेनिंग और निगरानी वाली क्लर्कशिप के मेल का असर जांचने के लिए पर्याप्त संस्थागत अनुभव देगी। पांच साल बाद भर्ती की गुणवत्ता, ट्रेनिंग और क्लर्कशिप की उपयोगिता, न्यायिक अधिकारियों के प्रदर्शन और अन्य संबंधित आंकड़े कोर्ट के सामने रखे जाएंगे। कोर्ट ने कहा कि जरूरत पड़ने पर योजना की फिर समीक्षा की जा सकती है। याचिकाकर्ताओं की ओर से तीन सीनियर एडवोकेट पेश हुए याचिकाकर्ताओं और रिव्यू पिटीशन दायर करने वालों की ओर से सीनियर एडवोकेट पिंकी आनंद, विभा माखीजा और कॉलिन गोंसाल्वेस पेश हुए। याचिकाकर्ताओं में भूमिक ट्रस्ट शामिल है। सीनियर एडवोकेट पिंकी आनंद ने फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इससे न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों की परेशानी दूर हुई है और सिविल जजों की ट्रेनिंग का नया मॉडल आया है। आनंद ने कहा, “फैसले ने उम्मीदवारों को हुई पिछली तारीख से लागू होने वाली परेशानी दूर की है। आगे चलकर यह सिविल जजों की ट्रेनिंग के तरीके को बदलने की दिशा में क्रांतिकारी कदम साबित होगा। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि इससे जिला स्तर पर ज्यादा सक्षम और बेहतर जज मिलेंगे।” उन्होंने पांच साल बाद इस मॉडल की तथ्यों के आधार पर समीक्षा के कोर्ट के फैसले का भी स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इससे न्यायिक सेवाओं को मजबूत करने में मदद मिलेगी और भारत में ज्यादा महिला जज बनाने की कोशिशों को भी सहायता मिलेगी।
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अब सिविल जज बनने 3 साल की प्रैक्टिस जरूरी नहीं:सुप्रीम कोर्ट ने नियम बदले; 2027 से सर्टिफिकेट, ट्रेनिंग और क्लर्कशिप भी जरूरी होगी
