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झारखंड के सरकारी अस्पतालों की जमीनी हकीकत यह है कि राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में बेड न मिलने पर न्यूरो सर्जरी तक के मरीजों का फर्श पर लिटाकर इलाज किया जाता है। वेंटिलेटर के अभाव में रोज 8 से 10 गंभीर मरीज तड़पते रहते हैं। पेट के सीटी स्कैन तक के लिए निजी सेंटरों का मुंह ताकते हैं। आम जनता इस लाचारी को झेलने को विवश है, लेकिन इस लचर स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी जिन माननीयों पर है, उन्हें खुद अपने ही बनाए सरकारी तंत्र पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। उच्च शिक्षा एवं पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के कार्डियक अरेस्ट से हुए आकस्मिक निधन के बाद राज्य के 7 मंत्रियों और 26 विधायकों यानी कुल 33 माननीयों से जाना कि वे अपना स्वास्थ्य जांच कहां कराते हैं। बातचीत में चौंकाने वाला सच सामने आया कि जनता को सरकारी अस्पतालों के भरोसे छोड़ने वाले माननीय खुद अपनी जान बचाने के लिए निजी और दूसरे राज्यों के बड़े अस्पतालों को चुनते हैं। दिल्ली, वेल्लोर और हैदराबाद पर भरोसा 26 में से 19 विधायक (73 प्रतिशत) इलाज व विशेष जांच के लिए रांची के निजी या दिल्ली, वेल्लोर और हैदराबाद जैसे बाहरी शहरों के बड़े अस्पतालों में जाते हैं। वहीं, मात्र 7 विधायक (27) प्रतिशत) ही रांची, बोकारो, धनबाद या जमशेदपुर के सरकारी या स्थानीय निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं। यानी स्थानीय व्यवस्था पर भरोसा करने वालों से बाहर जाने वाले माननीयों की संख्या करीब तीन गुना अधिक है। कौन विधायक कहां कराते हैं इलाज राज्य से बाहर सीपी सिंह (गुरुग्राम, दिल्ली, चेन्नई), सरयू राय (हैदराबाद), रामचंद्र सिंह (हैदराबाद), सत्येन्द्र तिवारी (वेल्लोर), विक्सल कोंगाड़ी (वेल्लोर), सुदीप गुड़िया (वेल्लोर), रौशनलाल चौधरी (दिल्ली)।
स्थानीय निजी अस्पताल में: सुरेश बैठा (निजी, रांची), विकास सिंह मुंडा (निजी, रांची), राजेश कच्छप (निजी, रांची), मनोज कुमार यादव (निजी, रांची), भूषण तिर्की (निजी, रांची), राम सूर्या मुंडा (निजी, रांची), चन्द्रदेव महतो (निजी, सिंदरी), रागिनी सिंह (निजी, झरिया), मंगल कालिंदी (निजी, जमशेदपुर), प्रदीप प्रसाद (निजी, हजारीबाग)। सरकारी व निजी दोनों पर निर्भर ममता देवी (निजी व सरकारी, रांची), उमाकांत रजक (सरकारी व निजी, बोकारो), संजीव सरदार (सरकारी व निजी, जमशेदपुर)। सरकारी अस्पताल पर निर्भर अमित महतो (रिम्स, रांची), पूर्णिमा साहू (सरकारी, जमशेदपुर), जयमंगल सिंह (सरकारी, बेरमो), समीर मोहंती (सरकारी, घाटशिला), प्रकाश राम (सरकारी, लातेहार), जनार्दन पासवान (सरकारी, रांची)। जानिए… रिम्स सदर का हाल रिम्स में जमीन पर इलाजः रिम्स में कुल 2200 बेड हैं। फिर भी ये कम हैं। हालात ऐसे हैं कि मरीजों को बेड नहीं मिलता। जमीन पर ही इलाज कराना पड़ता है। डॉक्टर भी पयर्याप्त नहीं हैं। वेंटिलेटर तक नहींः रिम्स में वाटलेटर की भारी कमी है। रोजाना 8-10 मरीजों को इसलिए निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है कि यहां उन्हें वेंटिलेटर नहीं मिल पाता। सीटी स्कैन, कैंसर इलाज का भी टोटाः रिम्स में पेट का सीटी स्कैन मशीन नहीं है। कैंसर के इलाज की पूरी श्रृंखला, हेमेटोलॉजी, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, लेजर और लेप्रोस्कोपिक सर्जरी की जरूरी सुविधाओं का भारी अभाव है। सदर अस्पताल में घंटों नहीं देखते डॉक्टरः परिजनों की शिकायत है कि डॉक्टर घंटों तक मरीजों को नहीं देखते। विशेषज्ञ डॉक्टर का भी काफी अभाव है। रिम्स में सुविधाएं बढ़ा रहे, एक हजार विशेषज्ञ डॉक्टर लाएंगे सवाल : 26 में 19 विधायक निजी अस्पताल या राज्य से बाहर इलाज करा रहे हैं। क्या यह व्यवस्था की खामी है?
