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बीमारी नहीं, हेल्थ डेटा भी बना रहा मरीज:इस पर लगातार नजर रखने से तनाव; गैजेट्स के बजाय शरीर की सुनें, यह ज्यादा भरोसेमंद




सिलिकॉन वैली की स्टार्टअप ​प्रिनुवो ने पूरे शरीर का अल्ट्रासाउंड और स्कैन करने वाली ‘होल-बॉडी इमेजिंग’ टेक्नोलॉजी लॉन्च करने का ऐलान किया है। दावा है कि इससे शरीर के अंदर पनप रही बीमारी या असामान्यता को समय रहते पकड़ा जा सकेगा। पर एक्सपर्ट इससे सहमत नहीं हैं। उनका तर्क है कि जरूरत से ज्यादा डेटा फायदे के बजाय नुकसान पहुंचा सकता है। पैलिएटिव केयर एक्सपर्ट डॉ. रेचेल बेडार्ड कहती हैं, नकारात्मक पहलू यह है कि इससे लोग खुद टेस्ट कराने पहुंच रहे हैं, कई मामलों में खुद इलाज भी करने लग जाते हैं।’ एक्सपर्ट बता रहे हैं यह ट्रेंड कितना खतरनाक है… सिलिकॉन वैली के टेक एक्सपर्ट का मानना है कि जितना ज्यादा बॉडी डेटा हमारे पास होगा, हम बीमारियों से उतना ही बेहतर लड़ सकेंगे। लेकिन डॉ. रेचेल बेडार्ड इस पर सवाल उठाती हैं। जब आप स्वस्थ व्यक्ति का ‘होल-बॉडी स्कैन’ करते हैं, तो मशीन शरीर में कई ऐसी छोटी-मोटी चीजें (जिन्हें मेडिकल भाषा में इंसीडेंटलोमा कहते हैं) ढूंढ निकालती है, जो कभी बीमारी बनती ही नहीं। पर रिपोर्ट देखकर लोग डर जाते हैं और फिर शुरू होता है…बार-बार री-स्कैन, बेवजह की बायोप्सी, महंगी सर्जरी और मानसिक तनाव का सिलसिला। उदाहरण के तौर पर, द. कोरिया में जब हर नागरिक का थायराइड स्कैन किया गया, तो थायराइड कैंसर केस 15 गुना बढ़ गए, पर मरीजों की मृत्यु दर नहीं बढ़ी। यानी टेक्नोलॉजी ने सिर्फ बिना वजह का डर और इलाज का खर्च बढ़ाया। मिशिगन यूनिवर्सिटी में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर मैथ्यू डेवनपोर्ट कहते हैं,‘40% से ज्यादा अमेरिकी वियरेबल से अपना शरीर ट्रैक कर रहे हैं।’ वे कहते हैं एक सप्ताह तक फिटनेस ट्रैकर पहनने के बाद महसूस हुआ कि मशीन का डेटा और व्यक्ति की वास्तविक अनुभूति एक जैसी नहीं होती। कई बार उन्हें लगता था कि उनकी नींद अच्छी हुई है, पर वॉच खराब नींद दिखाती थी। इसे ‘नोसीबो इफेक्ट’ कहा जाता है, जिसमें रिपोर्ट या डिवाइस के नकारात्मक संकेत व्यक्ति को बिना वजह बीमार महसूस करा सकते हैं। डॉ. रेचेल कहती हैं, टेक उद्यमी ब्रायन जॉनसन जैसे लोग लंबे समय तक युवा बने रहने के लिए शरीर का हर डेटा ट्रैक करते हैं, इन्होंने ही इस जुनून को बढ़ाया है। पर यह महंगी और समय लेने वाली जीवनशैली हर किसी के लिए संभव नहीं है। रोजमर्रा की जरूरतों से जूझ रहे आम लोगों के लिए लगातार स्वास्थ्य डेटा पर नजर रखना कई बार मदद से ज्यादा तनाव का कारण बन जाता है। टेक कंपनियां बॉडी स्कैन को ‘वेलनेस प्रोडक्ट’ के रूप में प्रचारित कर रही हैं। ‘वेलनेस’ के नाम पर खुद को चिंता में डालना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। बेवजह की ट्रैकिंग से बचें डॉ. रेचेल का कहना है- ‘एआई-वियरेबल्स गंभीर बीमारियों की पहचान में मददगार जरूर हैं, पर बेवजह की ट्रैकिंग से बचें। सेहत का पैमाना स्मार्टवॉच का डेटा नहीं, बल्कि शरीर का वास्तविक एहसास है। गैजेट्स के बजाय शरीर की आवाज सुनना सीखें और अपने एहसास पर भरोसा रखें।’



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