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कटनी जिले में हर साल मानसून के दौरान बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाया जाता है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक पिछले 12 वर्षों में 1 करोड़ 1 लाख 70 हजार 817 पौधे लगाने का दावा किया गया है। लेकिन शहर और जिले की मौजूदा हरियाली इन दावों की पुष्टि करती नजर नहीं आती। प्रमुख सड़कें धूल से अटी हैं, कई डिवाइडर सूने हैं और हरित परियोजनाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी हैं। हरित परियोजनाएं भी नहीं बदल सकीं तस्वीर रोशननगर स्थित अटल निकुंज में कोरोना काल से पहले बड़े स्तर पर पौधारोपण किया गया था, लेकिन अधिकांश पौधे सूख गए। दो वर्ष पहले दोबारा पौधे लगाए गए, फिर भी क्षेत्र पूरी तरह विकसित हरित पट्टी का स्वरूप नहीं ले सका। इसी तरह उमरियापान के पास करौंदी स्थित भारत के भौगोलिक केंद्र को हरित पर्यटन स्थल बनाने की योजना भी अधूरी नजर आती है, जहां लाखों रुपए खर्च होने के बावजूद पर्याप्त हरियाली विकसित नहीं हो सकी। 12 वर्षों के रिकॉर्ड पर उठे सवाल वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2016 में 4 लाख 14 हजार 427, 2017 में 5 लाख 53 हजार 829, 2018 में 9 लाख 48 हजार 9, 2019 में 6 लाख 37 हजार 50, 2020 में 1 लाख 80 हजार, 2021 में 95 हजार 800, 2022 में 10 लाख 56 हजार 55, 2023 में 8 लाख 91 हजार 90, 2024 में 11 लाख 6 हजार 955, 2025 में 13 लाख 90 हजार 530, 2026 में 15 लाख 6 हजार 542 और 2027 में 13 लाख 90 हजार 530 पौधे लगाने का लक्ष्य और उपलब्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2016 से 2027 तक कुल 1 करोड़ 1 लाख 70 हजार 817 पौधे लगाने का लक्ष्य और उपलब्धि दर्ज की गई है। हर साल इस अभियान पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं, लेकिन शहर और जिले की मौजूदा स्थिति इन आंकड़ों पर सवाल खड़े कर रही है। अब सर्वाइवल रेट को बनाने की मांग पर्यावरणविदों का कहना है कि पौधारोपण की संख्या नहीं, बल्कि पौधों के जीवित रहने की दर सफलता का पैमाना होनी चाहिए। उनका सुझाव है कि हर पौधे की जियो-टैगिंग, नियमित सिंचाई, सुरक्षा और कम से कम तीन से पांच वर्ष तक रखरखाव सुनिश्चित किया जाए। उनका मानना है कि ऐसा नहीं होने पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च कर लगाए गए पौधे सिर्फ सरकारी फाइलों तक सीमित रह जाएंगे। हरियाली की कमी से बढ़ रही चुनौतियां विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लगाए गए अधिकांश पौधे पेड़ बन पाते तो शहर में धूल कम होती, तापमान घटता, भूजल संरक्षण बेहतर होता और पर्यावरण संतुलन मजबूत होता। एक विकसित पेड़ ऑक्सीजन, तापमान नियंत्रण, वर्षा जल संरक्षण और जैव विविधता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पुराने पौधों का नहीं होता सर्वाइवल ऑडिट पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि हर साल नए पौधे लगाने पर जोर दिया जाता है, लेकिन पहले लगाए गए पौधों का सर्वाइवल ऑडिट शायद ही सार्वजनिक होता है। उनका अनुमान है कि लगाए गए पौधों में से केवल 20 से 25 प्रतिशत ही पेड़ बनने तक पहुंच पाते हैं। नगर वन और डिवाइडरों की हरियाली भी अधूरी गुलवारा क्षेत्र में विकसित किए जा रहे नगर वन में हजारों पौधे लगाए गए, लेकिन आज भी वहां बड़े हिस्से में विरल हरियाली और खाली जमीन दिखाई देती है। वहीं बस स्टैंड से चाका तक डिवाइडरों पर लगाए गए पौधे भी अधिकांश स्थानों से गायब हो चुके हैं। कई जगह पौधे सूख गए, जबकि सुरक्षा के लिए लगाई गई रेलिंग भी क्षतिग्रस्त या चोरी हो गई। अधिकारियों का दावा- लक्ष्य के अनुसार जारी है काम डीएफओ गर्वित गंगवार ने बताया कि जिले में इस वर्ष 13 लाख 90 हजार 530 पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें करीब 60 प्रतिशत पौधारोपण पूरा हो चुका है। वहीं नगर निगम आयुक्त तपस्या परिहार ने कहा कि चाका से पीरबाबा तक डिवाइडरों को फिर से हरा-भरा बनाया जाएगा और पौधारोपण के साथ उनकी सुरक्षा की भी व्यवस्था की जाएगी।
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कटनी में 12 साल में लगे 1.01 करोड़ पौधे:फिर भी शहर के डिवाइडर सूने, हरियाली नदारद; अधिकारी बोले-लक्ष्य के अनुसार काम जारी
