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स्कूली बच्चों के लिए 12वीं कक्षा तक अधिकांश उच्च शिक्षण लगभग अनदेखे ही रहते हैं। आमतौर पर वे एडमिशन के समय ही वहां पहली बार जाते हैं। कल्पना कीजिए कि ये बच्चे 5वीं कक्षा से या उससे भी पहले कॉलेज कैंपस जाने लगें। आप पूछ सकते हैं कि उन्हें क्यों जाना चाहिए? मेरा जवाब होगा, म्यूजियम देखने के लिए। सोच रहे हैं कि कॉलेज या यूनिवर्सिटी का म्यूजियम से क्या लेना-देना? तो इसका जवाब यहां है। अगर आप कुछ शहरी बच्चों से पूछें कि सब्जियां कहां से आती हैं? तो वे मासूमियत से रेफ्रिजरेटर की ओर इशारा कर सकते हैं, या कह सकते हैं कि सुपरमार्केट से अथवा विभिन्न एप्स के डिलीवरी बॉय के जरिए। लेकिन अगर आपने बेंगलुरु के गांधी कृषि विज्ञान केंद्र में कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर द्वारा बनाए गए क्रॉप म्यूजियम को देखा है तो जवाब कुछ और होगा। यह विजिट ऐसा कुछ कर सकती है, जिसे हासिल करने के लिए पाठ्यपुस्तकें अब भी संघर्ष कर रही हैं। आप भी मानेंगे कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के चलते हमारे बच्चों में भाेजन के उत्पादन और खपत को लेकर समझ कम होती जा रही है। सब्जियों को सिर्फ डाइनिंग टेबल पर देखने के बजाय इस म्यूजियम में बच्चे उनके बीच चल सकते हैं। वे टमाटर का पौधा छू सकते हैं, पत्तेदार सब्जियां तोड़ सकते हैं और समझ सकते हैं कि भोजन वहां पैदा नहीं होता, जहां वो सोचते हैं। धीरे-धीरे उन्हें यह तथ्य पता चलता है कि इसकी शुरुआत मिट्टी, बीज, धूप, पानी और किसानों की अथक मेहनत से होती है। बच्चे यहां पूरी भोजन यात्रा को समझ सकते हैं- बीज चयन और बुवाई से लेकर सिंचाई, परागण, कटाई, स्टोरेज, परिवहन और आखिर में रसोई तक। इस दौरान वे केंचुओं, मधुमक्खियों, कंपोस्ट पिट्स, औषधीय पौधों और देशी फसल किस्मों से भी परिचित होते हैं। ऐसा अनुभव बिना किसी परीक्षा के बायोलॉजी, इकोलॉजी, न्यूट्रिशन और इकनॉमिक्स सिखाता है। अब सवाल यह है कि यूनिवर्सिटी और कॉलेज सिर्फ क्रॉप म्यूजियम तक ही क्यों रुकें? कोई इंजीनियरिंग कॉलेज इनोवेशन प्लेग्राउंड बना सकता है, जहां बच्चे साइकिल चलाकर बिजली पैदा करें, छोटे पुल बनाएं, वाॅटर पंप चलाएं, उपकरणों के साथ प्रयोग करें और व्यवहारिक एक्जिबिट्स के जरिए रोबोटिक्स को समझें। तब फिजिक्स डरावना नहीं, बल्कि मजेदार विषय बन जाएगा। कोई मेडिकल कॉलेज हार्ट, लंग्स और ब्रेन के विशाल वॉक-थ्रू मॉडलों वाला ह्यूमन बॉडी डिस्कवरी सेंटर बना सकता है। इंटरैक्टिव डिस्प्ले के जरिए हैंड हाइजीन, न्यूट्रिशन, वैक्सिनेशन, फर्स्ट-एड और ऑर्गन डोनेशन जैसी बातें सिखाई जा सकती हैं। तब बच्चे अस्पतालों से डरने के बजाय यह समझेंगे कि उनका शरीर कैसे काम करता है। लॉ यूनिवर्सिटीज एक कॉन्स्टिट्यूशन म्यूजियम बना सकती हैं, जहां युवा मॉक कोर्ट, चिल्ड्रंस पार्लियामेंट और अधिकारों व दायित्वों की बहसों में हिस्सा लें। लोकतंत्र, अभ्यास के जरिए ही सबसे बेहतर समझ में आता है।
बिजनेस स्कूल एक आंत्रप्रेन्योरशिप म्यूजियम बना सकते हैं, जो असाधारण उद्यम खड़े करने वाले आम भारतीयों की कहानियां बताए। मसलन, कैसे एक सड़क किनारे का छोटा फूड स्टॉल बड़ी रेस्तरां चेन में बदल गया या ग्रामीण महिलाओं ने कैसे सफल सहकारी संस्थाएं बनाईं। यहां बच्चे मिनिएचर बिजनेस चलाना, बजटिंग करना और यह भी सीख सकते हैं कि आइडिया कैसे कंपनी में बदलते हैं। यह आइडिया नया नहीं है। कई उदाहरण पहले से मौजूद हैं। मसलन, अमेरिका में सैन फ्रांसिस्को के एक्सप्लोरेटोरियम में लाइट, साउंड, मोशन, ह्यूमन बिहेवियर और इंजीनियरिंग से जुड़े सैकड़ों इंटरैक्टिव एक्जिबिट्स के जरिए बच्चे रटने के बजाय सवाल पूछकर सीखते हैं। यूके के हैलिफैक्स स्थित नेशनल चिल्ड्रन्स म्यूजियम में विजिटर्स चौकोर पहियों वाली साइकिल चलाते हैं, जियोमेट्रिक स्ट्रक्चर बनाते हैं, विशाल पजल्स सुलझाते हैं और प्रकृति व आर्किटेक्चर में छिपे पैटर्न खोजते हैं। गणित को महज फॉर्मूलाें का संग्रह मानने के बजाय यह म्यूजियम बताता है कि संख्याएं कैसे खेल, संगीत, इंजीनियरिंग, फाइनेंस और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं। एक और मजबूत उदाहरण टोक्यो स्थित पासोना ग्रुप है, जिसने दुनिया से सबसे अनोखे कार्यस्थलों में से एक बनाया है। उसकी ऑफिस बिल्डिंग में चावल के खेत, वेजिटेबल गार्डन, फलों वाले पेड़ और हाइड्रोपोनिक फार्म्स बनाए गए हैं। फंडा यह है कि जब कॉलेज ऐसे अनुभव देने वाले म्यूजियम बनाएंगे, जहां स्कूली बच्चे एक दिन के लिए पेशेवरों की भूमिका का अनुभव खुद कर सकें तो यकीन मानिए स्कूली बच्चों के लिए कॉलेज सबसे पसंदीदा जगह बन जाएंगे।
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एन. रघुरामन का कॉलम:हर विषय अपना खुद का ‘लिविंग म्यूजियम’ बना सकता है
