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कल (29 जुलाई) आषाढ़ मास की पूर्णिमा है। इस तिथि पर गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। परंपरा के अनुसार द्वापर युग में इसी तिथि पर महर्षि वेद व्यास का जन्म माना जाता है। उन्होंने वैदिक ज्ञान को लोगों तक पहुंचाने का बड़ा काम किया। इसलिए गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। वेद व्यास को पुराणिक मान्यता के अनुसार चिरंजीवी माना जाता है। महाभारत के मुताबिक, जानिए वेद व्यास के जन्म की कथा… कथा की शुरुआत होती है एक मछुआरे की बेटी सत्यवती से। सत्यवती नाव चलाने का काम करती थीं। वह लोगों को नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचाती थीं। कहा जाता है कि उनके शरीर से मछली जैसी गंध आती थी, इसलिए लोग उन्हें मत्स्यगंधा भी कहते थे। एक दिन ऋषि पराशर नदी पार करना चाहते थे। सत्यवती उन्हें नाव से नदी पार कराने लगीं। यात्रा के दौरान ऋषि पराशर ने सत्यवती के भीतर छिपे तेज और विशेष गुणों को पहचाना। उन्होंने सत्यवती से कहा कि उनके संयोग से एक ऐसे पुत्र का जन्म होगा, जो आगे चलकर दुनिया के सबसे बड़े विद्वानों में गिना जाएगा। सत्यवती इस बात को लेकर चिंतित थीं। उन्हें समाज और अपने परिवार की प्रतिष्ठा की चिंता थी। तब ऋषि पराशर ने उन्हें विश्वास दिलाया कि उनकी मर्यादा पर कोई आंच नहीं आएगी। इसके बाद उन्होंने अपने तप के प्रभाव से चारों ओर घना कोहरा कर दिया, ताकि किसी की नजर उन पर न पड़े। सत्यवती ने एक पुत्र को जन्म दिया। यह जन्म नदी के बीच बने एक छोटे से द्वीप पर हुआ था। इसी कारण उस बालक का नाम द्वैपायन पड़ा, जिसका अर्थ है- द्वीप पर जन्म लेने वाला। उनका रंग सांवला था, इसलिए उन्हें कृष्ण द्वैपायन भी कहा गया। आगे चलकर यही कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए। कृष्ण द्वैपायन जन्म लेते ही सामान्य बच्चों की तरह नहीं रहे। कहा जाता है कि उन्होंने बहुत कम समय में ही ज्ञान प्राप्त कर लिया और अपनी माता से कहा कि जब भी उन्हें उनकी जरूरत होगी, वह तुरंत उनके पास आ जाएंगे। इसके बाद वह तप और अध्ययन के लिए चले गए। आगे चलकर महर्षि वेद व्यास ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा वैदिक ज्ञान को व्यवस्थित करने में लगाया। उन्होंने वेदों का संपादन किया और कई पुराणों के संकलन का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है। महाभारत की रचना भी उन्होंने ही की है। इसी काम के कारण उन्हें वेद व्यास कहा जाने लगा। यहां व्यास का अर्थ है- किसी विषय को व्यवस्थित करने वाला या उसका संकलन करने वाला। जब वेद व्यास महाभारत की रचना करना चाहते थे, तब उन्होंने भगवान गणेश से इसे लिखने का आग्रह किया। गणेशजी ने एक शर्त रखी कि वे बिना रुके लिखेंगे, इसलिए व्यास जो भी बोलेंगे, उसे लगातार बोलना होगा। इसके जवाब में व्यास ने भी शर्त रखी कि गणेश हर श्लोक का अर्थ समझने के बाद ही उसे लिखेंगे। कहा जाता है कि जब भी व्यास को सोचने के लिए समय चाहिए होता था, वे गूढ़ अर्थ वाले श्लोक बोल देते थे। महाभारत में वेद व्यास केवल लेखक ही नहीं, बल्कि कहानी के महत्वपूर्ण पात्र भी हैं। हस्तिनापुर के राजवंश को आगे बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका बताई गई है। धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म भी उनकी वजह से हुआ। यही तीनों आगे चलकर महाभारत की पूरी कथा के केंद्र में रहे।
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गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को:महाभारत- सत्यवती और ऋषि पाराशर के हैं महर्षि वेद व्यास, वेदों का संपादन करने की वजह से कहलाए वेद व्यास
