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राजस्थान में नई ट्रांसफर पॉलिसी बनाने का वादा अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। घोषणा पत्र में किया वादा पूरा करने के लिए सरकार बनने के 5 महीने बाद ही मुख्यमंत्री ने सभी विभागों को पॉलिसी का ड्राफ्ट तैयार करने के निर्देश दिए थे। तत्कालीन मुख्य सचिव ने तबादलों के कुछ नियम भी तय कर लिए थे। लेकिन दो साल बीतने के बाद भी किसी विभाग ने रिपोर्ट नहीं भेजी। न विभागों के जिम्मेदार मंत्रियों ने रुचि दिखाई और न ही अधिकारियों ने। इस बीच हर साल तबादले होते रहे। हाल ही में 10 जुलाई तक हुए तबादलों को लेकर खूब विवाद हुए। पिछले 8-9 साल से तबादलों की मांग कर रहे ग्रेड थर्ड टीचर फिर से वंचित रह गए। विपक्ष ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए ‘तबादला उद्योग’ चलाने का आरोप लगाया है। आखिर प्रदेश में ट्रांसफर पॉलिसी क्यों नहीं बन पा रही है? मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए पूरी रिपोर्ट.. CM के निर्देश पर विभागों को भेजी गई थी पॉलिसी की गाइडलाइन मुख्यमंत्री के निर्देश पर तत्कालीन मुख्य सचिव सुधांश पंत ने 9 अप्रैल 2024 को प्रशासनिक सुधार विभाग के जरिए सभी विभागों को ट्रांसफर पॉलिसी तैयार करने के दिशा-निर्देश जारी किए थे। विभागों से कहा गया था कि कर्मचारी संगठनों से चर्चा कर 30 मई 2024 तक अपनी ट्रांसफर पॉलिसी का मसौदा (ड्राफ्ट) प्रशासनिक सुधार विभाग को भेजें, ताकि जल्द से जल्द ट्रांसफर पॉलिसी का ड्राफ्ट फाइनल हो सके। लेकिन विभागों के मंत्री तथा विभागाध्यक्षों ने सरकार के दिशा-निर्देशों पर कोई रुचि नहीं दिखाई। एक भी विभाग ने तय समय बीतने के 2 साल तक तबादलों का मसौदा तैयार करके नहीं भेजा। विभाग ने तय किए थे तबादलों के ये महत्वपूर्ण बिंदु एक स्थान पर 3 वर्ष रहना होगा बीजेपी शासित यूपी-एमपी में पॉलिसी, राजस्थान में क्यों नहीं? घोषणा पत्र के वादों के अनुसार बीजेपी शासित यूपी, एमपी और हरियाणा में पूर्ण पारदर्शी पॉलिसी बनकर लागू भी हो चुकी है। लेकिन राजस्थान में अब तक इस पर कोई प्रगति नहीं है। पॉलिसी मामलों के एक्सपर्ट का मानना है कि राज्य सरकार ने निर्देशों की अवहेलना करने वाले विभागाध्यक्षों पर एक्शन नहीं लिया गया। यही वजह रही ट्रांसफर पॉलिसी संबंधी निर्देशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। पॉलिसी बनने से पहले क्या-क्या औपचारिकताएं होती हैं? जिस तरह राज्य का बजट तैयार करने से पहले हर राज्य में सरकार विभिन्न संगठनों से सुझाव लेती रही है। उसी तरह ट्रांसफर पॉलिसी बनाने के लिए सभी विभागों और उनसे जुड़े कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों से सुझाव लिए जाते हैं। सुझावों के आधार पर ही प्रशासनिक सुधार विभाग मसौदा यानी ड्राफ्ट तैयार करता है। मुख्य सचिव स्तर पर ड्राफ्ट फाइनल होने के बाद उसे मुख्यमंत्री के पास फाइनल अप्रूवल के लिए भेजा जाता है। मुख्यमंत्री की हरी झंडी मिलने के बाद पॉलिसी के ड्राफ्ट को कैबिनेट की बैठक में रखा जाता है। मंत्री उस पर चर्चा करते हैं। अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री का होता है। मुख्यमंत्री की सहमति और फिर कैबिनेट की मंजूरी के बाद पॉलिसी लागू हो