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हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन नियमों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पदों का गठन, योग्यता तय करना और प्रमोशन के रास्ते निर्धारित करना पूरी तरह से राज्य सरकार का नीतिगत फैसला है। अदालत ने कहा कि किसी भी कर्मचारी के पास प्रमोशन पाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं होता, उसका मौलिक अधिकार सिर्फ प्रमोशन के लिए उसके नाम पर ‘विचार किए जाने’ तक सीमित है। यह फैसला जस्टिस अजय मोहन गोयल और जस्टिस योगेश जसवाल की बैंच ने नवीन चंदर भडवाल बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार मामले में सुनाया। याचिकाकर्ता नवीन चंदर भडवाल मुद्रण एवं लेखन सामग्री विभाग में कैमरा ऑपरेटर के पद पर तैनात थे। विभाग में ‘ओवरसियर ऑफसेट’ का पद प्रमोशन से भरा जाना था। साल 2010 के नियमों के मुताबिक, इस पद पर प्रमोशन के लिए ‘डिप्लोमा इन ऑफसेट प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी’ की शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य थी। याचिकाकर्ता के पास यह डिप्लोमा था और वह खुद को इस पद के लिए इकलौता पात्र उम्मीदवार मान रहा था, लेकिन, सरकार ने साल 2024 में नए नियम अधिसूचित किए, जिसके तहत प्रमोशन के लिए इस शैक्षणिक योग्यता (डिप्लोमा) की शर्त को हटा दिया गया। याचिकाकर्ता ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि विभाग ने पसंदीदा और अयोग्य लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों में यह बदलाव किया है। अदालत में सरकार का तर्क राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि फीडर कैडर (जैसे फोटो टाइप सेटर ऑपरेटर) में लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों के पास काम का अच्छा अनुभव और विशेषज्ञता है। कई कर्मचारियों के पास आगे प्रमोशन का कोई जरिया नहीं था। इसलिए उनके अनुभव को देखते हुए और प्राप्त अभ्यावेदन के आधार पर जनहित में योग्यता की शर्त को हटाया गया है, ताकि अनुभवी कर्मचारियों को भी आगे बढ़ने का मौका मिल सके। कोर्ट ने याचिका को खारिज किया अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि किसी पद के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए, यह तय करना पूरी तरह से सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालतें या ट्रिब्यूनल सरकार को किसी खास भर्ती पद्धति या योग्यता को लागू करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। संविधान के तहत किसी कर्मचारी को यह गारंटी नहीं है कि उसे प्रमोशन मिलेगा ही। उसका अधिकार सिर्फ इतना है कि जब भी प्रमोशन कमेटी बैठे, तो वरिष्ठता के आधार पर उसके नाम पर भी निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए। जब पद खाली होगा, तब याचिकाकर्ता को भी प्रमोशन मिलेगी कोर्ट ने नोट किया कि नए नियमों से याचिकाकर्ता का प्रमोशन का अधिकार खत्म नहीं हुआ है। जब भी पद खाली होगा और डीपीसी बैठेगी, वरिष्ठता के आधार पर उसके नाम पर विचार किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने उन कर्मचारियों को मामले में पक्षकार नहीं बनाया था, जो इस फैसले से प्रभावित हो सकते थे, इसलिए भी याचिका तकनीकी रूप से कमजोर थी। हाईकोर्ट ने सरकार के जवाब को पूरी तरह से तर्कसंगत माना और कहा कि नियमों में बदलाव किसी दुर्भावना या किसी खास व्यक्ति को फायदा पहुंचाने के लिए नहीं किया गया है।
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प्रमोशन कर्मचारी का अधिकार नहीं, नाम पर विचार जरूरी:हिमाचल हाईकोर्ट का फैसला-कहा-पदों का गठन-योग्यता तय करना सरकार का फैसला
