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‘एक बच्चा नहीं संभाल पातीं? हमें देखिए, 12 हजार बच्चों को संभाल रहे हैं। हम IIT में ऐसे बच्चे नहीं लेते हैं।‘ IIT दिल्ली के डीन ने जब ऋषिकेश की मां से ये सब कहा, तब वो वहीं मौजूद था। ये बात उसके दिल पर लगी और आंखें भर आईं। उसने मां से गुस्से में कहा- ‘चलो, अब और बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकते।‘ इस वाकए के कुछ दिन बाद 22 अगस्त को ऋषिकेश ने हॉस्टल की छठी मंजिल से कूदकर जान दे दी। उसके भाई अभिषेक का आरोप है कि मुश्किल वक्त में भी संस्थान ने साथ नहीं दिया, वरना वो बच जाता। 28 दिन बाद 19 सितंबर को IIT बॉम्बे में भी ऐसी ही घटना हुई। यहां साहिल रविंद्र नाम के स्टूडेंट ने हॉस्टल में खुदकुशी कर ली। प्रोफेसर पर ही उकसाने का आरोप लगा है। ये सिर्फ दो घटनाएं नहीं। पिछले पांच साल में 75 IIT स्टूडेंट्स खुदकुशी कर चुके हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, ये पढ़ाई और परफॉर्मेंस प्रेशर है या वजह कुछ और है। ये जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम ने पीड़ित परिवारों, IIT स्टूडेंट्स, पूर्व स्टूडेंट्स, अफसरों और एक्सपर्ट्स से बात की। पहली कहानी: ऋषिकेश कुमार, IIT दिल्ली
‘सबका दुलारा था, मेंटल हेल्थ बिगड़ते दुश्मन बन गया’ 31 साल के ऋषिकेश IIT दिल्ली से फिजिक्स में M.Sc. कर रहे थे। पिता की मौत हो चुकी थी। परिवार पर करीब 40 लाख रुपए का कर्ज था। ऋषिकेश मां से कहते थे, ‘कुछ सालों में सारा कर्ज उतार दूंगा।’ भाई अभिषेक बताते हैं, ’IIT में एडमिशन होने के बाद वो बहुत खुश था। सब सही चल रहा था। वहीं होली फेस्ट के दौरान साथियों ने भांग पिला दी। नशे में उसे पुरानी बातें ट्रिगर हो गईं। दरअसल पापा की मौत के बाद वो डिप्रेशन की दवाइयां ले रहा था, लेकिन अब सही हो चुका था। नशे के बाद डिप्रेशन फिर उस पर हावी होने लगा।’ ’ऋषिकेश को IIT के हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया और काउंसलिंग हुई। बताया गया कि वो अजीब बर्ताव कर रहा है। अब उसका इलाज बाहर कराना होगा। हमने IIT दिल्ली के पार्टनर अस्पताल VIMHANS में उसका इलाज कराया। डॉक्टर ने फिट फॉर स्टडी बोल दिया, लेकिन दिक्कत खत्म नहीं हुई।’ अभिषेक बताते हैं, ’किसी स्टूडेंट पर एक बार मेंटल हेल्थ का टैग लग जाए, तो IITs उसे हॉस्टल में नहीं रखना चाहते। ऋषिकेश के केस में भी यही हुआ। काफी जद्दोजहद के बाद केस काउंसलर से HOD और फिर डीन तक पहुंचा। यहीं ऋषिकेश के सामने मां को अपमानित किया गया।‘ अभिषेक आगे बताते हैं, ‘सुसाइड करने से पहले ऋषिकेश ने परिवार से कहा था कि जब तक मैं सही था, सबका दुलारा था। क्लास रिप्रेजेंटेटिव था। मेरी मेंटल प्रॉब्लम का पता चलते, सब अलग नजर से देखने लगे। प्रोफेसर बात नहीं करते। जैसे मुझे जीने का हक ही नहीं।‘ अभिषेक संस्थान पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘पिछले ढाई साल में IIT दिल्ली में सुसाइड के 8 केस हुए, ये सब रिकॉर्ड में हैं। इसी दौरान 28 बच्चों ने सुसाइड की कोशिश भी की, ये किसी रिकॉर्ड में नहीं है।’ दूसरी कहानी: प्रकाश, IIT मद्रास