जाती है। यदि कैबिनेट में अनुमोदन नहीं होता है तो पॉलिसी अमल में नहीं आ पाती है। ट्रांसफर पॉलिसी बनने के क्या हैं फायदे? विभिन्न विभागों में तबादलों की प्रक्रिया एक समान, पारदर्शी और निर्धारित मानकों के अनुरूप होगी। कर्मचारियों के तबादलों से जुड़े विवादों और अनावश्यक हस्तक्षेप की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं। तबादलों के लिए विभागों के मंत्रियों और अफसरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। ट्रांसफर पॉलिसी को लेकर मंत्री अविनाश गहलोत से बातचीत… सवाल : ट्रांसफर पॉलिसी को लेकर विभागों ने रुचि नहीं दिखाई, सीएम के निर्देशों की अवहेलना क्यों? जवाब : मुख्यमंत्री का जैसा आदेश है, उसी भावना से काम कर रहे हैं। तबादले जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं की भावनाओं के अनुरूप होते हैं। प्रशासनिक दृष्टि से तबादले होते हैं। प्रदेश में साल-डेढ़ साल और दो साल में तबादले होते हैं। ये आवश्यकता और समय के अनुसार होते हैं। सवाल : आप सरकार में मंत्री हैं, क्या आप भी चाहते हैं कि ट्रांसफर पॉलिसी बने? जवाब : आगे हमारा प्रयास रहेगा कि पॉलिसी बने। पॉलिसी के अनुसार ही तबादले हों। ताकि जिस तरीके से ट्रांसफर के बारे में लोगों की गलत धारणा बनती है, उस पर विराम लगे। मुख्यमंत्री की जैसी अपेक्षा होगी, हम उसी मंशा से काम करेंगे। सवाल : बीजेपी शासित राज्यों में ट्रांसफर पॉलिसी बन चुकी है, राजस्थान में क्यों नहीं? जवाब : हम अलग-अलग राज्यों की पॉलिसी की स्टडी कर रहे हैं। उसके बाद नई ट्रांसफर पालिसी लागू करेंगे। एक्सपर्ट क्या बोले- कई सरकारें बदली, नहीं बन पाई ट्रांसफर पॉलिसी वरिष्ठ पत्रकार महेश चंद्र शर्मा का कहना है कि प्रदेश में हर सरकार पारदर्शिता के लिए ट्रांसफर पॉलिसी बनाने की बात कहती है। पिछली सरकार के समय भी ट्रांसफर पॉलिसी बनाने की बात कही गई थी, लेकिन सरकार चली गई। पॉलिसी नहीं बन पाई। इस सरकार ने भी आधा कार्यकाल पूरा कर लिया है, लेकिन अभी तक पॉलिसी नहीं बन पाई है। ऐसा लगता है कि जनप्रतिनिधि नहीं चाहते हैं कि तबादलों में किसी तरह का दखल हो। यही वजह है कि ट्रांसफर पॉलिसी को लेकर सिर्फ बातें ही होती हैं। पॉलिसी नहीं बनने का असर ग्रेड थर्ड टीचर पर, बैन नहीं हटा ट्रांसफर पॉलिसी नहीं बनने का सीधा असर ग्रेड थर्ड टीचर्स पर पड़ रहा है। पिछली गहलोत सरकार हो या फिर वर्तमान सरकार ग्रेड थर्ड शिक्षकों के तबादलों से बैन नहीं हटाया। पिछली गहलोत सरकार में शिक्षकों ने बैन हटाने के लिए प्रदर्शन भी किए थे। लेकिन शिक्षकों को सिर्फ आश्वासन ही मिला। प्रदेश में करीब एक लाख से ज्यादा ग्रेड थर्ड टीचर हैं। अखिल राजस्थान राज्य कर्मचारी संयुक्त महासंघ (एकीकृत) के प्रदेशाध्यक्ष गजेंद्र सिंह राठौड़ का कहना है कि सरकार ने ट्रांसफर पॉलिसी के जो निर्देश जारी किए थे, उनके संबंध में हमसे किसी ने चर्चा नहीं की। उनका संगठन चाहता है कि ट्रांसफर पॉलिसी बने। लेकिन मुख्यमंत्री के निर्देशों की पालना नहीं की जा रही है।
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ढाई साल में भी अधूरा ट्रांसफर पॉलिसी का चुनावी वादा:सीएम के निर्देश, फिर भी विभागों ने नहीं तैयार किया ड्राफ्ट, मंत्री बोले-दूसरे राज्यों की स्टडी कर रहे
