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अंत में वही हुआ, जो होना था। अर्जेंटीना ने केप वर्दे को हरा दिया। लेकिन फिर भी, एक्स्ट्रा टाइम में 23 वर्षीय सिडनी लोपेस काब्राल ने अर्जेंटाइन डिफेंडर को गलत दिशा में फिसलाते हुए एक अद्भुत शॉट दागा, जो गोलपोस्ट के सुदूर और अछूते कोने में जाकर समा गया। लगभग 50 लाख लोगों का एक छोटा-सा द्वीपीय देश मौजूदा विश्व चैंपियन के खिलाफ किला भिड़ा रहा था। उसका एक खिलाड़ी, जो कुछ साल पहले जर्मनी की पांचवीं डिवीजन में खेल रहा था, अब इतिहास रच रहा था। अर्जेंटीना के कट्टर प्रशंसकों को भी मानना पड़ा कि यह एक विशिष्ट पल था। जब विश्व कप में सहभागिता करने वाली टीमों की संख्या 32 से बढ़ाकर 48 कर दी गई तो अनेक फुटबॉल विशेषज्ञ इससे संतुष्ट नहीं थे। केप वर्दे? कुराकाओ? हैती? उज्बेकिस्तान? इन टीमों के बारे में किसने कभी सुना था? फिर भी केप वर्दे ग्रुप राउंड में अजेय रहा। कुराकाओ ने चेल्सी के स्टार मोइसेस कैसिडो के नेतृत्व वाली इक्वाडोर के साथ ड्रॉ खेला। कांगो ने क्रिस्टियानो रोनाल्डो की पुर्तगाल को बराबरी पर रोका और इंग्लैंड को कड़ी टक्कर दी। पैराग्वे ने शक्तिशाली जर्मनी को घर भेज दिया। मोरक्को ने नीदरलैंड की सधी हुई टीम को हरा दिया। नॉर्वे ने पांच बार की विजेता ब्राजील को परास्त कर दिया। और राउंड ऑफ 16 में ईजिप्त ने अर्जेंटीना को नाकों चने चबवा दिए। यह छोटे देशों का विश्व कप रहा है! महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता और टेक-दिग्गजों की दुनिया में यह सोचने के लिए आपको माफ किया जा सकता है कि बड़ा और दबंग पक्ष हमेशा आगे रहता है। लेकिन तब आप गलत होंगे। चौथाई सदी पहले, गूगल एक छोटी-सी कम्पनी थी और मेटा और टेस्ला का तो जन्म तक नहीं हुआ था। आज नैस्डैक में सूचीबद्ध 100 सबसे बड़ी फर्मों में से एक तिहाई 2000 में सार्वजनिक रूप से कारोबार तक नहीं करती थीं। जब खिलाड़ी अमेरिकी गर्मी में पसीना बहा रहे हैं, तब नि:संदेह ऐसी नई कम्पनियां भी शुरू हो रही होंगी, जो आज के हाइपर-स्केलर्स को विस्थापित कर देंगी। इस चौथाई सदी में कौन-से देशों ने जबर्दस्त आर्थिक सफलताएं पाई हैं? सिंगापुर, बोत्सवाना और आयरलैंड जैसे छोटे देश इस सूची में शामिल हैं। जबर्दस्त सफलता की परिभाषा में थोड़ी छूट दें, तो न्यूजीलैंड, पनामा और उरुग्वे भी इसमें शामिल हो जाते हैं। छोटे देशों की परिभाषा को शिथिल करें तो रवांडा को शामिल होने का अधिकार मिल जाता है। और यहां गुयाना को न भूलें, जो 2020 से हर साल 35% से अधिक की दर से बढ़ रहा है! छोटे देशों के पास छोटी कम्पनियों के समान ही फायदे होते हैं : वे चुस्त और साहसी हो सकते हैं। ध्रुवीकरण और राजनीतिक विभाजन की दुनिया में, उन्हें अक्सर बड़े देशों की तुलना में आम लक्ष्यों पर सहमत होना और उचित नीतियां अपनाना आसान लगता है- विशेषकर जब पड़ोस में ऐसे देश हों, जो बड़े और खतरनाक दोनों हों। लोकतांत्रिक राजनीति भी इस संभावना पर बनी होती है कि एक आम आदमी मुश्किलों को पार करके सफल हो सकता है। यदि किसी सत्ताधारी पार्टी के दोबारा चुने जाने की संभावना शून्य हो, तो अच्छे से शासन करने का उसका प्रोत्साहन लगभग समाप्त हो जाता है। वहीं यह संभावना कि हम जल्द ही सत्ता में आ जाएंगे, हमें ऐसी लोकलुभावन लेकिन मूर्खतापूर्ण नीतियां प्रस्तावित करने से रोकती है, जो अर्थव्यवस्था को ही बर्बाद कर दें। अंत में, केप वर्दे सफल नहीं हो सका। एक और गोल ने अर्जेंटीना को निर्णायक बढ़त दिला दी। लेकिन कोई बात नहीं। केप वर्दे के लोगों ने दो घंटे की उम्मीद में ही अपना जश्न मना लिया था। और दुनिया ने भी। इस विचार में ही एक खास तरह का सुख है कि कोई छोटा भी जीत सकता है! केप वर्दे सफल नहीं हो सका। लेकिन कोई बात नहीं। केप वर्दे के लोगों ने दो घंटे की उम्मीद में ही अपना जश्न मना लिया था। और दुनिया ने भी। इस विचार में ही एक खास तरह का सुख है कि कोई छोटा भी जीत सकता है!
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)
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आन्द्रेस वेलास्को का कॉलम:फुटबॉल विश्वकप ने बताया है कि छोटे भी जीत सकते हैं