जिंदगी बच गई, लेकिन कैंपस नहीं लौट सका प्रकाश (बदला हुआ नाम) का मामला इससे अलग है। वो IIT मद्रास में 2019 बैच के स्टूडेंट थे और यमुना हॉस्टल में रहते थे। नाम और पहचान न जाहिर ने करने की शर्त पर उन्होंने अपनी कहानी शेयर की। प्रकाश की परेशानी IIT से शुरू नहीं हुई थी। सितंबर 2018 में जब उनके पेरेंट्स का तलाक हुआ, तब वो 23 साल के थे। प्रकाश कहते हैं, ‘वो मेरी जिंदगी का सबसे बुरा दौर था क्योंकि मैं दोनों के करीब था। अगले ही साल 2019 में मेरा IIT में एडमिशन हो गया, लेकिन पढ़ाई में मन नहीं लग रहा था। ओरिएंटेशन में सबकी फैमिली आई, लेकिन मेरे घर से कोई नहीं आया था। फिर फर्स्ट सेमेस्टर में उम्मीद के मुताबिक नंबर भी नहीं आए।‘ मैं धीरे-धीरे चुप रहने लगा। फिर नींद कम होने लगी, तो कई बार छिपकर नींद की गोली खा ली। एक दिन हालात इतने बिगड़े कि मैं नींद की 6-7 गोली एक साथ खा गया। सुबह देर तक नहीं उठा, तो दोस्त ने वॉर्डन को बताया। मुझे IIT के हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। जान बच गई, लेकिन करियर नहीं। ‘अगले दिन मेरी काउंसलिंग हुई। मैनेजमेंट ने इसे सुसाइड की कोशिश मानते हुए बाहर इलाज कराने की सलाह दी। करीब दो महीने बाद सेहत सुधरी, तो लगा कि अब IIT लौट सकते हैं। हॉस्टल में रहने की परमिशन मांगी, तो साइक्लॉजिस्ट का फिटनेस सर्टिफिकेट मांगा गया।‘ ‘सर्टिफिकेट देने के बाद भी हॉस्टल में रहने की अनुमति नहीं मिली। बाहर रहने का खर्च ज्यादा था, इसलिए IIT की पढ़ाई छोड़ दी।‘ तीसरी कहानी: शशांत शेखर, IIT दिल्ली
नाना की मौत पर ताना मिला- ‘दादा-दादी को 10-10 बार मारते हो’ IIT दिल्ली के पूर्व स्टूडेंट शशांत शेखर ने हमें 15 साल पुराना अनुभव बताया। 2011 में नाना की मौत के बाद शशांत अंतिम संस्कार के लिए पटना चले गए। लौटे तो दो छोटे एग्जाम छूट चुके थे। री-एग्जाम के लिए प्रोफेसर से मिले। शशांत बताते हैं कि उनसे कहा गया- ‘तुम लोग बिहार से रिजर्वेशन पर आते हो, प्रेशर नहीं झेल पाते। फिर बहाने बनाते हो और दादा-दादी को दस-दस बार मारते हो। डेथ सर्टिफिकेट लेकर आओ।’ शशांत तब सिर्फ 20 साल के थे। वे कहते हैं, ‘नाना मेरे बहुत करीब थे। मैं दुख में था, लेकिन संस्थान मेरे दुख को सिर्फ कागज तक सीमित कर दिया। यकीनन IIT ने मुझे जिंदगी में आगे बढ़ने का मंच दिया, लेकिन संस्थान में जो गलत हो रहा है, उसे कहना भी मेरी जिम्मेदारी है। जो ऋषिकेश के साथ हुआ, वही मेरे साथ हुआ। ऐसा कई बच्चों के साथ हुआ है। इसी दबाव में जो कमजोर हैं, वो टूट जाते हैं।‘ IIT में हर हफ्ते पढ़ाई की नई डेडलाइन, कभी दबाव कम नहीं होता ऋषिकेश की मौत के बाद संस्थान के खिलाफ सबसे मुखर रहे सक्षम भारद्वाज IIT में BTech के स्टूडेंट हैं। वे बताते हैं, ‘यहां दबाव किसी एक एग्जाम का नहीं, पूरे सेमेस्टर रहता है। एक सेमेस्टर में कई कोर्स होते हैं। हर कोर्स में असाइनमेंट, क्विज और लैब वर्क चलता रहता है। कई बार एक ही हफ्ते में दो-तीन क्विज, असाइनमेंट की डेडलाइन और लैब सब आ जाता है। एक सेमेस्टर खत्म होते अगले सेमेस्टर, इंटर्नशिप और नौकरी की चिंता शुरू हो जाती है।‘ ‘अगर किसी एक-दो कोर्स में नंबर बिगड़ा तो ग्रेड खराब होने का डर रहता है। जब आस-पास ज्यादातर बच्चे अच्छा कर रहे हों, तो अपनी परेशानी किससे बताए। खुद को भी लगता है कि जब बाकी सब मैनेज कर ले रहे हैं, तो मैं क्यों नहीं कर पा रहा?