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बिल विवाद के बाद मेदांता ने युवक की डेडबॉडी सौंपी:परिवार ने कहा-23 लाख लिए, 18 लाख और मांग रहे थे; NHRC अध्यक्ष बोले-मैं आ रहा




गुरुग्राम में मेदांता अस्पताल में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर निवासी 30 वर्षीय युवक की इलाज के दौरान मौत हो गई। परिवार के मुताबिक, बेटे के लिए इलाज के नाम पर अस्पताल ने 23 लाख रुपये की राशि वसूल ली, लेकिन जान नहीं बचाई जा सकी। अब 18 लाख रुपए बिल और बकाया बता दिया। जब उन्होंने इतनी बड़ी राशि तुरंत दे पाने में असमर्थता जताई तो मेदांता प्रबंधन ने 18 लाख रुपए लिए बिना ही डेडबॉडी पीड़ित परिवार को सौंप दी। इसको लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने भी एक्स पर पोस्ट डाली। आयोग की तरफ से पीड़ित परिवार की पहचान उजागर नहीं की गई है। हालांकि, राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपने अधिकारिक एक्स हैंडल पर अस्पताल को लेकर लिखा कि वे खुद अस्पताल का इलाज करने पहुंच रहे हैं। यहां सिलसिलेवार ढंग से जानिए पूरा मामला… गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश निवासी एक 30 वर्षीय युवक की मृत्यु के बाद उसका मृत शरीर परिजनों को नहीं सौंपा जा रहा है। परिजन 23 लाख रुपया भर चुके हैं अभी 18 लाख रुपया और मांगा जा रहा है। अस्पताल इतना ढीठ है कि ना तो प्रशासन की बात मान रहा है और ना सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर और ना NHRC की गाइडलाइन को फॉलो कर रहा है। अब इस अस्पताल का इलाज करने मैं स्वयं जा रहा हूं। आयोग अध्यक्ष की चेतावनी के बाद हरकत में आया अस्पताल प्रबंधन मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष की इस सख्त चेतावनी के बाद मेदांता अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया। कानूनी कार्रवाई और प्रशासनिक गाज गिरने के डर से अस्पताल प्रबंधन तत्काल हरकत में आया और बिना किसी और शर्त के मृतक युवक का शव उसके परिजनों को सौंप दिया। शव मिलने के बाद परिजन उसे लेकर अपने गृह जनपद शाहजहांपुर के लिए रवाना हो गए। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में अभी तक यह आधिकारिक रूप से स्पष्ट नहीं हो पाया है कि मृतक युवक को मूल रूप से किस गंभीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल प्रबंधन की ओर से भी इस संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई। सुप्रीम कोर्ट के नियमों के उल्लंघन पर फूटा यूजर्स का गुस्सा सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग की ओर अपने कई दिशा-निर्देशों में यह स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी मरीज के शव को बिल के भुगतान न होने के आधार पर बंधक नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि यह मृतक की गरिमा और मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है। प्रियंक कानूनगो की पोस्ट के अलावा सोशल मीडिया यूजर्स का भी इस पर गुस्सा फूट पड़ा है। लोगों ने अस्पताल प्रबंधन की अमानवीयता की कड़े शब्दों में निंदा की। एक यूजर्स ने लिखा कि 23 लाख रुपये ऐंठने के बाद भी शव न सौंपना पूरी तरह से लूट है। बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल जीवन रक्षक नहीं, बल्कि ‘लाशों के सौदागर’ बन चुके हैं। जनता ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाने वाले ऐसे चिकित्सा संस्थानों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई और इनका लाइसेंस रद्द करने की पुरजोर मांग की है।



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