गैलरी में प्रदर्शित पेंटिंग कितने लोगों को समझ आती है? क्या लोगों और कला को समझने के बीच एक बड़ा गैप है? इसे भरे कैसें? इसी कोशिश में सुखना लेक पर वर्कशॉप आयोजित की। मकसद था गैलरी-क्लासरूम से बाहर निकलकर आर्ट विशुद्ध रूप से लोगों तक पहुंचे। गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट-10 से मास्टर्स कर चुकी पलक ने कहा कि आर्ट को गैलरी और क्लासरूम तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे पब्लिक स्पेस तक ले जाना और कुदरती रूप से लोगों से जोड़ना है। इसलिए सुखना लेक से बेहतर कोई अन्य जगह नहीं थी। लोगों ने किस प्रकार की प्रतिक्रिया दी? पर पलक ने कहा कि सुखना लेक पर जब खुद पेंट करने लगी, तब लोग मेरे पास आए और रंग, प्रोसेस और पेंटिंग से जुड़ी बात की और खुद भी पेंटिंग करने लगे। लोगों और कला के बीच के अंतर पर पलक ने कहा कि लोगों में कला को लेकर इंट्रस्ट तो है, मगर उन्हें कभी कला से जुड़ने का मौका नहीं मिल पाता। लोगों में ये डर भी होता है कि पेंटिंग करने के लिए उन्हें ड्रॉइंग में अच्छा होना होगा, जो सच नहीं है। लोगों के लिए कला को ज्यादा अप्रोचेबल बनाया जाना चाहिए और ये बताना चाहिए कि आर्ट का मतलब ज्यादा से ज्यादा एक्सपेरीमेंट करना, एंजॉय करना और खुद को एक्सप्रेस करना है। भविष्य में प्रिंटमेकिंग और अन्य फॉर्म को लोगों को मजेदार तरीके से इंट्रोड्यूस करवाना चाहती हूं, जिससे लोग समझ सकें कि ये मुश्किल नहीं, बल्कि काफी मजेदार एक्टिविटी है।
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आर्ट गैलरी-क्लासरूम तक सीमित न रहे, इसलिए लेक पर लगाई वर्कशॉप
