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2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जदयू को 40 में से 2 सीटें मिली थीं। जब उन्होंने इस पराजय की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का फैसला किया, उस समय मैं उनके साथ था। यह खबर फैलते ही पार्टी के नेता और विधायक उनके आवास पर पहुंच गए और उनसे निर्णय वापस लेने का आग्रह करने लगे। विधानसभा में जदयू के पास तब भी स्पष्ट बहुमत था और इस्तीफा देने की कोई संवैधानिक या राजनीतिक मजबूरी नहीं थी। लेकिन नीतीश अपने फैसले पर अडिग रहे। इसके बाद जीतन राम मांझी अप्रत्याशित रूप से मुख्यमंत्री बने। हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब नेताओं ने माना कि सत्ता और जवाबदेही एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते, इसलिए पद छोड़ना ही उचित है। इसका सबसे चर्चित उदाहरण लाल बहादुर शास्त्री हैं। 1956 में महबूबनगर रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने रेलमंत्री के पद से इस्तीफे की पेशकश की थी, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ऐसा न करने के लिए राजी कर लिया। लेकिन उसी वर्ष बाद में अरियालुर रेल दुर्घटना के बाद शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया। दुर्घटना के लिए वे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं थे, फिर भी उनका मानना था कि मंत्रालय के प्रमुख होने के नाते इस विफलता की नैतिक जिम्मेदारी उन्हें ही लेनी चाहिए। उनका त्यागपत्र राजनीतिक शुचिता के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में गिना जाता है। 1958 में एलआईसी से जुड़े मुंद्रा कांड के बाद टी.टी. कृष्णमाचारी ने वित्त मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। प्रश्न यह नहीं था कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से कोई अनुचित लाभ उठाया था। असली सवाल यह था कि क्या कोई मंत्री अपने मंत्रालय के कामकाज की जिम्मेदारी से स्वयं को अलग कर सकता है? 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद वी.के. कृष्ण मेनन ने रक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। एक बार फिर, यह इस स्वीकारोक्ति का प्रतीक था कि किसी महत्वपूर्ण मंत्रालय के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति संस्थागत विफलता के परिणामों से अनिश्चित काल तक स्वयं को अलग नहीं रख सकता। 1992 में एक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद माधवराव सिंधिया ने नागरिक उड्डयन मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, जबकि इस हादसे में किसी की जान नहीं गई थी। 1999 में गैसल रेल दुर्घटना के बाद नीतीश कुमार ने रेल मंत्री पद छोड़ दिया था। इसी प्रकार, 2000 में पंजाब में हुई हावड़ा-अमृतसर मेल दुर्घटना के बाद ममता बनर्जी ने भी इस्तीफा दे दिया था। हालांकि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया। 26/11 के बाद गृह मंत्री शिवराज पाटिल और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने भी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने-अपने पद छोड़ दिए थे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पद जितना ऊंचा होता है, उसके साथ जुड़ी जवाबदेही भी उतनी ही अधिक होती है। निस्संदेह, प्रधानमंत्री को संवैधानिक रूप से यह अधिकार है कि वे अपने मंत्रिमंडल में किसे रखना चाहते हैं, इसका निर्णय स्वयं करें। किसी मंत्री का इस्तीफा ऐसा हथियार नहीं बनना चाहिए, जिसे विपक्ष हर प्रशासनिक विफलता के बाद लहराए। न ही केवल इसलिए किसी मंत्री की बलि दी जानी चाहिए कि किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ने उसकी मांग की है। यदि हर आरोप स्वतः ही पद से हटाने का आधार बन जाए, तो सरकार चलाना ही सम्भव नहीं रह जाएगा। इसका दूसरा पहलू भी उतना ही चिंताजनक है- यह धारणा कि जब तक कोई अदालत, जांच एजेंसी या संसदीय समिति किसी मंत्री की व्यक्तिगत जवाबदेही स्थापित न कर दे, तब तक उसे पद पर बने रहना चाहिए। इससे मंत्रिस्तरीय जवाबदेही केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा बनकर रह जाती है। लोकतंत्र इससे कहीं अधिक की अपेक्षा करता है। मंत्री कोई नौकरशाह नहीं होता। नौकरशाह प्रशासन चलाते हैं; मंत्री नेतृत्व करते हैं और राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। यदि कोई व्यवस्था विफल हो जाए, तो केवल कुछ अधिकारियों को निलंबित कर देना और जांच समिति गठित करने की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है। मंत्री को स्वयं से भी पूछना चाहिए कि क्या उसके पद पर रहने से व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास मजबूत होगा या कमजोर पड़ेगा। धर्मेंद्र प्रधान ने नीट पेपर-लीक मामले में अंततः इस्तीफा देकर सही कदम उठाया है। लेकिन उन्होंने इतनी देर क्यों की? अपनी और सरकार, दोनों की छवि के लिए उन्हें यह फैसला बहुत पहले कर लेना चाहिए था। सार्वजनिक पद जवाबदेही से बचने की ढाल नहीं होते; बल्कि जवाबदेही का अस्तित्व ही सार्वजनिक पदों के कारण है। मंत्री नौकरशाह नहीं होता। नौकरशाह प्रशासन चलाते हैं; मंत्री नेतृत्व करते हैं और राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकारते हैं। व्यवस्था विफल हो, तो कुछ अधिकारियों को निलंबित करना और जांच समिति गठित करना काफी नहीं होता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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पवन के. वर्मा का कॉलम:सत्ता और जवाबदेही एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते
