Headlines

आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम:वेलफेयर योजनाएं नौकरियों की जगह नहीं ले सकती हैं




2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान मैं अवध में फील्ड रिसर्च कर रहा था। यह लखनऊ के आसपास का इलाका था। मेरी टीम और मैं एक मध्यम उम्र के कम आय वाले दम्पती से मिले। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी मुफ्त राशन योजना के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि वे भाजपा को वोट देंगे। जैसा कि सभी जानते हैं, भारत में 80 करोड़ लोग गरीब कल्याण अन्न योजना के दायरे में आते हैं। यह देश की कुल आबादी का करीब 60 प्रतिशत है। इस दम्पती ने यह भी बताया कि राशन की दुकान उन्हें हर महीने उनका पूरा हिस्सा नहीं देती थी- 5 में से सिर्फ 4 किलो देती थी, लेकिन उनके लिए यह पहले से बेहतर था, क्योंकि पहले राशन की दुकान का मालिक इससे भी ज्यादा राशन चोरी कर लेता था। अलबत्ता वे चाहते थे कि हम उनके बेटे से भी बात करें, जो पास के बाजार में एक दुकान पर बैठा था। इस युवा को पास के शहर रायबरेली के एक कॉलेज से इंजीनियरिंग की डिग्री मिल चुकी थी। उसने कहा कि उसके माता-पिता का विचार सही नहीं था। सरकारी नौकरी के लिए होने वाली परीक्षाओं के पेपर दो बार लीक हो चुके थे और परीक्षाएं नहीं हो सकी थीं। इसी वजह से उसके पास नौकरी नहीं थी, जबकि उसने बहुत मेहनत की थी। उसने जोर देकर कहा कि अगर उसके पास नौकरी होती, तो सरकार के राशन की कोई जरूरत ही नहीं होती। तब वह अपने माता-पिता के लिए उनकी जरूरत का भोजन खरीद सकता था। यह बात हाल के उन छात्र-प्रदर्शनों पर बहुत असर डालती है, जो पेपर लीक के कारण शुरू हुए थे। भारत के युवा सरकारी राशन लेते रहने के बजाय नौकरी करना ज्यादा पसंद करेंगे। सत्ता में आने के लिए सरकार ने सब्सिडी पर ज्यादा भरोसा किया है; उसने पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं किए हैं। इन प्रदर्शनों के साथ शायद यह रणनीति अब बेअसर हो गई लगती है। कल्याणकारी सब्सिडी हमेशा ही नौकरियों की जगह नहीं ले सकती। इन अर्थों में इन प्रदर्शनों का एक पहलू राजनीतिक अर्थव्यवस्था से जुड़ा था और इस पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई है। बीती गर्मियों में अपनी भारत-यात्रा के दौरान मैं पांच हफ्तों से ज्यादा समय तक दिल्ली, चेन्नई और श्री सिटी, बेंगलुरु, मुंबई और पुणे में रहा। मैं जंतर-मंतर से संसद तक मार्च होने से करीब दो हफ्ते पहले दिल्ली पहुंचा था। लेकिन उस मार्च के बाद आया बड़ा बदलाव साफ दिखाई देता है। सार्वजनिक जगहों पर लोग अब ज्यादा खुलकर बोल रहे हैं। मुझे लगता था कि युवाओं के प्रदर्शनों की जमकर आलोचना की जाएगी। उन पर व्यंग्य कसे जाएंगे और उन्हें भारतीय संस्कृति के विरुद्ध बताया जाएगाा। कुछ लोगों ने ऐसा किया भी है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व के सबसे ऊंचे स्तरों ने इससे बिल्कुल अलग रास्ता अपनाया है। उन्होंने आलोचना करने और नसीहत देने के बजाय मिली-जुली प्रतिक्रिया की रणनीति अपनाई है। उन्होंने युवाओं की चिंताओं को बेहतर तरीके से समझने की इच्छा जताई है। यह समझना आसान है कि भाजपा ने यह रणनीति क्यों अपनाई। वोटिंग के आंकड़ों में इसकी वजह है। लोकनीति के डेटाबेस के अनुसार, सभी उम्र के लोगों में 18-25 साल के लोगों ने 2019 और 2024 में भाजपा को सबसे ज्यादा वोट दिए थे। पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा का राष्ट्रीय औसत वोट करीब 37 प्रतिशत रहा है। इनमें 18-25 साल के लोगों का औसत करीब 40 प्रतिशत रहा है। इसके बाद 26-35 साल की उम्र के लोग आते हैं। भारत की करीब दो-तिहाई आबादी 35 साल से कम उम्र की है। इसलिए ये आंकड़े भारत के वोटरों के बहुत बड़े हिस्से को दिखाते हैं। जाहिर है कि भाजपा इस समूह को अपने खिलाफ नहीं जाने दे सकती है। भारत के युवा अब जोर देकर कह रहे हैं कि अगर उसके पास नौकरी होती, तो सरकार के मुफ्त राशन की कोई जरूरत ही नहीं होती। तब वे अपने माता-पिता और परिवार के लिए उनकी जरूरत का पूरा भोजन स्वयं ही खरीद सकते थे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *