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टाटा संस में टाटा परिवार की ही नहीं चली:चंद्रशेखरन 5 साल और चेयरमैन रहेंगे, फैसले को 66% हिस्से वाले टाटा ट्रस्ट्स ने चुनौती दी




देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शामिल टाटा समूह में बोर्डरूम की लड़ाई खुलकर सामने आ गई है। गुरुवार को टाटा संस के बोर्ड ने 3 घंटे चली बैठक में दो बड़े फैसले किए। पहला, एन. चंद्रशेखरन को तीसरी बार 5 साल के लिए एग्जीक्यूटिव चेयरमैन बनाने को मंजूरी दी। दूसरा, टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट कराने की प्रक्रिया शुरू की जाए। हालांकि टाटा संस में 66% हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स ने इसे कानूनन अमान्य करार दिया है। ट्रस्ट्स ने बयान जारी कर कहा है कि बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के पक्ष में चार डायरेक्टर और विरोध में नोएल टाटा (रतन टाटा के सौतेले भाई) थे। इसके बावजूद टाटा ट्रस्ट्स 4-1 बहुमत को पर्याप्त नहीं मानता। इसलिए उसे यह नियुक्ति स्वीकार नहीं है। एक महीने में पूरा मामला ऐसे पलटा 63 साल के चंद्रशेखरन का कार्यकाल 20 फरवरी 2027 तक है। उन्होंने 12 अगस्त को कहा था कि वे अगला कार्यकाल नहीं लेंगे, पर 3 सितंबर को नॉमिनेशन कमेटी ने दोबारा विचार का आग्रह किया। गुरुवार को चंद्रशेखरन तैयार हो गए। मामला 1-1 पर अटका, तो कानूनी राय के बाद आया कास्टिंग वोट गुरुवार को टाटा संस की बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव आया तो टाटा ट्रस्ट्स के दोनों नॉमिनी डायरेक्टर आमने-सामने हो गए। नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने पक्ष में वोट दिया। यानी नॉमिनी डायरेक्टर्स के बीच मुकाबला 1-1 से बराबर हो गया। बैठक में मौजूद एक डायरेक्टर के मुताबिक, यहीं कंपनी सचिव ने कानूनी राय सामने रखी कि बराबरी की स्थिति में चेयरमैन कास्टिंग यानी निर्णायक वोट दे सकते हैं। इसके बाद चंद्रशेखरन ने अपनी ही दोबारा नियुक्ति के पक्ष में निर्णायक वोट दिया और प्रस्ताव आगे बढ़ गया। नोएल ने विरोध करते हुए पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की कानूनी राय रखी, लेकिन टाटा ट्रस्ट्स का दावा है कि बोर्ड ने इसे स्वीकार नहीं किया। विवाद की जड़ अनुच्छेद 121ए: नोएल का विरोध टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुच्छेद 121ए पर आधारित था। इसके मुताबिक, चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति के लिए नॉमिनी डायरेक्टर्स के बहुमत का समर्थन जरूरी है। नोएल के खिलाफ वोट देते ही यह शर्त पूरी नहीं हुई और प्रस्ताव ‘कानूनी रूप से शून्य’ हो गया। ट्रस्ट्स का तर्क है कि इस विशेष शर्त को चेयरमैन के कास्टिंग वोट से पूरा नहीं किया जा सकता। आगे क्या… एजीएम अहम: बोर्ड का फैसला अंतिम पड़ाव नहीं है। अब जनरल बॉडी मीटिंग में शेयरधारकों की मंजूरी ली जाएगी। यहां टाटा ट्रस्ट्स 66% हिस्सेदारी के चलते मजबूत स्थिति में है। इसलिए वहां नया विवाद सामने आ सकता है। फैसले को कानूनी चुनौती भी दी जा सकती है। टाटा में चंद्रशेखरन इसलिए अहम



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