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कल आपने पढ़ा कि ढोला अपने बचपन के विवाह को भूल चुका था और उसकी दूसरी शादी मालवणी से करा दी गई थी। लेकिन मारू अभी भी अपने ढोला के आने का इंतजार कर रही थी। जानिए आगे की कहानी- समय बीतने के साथ मारू की अधिकतर सहेलियां ससुराल चली गईं, लेकिन मारू को विदा कराने अब तक कोई नहीं आया था। हर बीतते दिन के साथ मारू की आंखों में ढोला का इंतजार और गहरा होता गया। राजा पिंगल अपनी बेटी की उदासी देख समझ रहे थे कि अब नरवर संदेश भेजने का वक्त आ गया है। उन्होंने नरवर के लिए संदेशवाहक रवाना कर दिया। राजा का पत्र लेकर संदेशवाहक नरवर की सीमा पर पहुंचा तो सैनिकों ने उसे बंदी बना लिया। संदेशों पर लगा कड़ा पहरा संदेशवाहक को सैनिकों ने रानी मालवणी के सामने पेश किया। रानी मालवणी ने जब पत्र में लिखा संदेश पढ़ा तो उसके पैरों जमीन खिसक गई। उसके ढोला का बचपन में विवाह हुआ था और उसकी पहली पत्नी आज भी उसकी राह देख रही थी। यह उसके लिए असहनीय था। मालवणी ने संदेशवाहक को कैद करवा दिया। साथ ही, कड़े आदेश दिए कि पूगल से अब कोई परिंदा भी यहां न फटक सके। उधर, राजा पिंगल एक के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा संदेशवाहक भेजते रहे। मारू की युक्ति और ढाढी का वादा लम्बे समय तक नरवर से कोई जवाब नहीं आया। संदेशों के रास्ते जैसे बंद हो गए थे, लेकिन मारू के उम्मीद की लौ अब भी बुझी नहीं थी। राजा पिंगल से भी अपनी बेटी का दुख अब देखा नहीं जा रहा था। उन्होंने कई बार नरवर संदेश भेजे, लेकिन रानी मालवणी ने हर बार उन संदेशवाहकों को कैद करवा लिया। जब कोई रास्ता नहीं बचा तो मारू के पिता ने राज्य के सबसे कुशल ‘ढाढ़ी’(लोक गायक), कालूराम को बुलाया और मारू ने अब एक युक्ति निकाली। कालू काका… आप कलाकार हैं। कलाकारों को न कोई सीमा रोक सकती है और न कोई पहरेदार, आप नरवर जाओ और अपनी गायकी के जरिए मेरे ढोला को उसकी भूली यादें वापस दिलाओ।” मारू ने कालूराम के आगे हाथ जोड़कर कहा। मारू ने उन्हें मल्हार राग और कुछ ऐसे दोहे सिखाए जिनमें उनके बचपन की शादी का जिक्र था। साथ ही उसने उन्हें अपने आंसुओं से भीगा एक पत्र भी दिया। काका.. ये वो दोहे हैं जो मैंने खुद लिखे हैं। आप इन्हें गीत में पिरोकर किसी तरह से ढोला के कानों तक पहुंचा दें… मारू ने कालूराम को पत्र सौंपते हुए कहा। हुकुम, जब तक महाराज ढोला को आपकी याद नहीं आ जाती, कालूराम नरवर की धरती से वापस नहीं लौटेगा ! यह एक कलाकार का वचन है, कालूराम ने पत्र को माथे से लगाते हुए प्रण लिया। ढाढ़ी ने जब आधी रात को गाया मल्हार ढाढी ऊंटों पर सवार होकर निकल पड़े। दिन की तपती धूप और रात की कड़कड़ाती ठंड। उन्होंने मीलों का सफर तय किया। नरवर की सरहद पर कड़े पहरे के बीच कालूराम और उनके साथी अपने ऊंटों के साथ पहुंचे तो पहरेदारों ने उन्हें रोक लिया। “हम तो फकीर हैं, गाना गाकर पेट पालते हैं। मरुधरा में सूखा पड़ा है, खाने को दाना नहीं है। बस गाना गाकर दो वक्त की रोटी कमाना चाहते हैं,”ढाढियों ने पहरेदारों से कहा। ठीक है.. जाओ। कलाकारों से किसी को क्या खतरा हो सकता है!…..जाओ, महल के पास जाकर अपनी किस्मत आजमाओ, पहरेदारों ने ढाढियों को अंदर जाने की इजाज़त दे दी।
काम बन गया और ढाढ़ी राजा के महल के बाहर पहुंच गया। और फिर देर रात रिमझिम बारिश के बीच महल के झरोखे के नीचे जाकर कालूराम ‘मल्हार राग’ में मारू के दोहे गाने लगा- “ढोला, थारी मारू जोवे बाट नैणां में आंसू रा दरिया बहे तू आजा पूगल रे घाट!” (ढोला तुम्हारी मारू तुम्हारा रास्ता देख रही है, उसकी आंखों में आंसुओं का दरिया बह रहा है, तुम पूगल वापस आ जाओ!) “सूती थी सुख भर नींद में, आया ढोला रा याद… पूगल री पद्मिनी जोवे थारी बाट।” (सुख की नींद सो रहे थे, पर अब याद करो… पूगल की पद्मिनी तुम्हारा रास्ता देख रही है।) “ढोला थारी मारू मरुधरा में जोवे थारी बाट बचपन री प्रीत निभाओ सा, छोड़ो सारा ठाट…” (ढोला आपकी मारू मरुधर देस में आपका इंतजार कर रही है …सारे ठाट छोड़कर आओ और बचपन की प्रीत को निभाओ।)
क्या कालूराम के सुर ढोला की भूली हुई यादें जगा पाएंगे … या मालवणी की साज़िश एक बार फिर मारू के प्रेम पर भारी पड़ेगी? ..जानिए अगले एपिसोड में.. (यह लोक कथा पुरानी परंपराओं, ऐतिहासिक संदर्भ और सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित है। बाल विवाह एक सामाजिक बुराई और कानूनन अपराध है। दैनिक भास्कर बाल विवाह जैसी किसी भी कुप्रथा का समर्थन नहीं करता है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। सोर्स: राजस्थानी साहित्य, लोक कथाएं व स्थानीय लोगों से बातचीत पर आधारित। ) इनपुट सहयोग- अनुराग हर्ष, सुजान सिंह, कपिल मिश्रा (शिवपुरी), सुनील जैन, स्वाति पाठक
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पहरों का ऐसा जाल कि परिंदा पर न मार सके:आधी रात को ढोला के महल तक कैसे पहुंची मारू की पुकार? ढोला-मारू प्रेम कहानी एपिसोड-3