‘ हर हॉस्टल में काउंसलर, लेकिन स्टूडेंट्स परेशानी बताने से डर रहे अब सवाल ये है कि अगर ऋषिकेश की काउंसलिंग होती, तो क्या उसे बचा सकते थे। हालांकि आंकड़े कुछ और कहानी बता रहे हैं। IITs में मेंटल हेल्थ को लेकर काउंसलिंग पहले से बढ़ी है, लेकिन सुसाइड नहीं रुका। IIT दिल्ली के सक्षम के मुताबिक, ‘दिल्ली में हर हॉस्टल में काउंसलर है। उनका केबिन है, लेकिन स्टूडेंट्स और काउंसलर्स के बीच काफी दूरी है। मेंटल हेल्थ अब भी ऐसा टैबू है कि स्टूडेंट्स अपनी परेशानी बताने से डरते हैं। उन्हें लगता है कि अगर काउंसलर को कुछ बताया, तो गॉसिप का हिस्सा बन जाएंगे।‘ वहीं, ग्लोबल IIT एल्युम्नाई सपोर्ट ग्रुप के फाउंडर धीरज सिंह का कहना है, ‘यहां काउंसलर्स की हायरिंग और स्टूडेंट्स से उनका कनेक्शन भी आड़े आता है। कई बार किसी प्रोफेसर के पति या पत्नी को ही काउंसलर बना दिया जाता है, इसलिए स्टूडेंट्स उनके पास जाने से कतराते हैं।’ 50 में से 47 काउंसलर्स को ट्रेनिंग ही नहीं मिली IIT में स्टूडेंट्स की मेंटल हेल्थ को लेकर कई बार गाइडलाइन और कमेटियां बनी हैं। सबसे पहले 2012 में IITs ने सुसाइड रोकने के लिए टास्क फोर्स बनाई। जब हमने IIT दिल्ली से पूछा कि इस टास्क फोर्स ने क्या किया, तो उनके पास जवाब नहीं था। उन्हें टास्क फोर्स के बारे में पता ही नहीं था। 2017 में वेलनेस सेंटर जैसी व्यवस्था पर जोर दिया गया, जो अभी लगभग हर IIT में है। 2023 में केंद्र सरकार ने स्टूडेंट्स की मेंटल हेल्थ को लेकर नई गाइडलाइन जारी की। 2025 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर फिर नेशनल टास्क फोर्स (NTF) बनाई गई। हालांकि फिर भी 40 से ज्यादा स्टूडेंट्स सुसाइड कर चुके हैं। नए नियम बने, लेकिन सवाल वही है कि इनका असर स्टूडेंट्स तक क्यों नहीं पहुंच रहा? इसका जवाब NTF की रिपोर्ट में मिलता है। NTF ने IITs में सिर्फ काउंसलिंग के इंतजाम नहीं, बल्कि ये भी देखा कि मुश्किल समय में पूरा सिस्टम कितना तैयार है। 23 IITs में सिर्फ 4 के पास किसी मेंटल हेल्थ के लिए SOP थी। यानी ज्यादातर IITs में ऐसा कोई रिटेन प्रोसेस नहीं मिला कि स्टूडेंट गंभीर संकट में हो तो कौन तुरंत क्या करेगा। देश की सिर्फ 4 IITs ने अपनी फैकल्टी को मेंटरशिप के लिए फॉर्मल ट्रेनिंग दी है। दूसरी तरफ, काउंसलिंग से जुड़े 50 में से 47 काउंसलर्स को कोई ट्रेनिंग नहीं मिली थी। सबसे बड़ी कमी सुसाइड के बाद के सिस्टम में मिली। किसी भी IIT में ये तय प्रोटोकॉल नहीं था कि स्टूडेंट के सुसाइड के बाद कैंपस में क्या किया जाना चाहिए। IIT मद्रास बन सकता है एग्जाम्पल ग्लोबल IIT अल्युम्नाई सपोर्ट ग्रुप के फाउंडर धीरज सिंह कहते हैं, ‘इसमें कोई दो राय नहीं है कि IITs में सबकुछ है। वो काम कैसे कर रहा है और कितना असरदार है, ये उसके नतीजे से पता चलता है। संस्थान जिम्मेदारी लें, तो जवाबदेही तय हो और असर दिखे, लेकिन ऐसा नहीं होता है।’ ’2023 में IIT मद्रास में एक PHD स्टूडेंट ने आत्महत्या की। परिवार ने उसके सुपरवाइजर को जिम्मेदार बताया और एकेडमिक हैरेसमेंट का आरोप लगाया था। मामले में एक्सटर्नल इंक्वायरी कमेटी बनी। जांच में आरोप सही मिले। नतीजन प्रोफेसर को तुरंत सस्पेंड कर दिया गया।’ ’इसके बाद अगले दो-तीन साल IIT मद्रास में किसी स्टूडेंट के सुसाइड की रिपोर्ट नहीं हुई। ये पहला मामला था, जब गलती करने पर एक्शन हुआ। हर जगह सख्ती से जवाबदेही तय हो, तो सुसाइड रेट में गिरावट आएगी।’ ……………………
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क्या सुसाइड फैक्ट्री बन रहे IIT कैंपस:मां को ताना- ‘एक बच्चा नहीं संभलता‘, बेटे ने जान दी, 10 साल में 135% बढ़ा सुसाइड
