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कला-संस्कृति का पाठ पढ़ेंगे 6वीं से 12वीं तक के स्टूडेंट:पहली बार राज्य तैयार करेगा लोक कला-संस्कृति की पाठ्य सामग्री, 100 विषयों पर लिखेंगे विशेषज्ञ




छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग कक्षा 6वीं से 12वीं तक के स्टूडेंट्स के लिए छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति से जुड़ी विशेष पाठ्य सामग्री तैयार कर रहा है। इसके लिए प्रदेशभर के करीब 100 साहित्यकार, संस्कृतिविद, शोधकर्ता और विषय विशेषज्ञ 100 अलग-अलग विषयों पर सामग्री तैयार करेंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप छत्तीसगढ़ अपने संसाधनों से स्थानीय कला और सांस्कृतिक विरासत पर पूरक पाठ्य एवं दृश्य सामग्री विकसित करने वाला देश का पहला राज्य बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके जरिए विद्यार्थियों के साथ शिक्षक, प्रशिक्षक और अभिभावक भी छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपराओं से परिचित हो सकेंगे। SCERT में 27 तक वर्क शॉप इस काम के लिए राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी), शंकर नगर रायपुर में 26 अगस्त तक तीन दिवसीय आवासीय कार्यशाला आयोजित चल रही है। कार्यशाला में छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति पर आधारित आर्ट रिपोजिटरी तैयार करने के लिए विषय विशेषज्ञों को जिम्मेदारी दी गई है। हर विषय पर बनेगा पाठ, 5 से 10 मिनट की शॉर्ट फिल्म भी तैयार की जा रही कंटेंट सिर्फ लिखित पाठ तक सीमित नहीं रहेगी। प्रत्येक विषय पर 5 से 10 मिनट की शॉर्ट फिल्मों के लिए भी स्टोरी तैयार की जाएगी। इसका मकसद बच्चों को छत्तीसगढ़ की संस्कृति, कला और परंपराओं से रोचक तरीके से जोड़ना है। वर्कशॉप में करीब 100 विषयों को अलग-अलग समूहों में बांटकर उन पर लेखन और समीक्षा की जा रही है। 25 अगस्त को सामग्री का संशोधन और अंतिम ड्राफ्ट तैयार होगा, जबकि 26 अगस्त को लघु फिल्मों की पटकथा का प्रस्तुतीकरण, अंतिम संपादन और स्वीकृति दी जाएगी। गुरु घासीदास से तीजन बाई और वीर नारायण सिंह तक आर्ट रिपोजिटरी में छत्तीसगढ़ की विभूतियों, संतों, महापुरुषों और साहित्यकारों के योगदान को भी शामिल किया जाएगा। इनमें गुरु घासीदास, गहिरा गुरु, शबरी माता, राजा चक्रधर, पद्मश्री तीजन बाई, विनोद कुमार शुक्ल, मिनीमाता, माधवराव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय, पं. सुंदरलाल शर्मा, शहीद वीर नारायण सिंह और गुंडाधुर समेत कई प्रमुख व्यक्तित्व शामिल होंगे। भोरमदेव से बस्तर दशहरा तक पढ़ेंगे बच्चे पाठ्य सामग्री में छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को भी जगह मिलेगी। कौशल्या मंदिर, सिरपुर, भोरमदेव, दंतेश्वरी मंदिर, बम्लेश्वरी मंदिर, चंद्रहासिनी मंदिर, मां महामाया मंदिर रतनपुर और राजिम के राजीव लोचन मंदिर पर सामग्री तैयार की जाएगी। सतनाम पंथ, कबीर पंथ, रामनामी पंथ, घोटुल, मितान-बदना, मामा-भांजा, लमसेना और मानस मंडली जैसी लोक परंपराएं भी विद्यार्थियों को पढ़ाई जाएंगी। हरेली, नवाखाई, बस्तर दशहरा, गोंचा पर्व, गौरी-गौरा, छेरछेरा, तीजा-पोला, भोजली और मड़ई जैसे प्रमुख पर्व-त्योहार भी पाठ्य सामग्री का हिस्सा होंगे। डोकरा कला, पंथी नृत्य और फरा-मुठिया भी शामिल छत्तीसगढ़ की पहचान मानी जाने वाली डोकरा कला, टेराकोटा, बांस शिल्प, लौह शिल्प, गोदना और रजवार भित्ति चित्रों पर भी सामग्री तैयार होगी। लोक संगीत में पंथी, सुवा, ददरिया, फाग, भरथरी और चंदैनी गीतों को शामिल किया जाएगा। मांदर, मोहरी, ढोल, बांसुरी, सारंगी, धनकुल और टिमकी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की जानकारी भी बच्चों को दी जाएगी। वहीं पंथी, राउत नाचा, गेड़ी, ककसाड़, गौर, शैला, सुवा और सरहुल नृत्य के साथ नाचा, पंडवानी और लोककथाओं पर भी विशेष सामग्री बनाई जाएगी। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पाक कला को भी इसमें शामिल किया गया है। बच्चे ठेठरी, खुरमी, फरा-मुठिया, अंगाकर रोटी, चौसेला, बफौरी, चापड़ा चटनी, माड़िया पेज और पपची जैसे पारंपरिक व्यंजनों के बारे में जान सकेंगे। अपनी जड़ों से जुड़ेगी नई पीढ़ी विभाग का मानना है कि इससे विद्यार्थियों में स्थानीय धरोहर के प्रति समझ, संवेदना और गौरव की भावना विकसित होगी। प्रस्तावित आर्ट रिपोजिटरी के जरिए छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति, लोक परंपराओं और विरासत को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ा जाएगा, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों को जानने के साथ उनके संरक्षण और संवर्धन के प्रति भी जागरूक हो सके।



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