‘शादी के 8 साल बाद भी बच्चे नहीं हुए। गांव के लोगों ने बताया कि इस कुंड में स्नान करने से संतान की प्राप्ति होती है। इसलिए हम पत्नी के साथ वाराणसी पहुंचे स्नान किया और 2 साल बाद पुत्र हुआ। आज उसको स्नान कराकर मुंडन कराने आये थे। 40 घंटे लाइन में लगे
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यह कहना है बलिया के रहने वाले मुकेश का। ऐसे ही लाखों लोग उम्मीद लेकर लोलर्क छठ के दिन देश के कई राज्यों से काशी के लोलार्क कुंड में स्नान करने पहुंचे।
इस आस्था के पीछे कितनी सच्चाई है? क्या वाकई लोगों को स्नान के बाद बच्चे हुए हैं? यही जानने के लिए दैनिक भास्कर ने वहां जिन लोगों के बच्चे हुए उनसे बात की और एक्सपर्ट से भी जाना.…
पहले 3 तस्वीर देखें…

बच्चा होने पर लोगों ने ढोल-नगाड़े के बीच मुंडन कराया।

पति-पत्नी ने हाथ पकड़कर 7 डुबकी लगाई।

आस्था के आगे बारिश को इग्नोर किया, लाइन में लगे रहे।
अपने बच्चों को लेकर लोलार्क कुंड जाने वाली गली में बैठीं नीलम ने कहा कि हमारी शादी को 3 साल हुए लेकिन बच्चे नहीं हो रहे थे। आसपास के लोगों से सुना कि इस कुंड में स्नान करने से संतान की प्राप्ति होती है,
जिसके बाद हम अपने पति के साथ यहां स्नान करने आए और हमें 1 साल बाद ही पुत्र हुआ। आज हम यहां इस कुंड का धन्यवाद करने आए हैं और अपने पुत्र को भी स्नान कराया है और यही उसका मुंडन भी कराया।
डाक्टर ने IVF की सलाह दी थी
सैदपुर की अर्चना ने बताया की उनके शादी को चार साल से अधिक का समय बीत चुका था। संतान नहीं हुई तो डॉक्टरों से परामर्श भी लिया, लेकिन ज़ब सफलता नहीं मिली तो मामी से लोलार्क कुंड के बारे में सुना। फिर यहां स्नान किया। इसके एक साल के भीतर ही गोद भर गई।

पेट में ही खराब हो जा रहा था बच्चा, स्नान करने पर हुआ चमत्कार
कानपुर से आई मीरा ने कहा कि दो-तीन साल से हम परेशान थे बच्चा पेट में ही खराब हो जा रहा था। हमने यहां के बारे में मोबाइल में देखा था जिसके बाद हम यहां स्नान करने आए और 1 साल बाद ही हमें बच्चा हुआ। उन्होंने बताया कि यहां स्नान करते समय एक फल का त्याग किया जाता है इसके अलावा जो कपड़ा आप पहने हैं उसे भी यही छोड़ दिया जाता है।

UNESCO ने भी बताया है कल्चरल एस्ट्रोनॉमी साइट
लोलार्क कुंड के सर्वे में सामने आया है कि यहां स्नान से 60% लोगों को संतान सुख मिला है। तुलसी घाट स्थित लोलार्क कुंड को UNESCO ने भी कल्चरल एस्ट्रोनॉमी साइट बताया है। मिस्र के उल्टे पिरामिड जैसे आकार वाले 50 फीट गहरे और 15 फीट चौड़े इस कुंड में इस दिन महिलाएं सूनी कोख भरने का वरदान पाती हैं।

1822 में जेम्स प्रिंसेप ने भी किया था लोलार्क कुंड का जिक्र
पीवी राणा सिंह ने बताया, 19वीं सदी से पहले वाराणसी में कभी किसी को हैजा, कालरा, बांझपन या चर्म रोग नहीं होता था। यहां के कुंड और तालाबों में पहुंचा गंगाजल सचमुच में आयुर्वेदिक बूटियों का काम करता था।
1822 में जेम्स प्रिंसेप ने भी लिखा है कि काशी का लोलार्क कुंड गर्भधारण कराने में मदद करता है। इसके बाद डायना अक और खुद प्रो. सिंह ने अपनी किताब में इस जगह को फर्टिलिटी कल्ट के रूप में संबोधित किया है। उन्होंने अपनी टीम के साथ 2009 में रिसर्च पेपर भी पब्लिश किया।

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काशी में लोलार्क कुंड में लोलार्क षष्ठी का स्नान बुधवार की रात 12 बजे से शुरू हुआ। गुरुवार की शाम 5 बजे तक साढ़े 4 लाख से ज्यादा लोग स्नान कर चुके हैं। आस्था और विश्वास के अद्भुत संगम के बीच आयोजित धार्मिक मेले में देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे करीब चार लाख श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान कर परिवार की सुख-समृद्धि और संतान प्राप्ति की कामना की। पढ़ें पूरी खबर…
