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5 साल की एक मासूम बच्ची ने 36 दिन तक वेंटिलेटर पर मौत से जंग लड़ी और आखिरकार ठीक होकर घर लौट गई है। अलवर की रहने वाली बच्ची को दिमाग की गंभीर और दुर्लभ ऑटो इम्यून बीमारी थी। हालात ऐसे थे कि जिंदा बचना मुश्किल लग रहा था। परिजन भी उम्मीद छोड़ चुके थे। लेकिन जयपुर के जेके लोन हॉस्पिटल में उसे एक तरह से नया जीवन मिला। इलाज करने वाले डॉक्टरों का दावा है- सरकारी क्षेत्र के किसी भी हॉस्पिटल में इतने लंबे समय तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर मरीज के ठीक होना का यह पहला मामला है। क्या है पूरा मामला और इस दौरान डॉक्टरों को किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? पढ़िए इस रिपोर्ट में… नाजुक हालत में पहुंची थी मासूम करीब डेढ़ महीने (1 जुलाई 2026) पहले अलवर जिले की रहने वाली 5 साल की बच्ची को जेके लोन हॉस्पिटल लाया गया था। उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। शरीर में ऑक्सीजन का स्तर लगातार गिर रहा था। इससे पहले परिजन कई दिनों से निजी हॉस्पिटलों में इलाज करवा चुके थे। लेकिन तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी। डॉक्टर्स के मुताबिक बच्ची को हॉस्पिटल में भर्ती करते ही आईसीयू में शिफ्ट करना पड़ा। कुछ देर में ही उसे वेंटिलेटर पर लिया गया। दुर्लभ बीमारी ऑटो इम्यून एन्सेफलाइटिस से ग्रसित थी मासूम जेके लोन हॉस्पिटल में क्रिटीकल केयर हेड डॉ. मनीष शर्मा ने बताया कि शुरुआती जांच जो बीमारी सामने आई, वह बेहद दुर्लभ और खतरनाक थी। बच्ची ऑटो इम्यून एन्सेफलाइटिस से ग्रसित थी। इस गंभीर बीमारी में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) गलती से खुद के ब्रेन (मस्तिष्क) की कोशिकाओं पर हमला कर देती है। इस हमले के चलते बच्ची के मस्तिष्क की कोशिकाएं तेजी से खत्म हो रही थीं। दिमाग पर नियंत्रण कमजोर होने के कारण उसे लगातार तेज दौरे आ रहे थे। सामान्य दवाइयां भी इन दौरों को रोकने में बेअसर साबित हो रही थीं। तीन बार आया कार्डियोरेस्पिरेटरी अरेस्ट वेंटिलेटर पर 36 दिन के लंबे सफर के दौरान एक-एक पल डॉक्टर्स और स्टाफ के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था। इलाज के दौरान बच्ची तीन बार कार्डियोरेस्पिरेटरी अरेस्ट की गंभीर स्थिति में पहुंच गई। ये एक बेहद जानलेवा स्थिति होती है जब मरीज का दिल धड़कना और फेफड़े सांस लेना अचानक पूरी तरह से बंद कर देते हैं। हर बार ऐसे क्रिटिकल मोड़ पर जेके लोन हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक आईसीयू और क्रिटिकल केयर की टीम ने सीपीआर और एडवांस लाइफ सपोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल कर बच्ची की धड़कनों को वापस लौटाया गया। दौरे रोकने के लिए दी गई ऑपरेशन थिएटर वाली बेहोशी की दवाएं डॉ. मनीष शर्मा ने बताया कि सामान्य न्यूरोलॉजिकल दवाइयों ने काम करना बंद कर दिया और बच्ची को लगातार दौरे आ रहे रहे थे। उस कंडीशन में क्रिटिकल दवाइयों का सहारा लेना पड़ा। आमतौर पर बड़े सर्जिकल ऑपरेशन के दौरान एनेस्थीसिया दिया जाता है। लेकिन मासूम के ब्रेन को शांत रखने के लिए उसे सर्जरी के दौरान दी जाने वाली बेहोशी की दवाइयों के पांच-पांच डोज देने पड़े। इससे ब्रेन सेल्स पर पड़ रहे दबाव को कम करने में मदद मिली। निमोनिया और गंभीर संक्रमण ने बढ़ाई मुश्किलें लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहने के कारण बच्ची को निमोनिया की शिकायत हो गई थी। शरीर में कई तरह के इंफेक्शन का खतरा बढ़ रहा था। रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से ही कम थी, ऐसे में इन्फेक्शन का खतरा और ज्यादा मंडराने लगा था। एक तरफ ब्रेन की ऑटो इम्यून बीमारी और दूसरी तरफ फेफड़ों में फैला निमोनिया और फिर बॉडी में कई तरह के इंफेक्शन से निपटना जंग बन गया था। हर घंटे वेंटिलेटर के आंकड़े मॉनिटर करने पड़ते थे। ‘जब परिजनों ने छोड़ दी थी उम्मीद’ डॉ. मनीष शर्मा ने बताया कि मासूम की हालात देखकर उसके परिजनों ने उम्मीद छोड़ दी थी। क्योंकि बच्ची को वेंटिलेटर पर एक महीने से ज्यादा का समय हो चुका था। लेकिन कुछ दिन बाद ही हमें अच्छे नतीजे मिलने लगे। धीरे-धीरे में दवाओं ने काम करना शुरू कर दिया। बच्ची की हालत में सुधार होने लगा। धीरे-धीरे वेंटिलेटर का सपोर्ट कम करके हालात को मॉनिटर किया गया। कंडीशन सामान्य होने पर कुछ दिन पहले ही बच्ची को डिस्चार्ज किया गया है। डॉक्टरों का दावा- सरकारी क्षेत्र में ऐसा पहला केस डॉ. मनीष शर्मा ने बताया कि सरकारी चिकित्सा क्षेत्र के इतिहास में क्रिटिकल केयर का यह सबसे बड़ा माइलस्टोन है। इससे पहले महाराष्ट्र के पुणे स्थित एक निजी हॉस्पिटल में एक बच्चे को इससे कुछ ज्यादा (करीब 40 दिन) दिन वेंटिलेटर पर रखकर बचाया गया था।
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जयपुर- 36 दिन तक वेंटिलेटर पर रहकर जिंदा बची मासूम:दावा-राजस्थान का पहला केस; धड़कन रुकी, बार-बार बेहोश किया, फिर दुर्लभ बीमारी को हराया