जवाब : स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है और कई नई सुविधाएं शुरू हुई हैं। गंभीर और विशिष्ट इलाज की पूरी व्यवस्था विकसित करने में समय लगता है। सरकार का प्रयास है कि लोगों का भरोसा सरकारी अस्पतालों पर बढ़े और बाहर जाने की जरूरत कम हो। सवाल : रिम्स में रोज 8-10 गंभीर मरीजों को वेंटिलेटर नहीं मिलता और न्यूरो सर्जरी के मरीज फर्श पर इलाज करा रहे हैं?
जवाब : रिम्स में बेड, वेंटिलेटर और दूसरी जरूरी सुविधाएं बढ़ाई जा रही हैं। मरम्मत और नए निर्माण का काम भी चल रहा है। क्षमता बढ़ने के साथ ऐसी परिस्थितियां खत्म होंगी। सवाल : पेट का सीटी स्कैन, कैंसर का पूरा इलाज और कई सुपर स्पेशियलिटी सुविधाएं अब तक क्यों नहीं है?
जवाब : रिम्स में जांच और उपचार सुविधाओं का विस्तार हो रहा है। कैंसर समेत कई सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं को मजबूत करने की योजना है। इसके लिए उपकरण, विशेषज्ञ और आधारभूत ढांचा चरणबद्ध तरीके से बढ़ाया जा रहा है। सवाल : रिम्स-2 की बात हो रही है, फिर मौजूदा अस्पतालों में डॉक्टर और उपकरणों की कमी क्यों है?
जवाब : विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए सरकार बाहर से करीब 1000 विशेषज्ञ चिकित्सकों को लाने की योजना पर काम कर रही है। रिम्स में नए निर्माण, मरम्मत, वार्ड और बेड क्षमता बढ़ाने का काम जारी है। रिम्स-2 का निर्माण भी जल्द शुरू करने की तैयारी है। सवाल : गंभीर बीमारी के लिए बाहर जाना पड़े तो गरीब मरीजों के लिए सरकार की क्या गारंटी है?
जवाब : लक्ष्य ऐसी व्यवस्था बनाना है, जहां मरीज की आर्थिक स्थिति या उसका जिला इलाज में बाधा न बने। रांची के सदर अस्पताल को मॉडल अस्पताल बनाया गया है। अब दूसरे जिलों में भी इसी तरह बेहतर सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। बदलाव में समय लगेगा, लेकिन लक्ष्य झारखंड में ही बेहतर इलाज उपलब्ध कराना है। सवाल-जवाब अजय कुमार सिंह, एसीएस, स्वास्थ्य विभाग से किए गए हैं।
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झारखंड के मंत्री-विधायकों का सरकारी अस्पताल पर भरोसा नहीं:सामान्य जांच रांची में, इलाज-फुल बॉडी चेकअप के लिए दिल्ली-वेल्लोर पहली पसंद
