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युवक ने मछली पालन से बदली तकदीर:सालाना कमा रहे 32 लाख रुपए, 40 लोगों को दिया जॉब; मछली की डिमांड बिहार-बंगाल तक




झारखंड के चतरा जिले के इटखोरी प्रखंड स्थित माधोपुर गांव के रंजीत रविदास ने मछली पालन में बड़ी सफलता हासिल की है। उन्होंने न सिर्फ खुद को आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि 40 अन्य परिवारों को भी रोजगार दिया है। रंजीत को मछली बिकने से रोजाना ही करीब 10-20 हजार रुपए की आय हो जाती है। ऐसे में वो सालान 32 लाख रुपए तक की कमाई कर लेते हैं। पिता की सीख ने रंजीत की जिंदगी की दिशा तय कर दी रंजीत के पिता बिराज रविदास ने गुजारे के लिए मछली पालन शुरू किया और बेटे ने इसे एक अच्छे मुकाम पर पहुंचा दिया। पिता की उस सीख ने रंजीत की जिंदगी की दिशा तय कर दी। 2007 में मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने पूरी तरह से मछली पालन की राह पकड़ ली। खुद को इस क्षेत्र में तकनीकी रूप से मजबूत करने के लिए रंजीत ने 2008 में मत्स्य विभाग, शालीमार (धुर्वा, रांची) का रुख किया और वहां महीनों तक ट्रेनिंग ली। नागपुर और पुणे से भी की ट्रेनिंग इसके बाद उन्होंने नागपुर मत्स्य विभाग जाकर दो महीने का और फिर पुणे जाकर एक महीने का विशेष प्रशिक्षण लिया। पूरी तैयारी और आत्मविश्वास के साथ गांव लौटकर उन्होंने 2014 में चतरा के सबसे बड़े बक्सा डैम (जो 300 हेक्टेयर में फैला है) को मत्स्य विभाग से एक लाख रुपए सालाना लीज पर ले लिया। पूरा काम बेहद वैज्ञानिक तरीके से होता है आज बक्सा डैम में रंजीत आधुनिक ‘केज कल्चर’ तकनीक से मछली पालन कर रहे हैं। यहां पानी में जालीदार बॉक्स (केज) बनाकर मछलियों को पाला जाता है। बीज उत्पादन से लेकर मिश्रित मछली उत्पादन तक का पूरा काम बेहद वैज्ञानिक तरीके से होता है। मछलियों की प्रमुख प्रजातियां यहां रेहू, कतला, मृगल, ग्लासकर, सिल्वर, कॉमन कार्प (पहाड़ी), तेलपिया, पंगास, क्लबोस और झींगा का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। रंजीत आज सिर्फ अपना परिवार नहीं पाल रहे, बल्कि एक सच्चे ‘एंटरप्रेन्योर’ की तरह 40 लोगों को सीधा रोजगार भी दे रहे हैं। इनमें 10 महिलाएं भी शामिल हैं। बिहार के 10 लोग भी जुड़े इस काम से इस प्रोजेक्ट से पड़ोसी राज्य बिहार के 10 लोग भी जुड़े हैं। मोतिहारी से आए वकील साहनी जैसे कुशल कारीगर यहां जाल बुनने, मछलियों को चारा देने और डैम की 24 घंटे देखभाल करने का जिम्मा संभालते हैं। बक्सा डैम के मीठे पानी का एक खास बात है। इस पानी में पलने के कारण यहां की मछलियों का स्वाद बेहद लजीज होता है। यही वजह है कि इनकी मांग केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। बल्कि बिहार और पश्चिम बंगाल के बाजारों में भी इसका जबरदस्त डिमांड रहती है।



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