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एन. रघुरामन का कॉलम:कभी पिता जो काम सहज रूप से करते थे, स्कूल आज साइंटिफिकली कर रहे हैं




बचपन में आपकी जिंदगी का पहला सबसे बेहतरीन माइलस्टोन क्या था? हममें से ज्यादातर लोगों के लिए यह ट्राई-साइकिल चलाना और पैरेंट्स से ‘वेरी गुड’ सुनना रहा होगा। लेकिन जीवन के या किसी प्रोजेक्ट के अहम टर्निंग पॉइंट, अचीवमेंट या पड़ाव की सबसे अच्छी, क्लासिक और निर्णायक मिसाल वह होती थी, जब आप साइकिल चला रहे हों और पिताजी ने उसे पीछे से नहीं पकड़ा हो। पीढ़ियों से हम बच्चों ने यह स्किल ड्राइव-वे में (अमीरों के बच्चों के लिए), साइड-वेज में (कॉलोनी में रहने वाले मिडिल क्लास के बच्चों के लिए) और मेरे जैसे अन्य बच्चों (यदि आम आदमी के बच्चे हैं तो) ने चॉल के आसपास की गलियों में सीखी है। आमतौर पर बड़ा भाई-बहन या पिताजी साइकिल को पीछे से पकड़े रहते थे, जब तक कि हम संतुलन बनाना नहीं सीख जाते। फिर एक दिन अचानक हमें पता चलता था कि वे पीछे से नदारद हैं और साइकिल चल रही है। उस दिन हम गिर भी सकते थे, साइकिल किसी चीज से टकरा सकते थे या हमें खरोंच भी लग सकती थीं। लेकिन उसी दिन अचानक हमें लगता था कि हम ‘बड़े’ हो गए। लेकिन आज के समय में यह अनुभव एक नए पायदान पर पहुंच गया है। आज किंडरगार्टन के बच्चे को स्कूल के जिम्नेजियम हॉल या प्लेग्राउंड में अपनी पहली बैलेंस-बाइक मिलती है। उन्हें हेलमेट जैसे सुरक्षा उपकरण पहन कर ऐसी बाइक पर बैठना होता है, जो पैडल-फ्री होती है और उसे वे पैरों से आगे बढ़ाते हैं। बच्चे ऑरेंज ट्रैफिक-कोन से बने गोलाकार रास्ते पर बाइक स्टार्ट और स्टॉप करते हैं, जबकि आसपास पीटी टीचर्स समेत दूसरे वयस्क उन्हें देखते और डायरेक्शन देते रहते हैं। ये शिक्षक बच्चों को बैलेंस, कोर स्टेबिलिटी, सीक्वेंसिंग और बॉडी-अवेयरनेस सिखाते हैं। इस प्रक्रिया में हर स्टेप पिछले स्टेप पर आधारित होती है। इस दौरान हर नर्वस चेहरे के साथ एक मुस्कराता चेहरा भी था। हर चीख के साथ एक हंसी भी थी। सोच रहे हैं कि यह सब कहां हो रहा है? अमेरिका के 2 हजार से ज्यादा एलीमेंट्री स्कूलों ने बाइक राइडिंग को बच्चों की फिजिकल एजुकेशन का हिस्सा बनाया है। अन्यथा इन बच्चों को भी उन्हें सिखाने के लिए किसी वयस्क या बड़े भाई-बहन का इंतजार करना पड़ सकता था। आठ लेसन वाले इस पाठ्यक्रम में बच्चों को धीरे-धीरे सिखाया जाता है। पहले वे सिर्फ बाइक के साथ चलना, सही साइज की बाइक पर सहज होना और फिर दोनों पैर उठा कर बैलेंस बनाना सीखते हैं। इसके बाद वयस्क पेडल लगाते हैं और स्टूडेंट पूरी तरह साइकिलिंग करते हैं। कुछ स्कूल बच्चों को पैदल यात्रियों की सुरक्षा सिखाने के लिए दूसरे कार्यक्रमों से भी जुड़ते हैं। हममें से कई लोगों ने यह सीन देखा होगा, जब एक यंग-मदर अपने बच्चे को प्रैम में लेकर किसी बिल्डिंग से निकलती है और सड़क पार करने की कोशिश करती है। जिस जेब्रा क्रॉसिंग पर पैदल यात्रियों को प्राथमिकता दी जाती है, वहां उसका सामना तेजी से गुजर रहे साइकिल और अन्य सवारों के झुंड से होता है और उनमें से कोई भी ब्रेक लगाने के बारे में नहीं सोचता। आखिरकार जब थोड़ी जगह बनती है तो वह दौड़कर सड़क पार करती है। उसे भरोसा नहीं होता कि ये राइडर्स जेब्रा क्रॉसिंग के नियमों का पालन करेंगे और उन्हें बच्चे समेत सड़क पार करने देंगे। ऐसी घटना गंभीर सुरक्षा मसलों को बिल्कुल सटीकता से सामने लाती है। यह अतिरिक्त सबक डिफ्रेंटली-एबल्ड बच्चों के लिए बहुत काम का होता है। मसलन, सिएटल के एक स्कूल में बच्चों को सिखाया जाता है कि सड़क कैसे पार करें, कैसे ड्राइवरों से आई-कॉन्टेक्ट बनाएं और यदि कोई असुरक्षित व्यवहार कर रहा है तो कैसे पहचानें। वहां के टीचर कहते हैं कि ऐसे कार्यक्रम बच्चों में आजादी और आत्मनिर्भरता की भावना पैदा करते हैं- ठीक वही एहसास, जो हमें पहली बार पिता या बड़े भाई के सहारे के बिना बाइक चलाने पर हुआ था। फंडा यह है कि बाइक-राइडिंग धीरे-धीरे स्पोर्ट्स क्लास में बास्केटबॉल खेलने जैसी बेसिक स्किल बनती जा रही है। लेकिन इस तथ्य को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता कि बाइकिंग लाइफ-लॉन्ग स्किल है। और ऐसे सबक बच्चों के मन में तब भी बने रहते हैं, जब वे बाइक की उम्र से काफी आगे निकल जाते हैं।



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