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जयपुर में एकमात्र सरकारी डेंटल कॉलेज से अटैच हॉस्पिटल में डेंटल मैकेनिक की कमी का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। हालात ऐसे हैं कि बत्तीसी (डेंचर) बनवाने के लिए महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है, जबकि आरसीटी कराने वाले मरीजों को कैप लगवाने के लिए भी करीब एक साल तक वेटिंग करना पड़ रहा रही है। स्टाफ की कमी के कारण इलाज की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और मरीजों की परेशानियां लगातार बढ़ रही हैं। दरअसल, यहां पर मरीजों को बत्तीसी (कृत्रिम दांतों का सेट) लगवाने, एक्सीडेंट या दूसरे कारण से खराब हुए खराब हुए दांतों की जगह रिमूवेबल पार्शियल डेंचर (RPD) लगवानी हो तो 6 माह या कहें एक साल तक चक्कर लगाने पड़ते है। इसी इंतजार के चलते मरीजों को मजबूरन प्राइवेट क्लिनिक जाना पड़ता है। यूं तो अब जोधपुर में भी सरकार ने एक नया सरकारी डेंटल कॉलेज और हॉस्पिटल खोल दिया है, लेकिन वहां अभी इन सुविधाएं के लिए लैब विकसित नहीं है। जयपुर स्थित सरकारी डेंटल हॉस्पिटल के प्रोस्थोडॉन्टिक्स डिपार्टमेंट में कृत्रिम दांत बनाने, कैंसर पीड़ितों के लिए ऑब्टूयूरेटरप्रोस्थेसिस आदि बनाने के लिए लैब और जरूरी उपकरण है। लेकिन इस लैब में इन्हें बनाने के लिए जो डेंटल टैक्नीशियन चाहिए वह नहीं है। 10 से ज्यादा फेकल्टी, 50 से ज्यादा रेजीडेंट जयपुर डेंटल कॉलेज में वर्तमान में प्रोस्थोडॉन्टिक्स विभाग में 10 फेकल्टी है, जबकि 60 रेजीडेंट (10 सीनियर, 50 जूनियर) हैं। इन सबके बीच केवल एक ही डेंटल टैक्नीशियन (डेंटल मैकेनिक) है। वह भी 6 में से केवल 4 दिन ही आता है, जबकि दो दिन उसकी ड्यूटी दूसरे डिपार्टमेंट में रहती है। न तो RUHS की तरफ से डेंटल टैक्नीशियन की भर्ती की जा रही है और न ही सरकार की तरफ से यहां कोई वैकल्पिक व्यवस्था। इस कारण डॉक्टर मरीजों का इलाज तो समय पर कर देते है, लेकिन नकली दांत, कैप, ब्रिज लगवाने के लिए मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। RCT के बाद कैप लगवाने में एक साल का इंतजार टैक्नीशियन की कमी के चलते लैब में कृत्रिम दांत, क्राउन आदि बनाने का काम बहुत धीमा होता है। इस कारण यहां नकली दांत लगवाने (डेंचर), ब्रिज करवाने, ”रूट कैनाल ट्रीटमेंट” (RCT) के बाद कैप लगवाने वाले मरीजों को लंबा इंतजार इंतजार करना पड़ता है। कैंसर मरीजों की सर्जरी भी होती है प्रभावित डेंटल टैक्नीशियन की कमी का असर ओरल कैंसर (मुंह का कैंसर) से पीड़ित मरीज की सर्जरी पर भी पड़ता है। क्योंकि ओरल कैंसर मरीजों का जबड़ा हटाने और उसे वापस रिकंस्ट्रक्शन करने के लिए इसी डिपार्टमेंट की लैब में ऑब्टूयूरेटरप्रोस्थेसिस (कृत्रिम जबड़ा) बनता है। जब तक ये नहीं बनता, मरीज की सर्जरी प्रभावित रहती है।
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बत्तीसी और कैप के लिए महीनों की वेटिंग:सरकारी डेंटल कॉलेज की बदहाल व्यवस्था, डेंटल मैकेनिक नहीं होने से इलाज अटका
