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अभी आश्विन मास (अश्विन) चल रहा है, यह हिन्दी पंचांग का सातवां महीना है। आश्विन 26 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा के साथ खत्म होगा। इस महीने में पितृ पक्ष के बाद, शारदीय नवरात्रि शुरू होगी। इस साल दशहरा के तारीख को लेकर पंचांग भेद हैं, क्योंकि 20 और 21 अक्टूबर को दोनों दिन आश्विन शुक्ल दशमी तिथि है। आज सुबह सूर्योदय के समय तृतीया तिथि है शाम करीब 5 बजे तक रहेगी, इसके बाद आश्विन कृष्ण चतुर्थी शुरू होगी। शाम को चंद्र उदय के समय चतुर्थी तिथि रहेगी, इसलिए आज ही चतुर्थी व्रत किया जाएगा, क्योंकि इस व्रत में चंद्र पूजा का महत्व है। मंगलवार को यह व्रत होने से इसे अंगारक चतुर्थी कहते हैं। इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा और व्रत किए जाते हैं और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूरा किया जाता है। पितृ पक्ष की नवमी तिथि को ‘मातृ नवमी’ कहते हैं। इस दिन घर-परिवार की दिवंगत महिलाओं के निमित्त श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है। आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी कहते हैं। इस एकादशी का व्रत करने से न भक्तों के जाने-अनजाने में किए गए पाप कर्मों के फल नष्ट होते हैं। यह व्रत भक्त के पितरों को कष्टों मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। आश्विन कृष्ण त्रयोदशी पर प्रदोष व्रत किया जाता है। इस दिन संध्याकाल (प्रदोष काल) में भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा करनी चाहिए। आश्विन अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या या महालया कहा जाता है। इस दिन पितृ पक्ष का समापन होता है। जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाता है। इस दिन तर्पण और दान-दक्षिणा देकर पितरों को विदाई दी जाती है। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से देवी दुर्गा की आराधना का उत्सव शारदीय नवरात्रि शुरू हो जाएगा। इस दिन कलश स्थापना (घटस्थापना) कर माता शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। तिथियों की घट-बढ़कर की वजह से दुर्गाष्टमी और दुर्गा नवमी की तारीख को लेकर पंचांग भेद हैं। कई पंचांग में ये दोनों तिथियां एक ही दिन बताई गई हैं, जबकि कुछ में 20 अक्टूबर को नवमी और दशमी तिथि बताई गई है। इन तिथियों पर महागौरी और मां सिद्धिदात्री की विशेष पूजा की जाती है। हम अपने-अपने क्षेत्र के पंचांगों और विद्वानों के अनुसार बताई गई तारीखों पर इन तिथियों के व्रत-उपवास कर सकते हैं। आश्विन शुक्ल दशमी को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाता है। इस बार तिथियों की घट-बढ़कर के कारण इस त्यौहार की तारीख को लेकर भी पंचांग भेद हैं। जो लोग सूर्योदय के समय की तिथि को महत्व देते हैं, वे 21 अक्टूबर को विजयादशमी मनाएंगे, वहीं दूसरी ओर जो लोग नवरात्रि के दसवें दिन दशहरा मनाते हैं, वे 20 अक्टूबर को यह पर्व मनाएंगे। इस तिथि पर श्रीराम का विशेष अभिषेक करना चाहिए। हम अपने-अपने क्षेत्र के पंचांगों और विद्वानों के अनुसार बताई गई तारीख पर यह पर्व मना सकते हैं। आश्विन शुक्ल एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और व्रत किया जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष का प्रदोष व्रत शुक्र प्रदोष के रूप में किया जाएगा। इस दिन शिव-पार्वती का विशेष अभिषेक किया जाता है और शाम को यानी प्रदोषकाल में भी विशेष पूजा की जाती है। आश्विन पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस रात चंद्रमा 16 कलाओं के साथ दिखाई देता है। चंद्र की रोशनी में दूध-चावल की खीर बनाकर रखने की परंपरा है। इसी रात माता लक्ष्मी का कोजागर पूजन किया जाता है। इस पर्व के संबंध में भी तिथियों की घट-बढ़ है। 25 तारीख की रात में आश्विन पूर्णिमा रहेगी, इसलिए इस दिन खीर बनाने की परंपरा निभाना उचित है। जबकि 26 अक्टूबर की सुबह पूर्णिमा से जुड़े धर्म-कर्म कर सकते हैं, क्योंकि इस दिन सुबह सूर्योदय के समय यही तिथि रहेगी। हम अपने-अपने क्षेत्र के पंचांगों और विद्वानों के अनुसार बताई गई तारीख पर यह पर्व मना सकते हैं।
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26 अक्टूबर तक आश्विन मास:पितृ पक्ष के बाद नवरात्रि; दशहरे की तारीख को लेकर पंचांग भेद, जानिए आश्विन मास में किस दिन कौन से शुभ काम करें
